Archive for May, 2012

May 31, 2012

लेकर फलों का टोकरा मुझसे मिलने आई ज़िन्दगी
अपने बगीचे के बहुत से फल फूल लाई ज़िन्दगी
मैंने बटोर कर रखे थे चंद पत्थर जेब में
उनको दिखा के बोला इनसे खेलते हैं
रख फलों को नीचे चौसर ले आई ज़िन्दगी
मैंने कहा इसको छोड़ो कुछ नायाब खेलते हैं
सबसे पहले खेलने के सब नियम तोड़ते हैं
उछाल दिए पत्थर मैंने बोला इनको पकड़ते हैं
जो नीचे गिरेंगे उनको पैरों से बटोरते हैं
ज़िन्दगी को खेल मेरा कुछ पसन्द नहीं आया
घूर के देखा उसने कुछ देर फिर यूँ ही चली गयी
जाते जाते फल और चौसर भी ले गयी
अब बैठ खाली हाथ मैं पत्थर उछालता हूँ
दौड़ता हूँ इधर उधर उनको पकड़ता हूँ
हार जाता हूँ तो कुछ देर उदास होता हूँ
जीत कर कुछ देर अनायास रोता हूँ
हर खेल में जैसे खुद को मैं खोता हूँ

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दिमाग ख़राब हो चला है दोस्तों
एक इन्किलाब हो चला है दोस्तों
हुक्म मेरा इसपे पहले भी न चलता था
अब ये बगावत पे उतर आया है दोस्तों
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किस किस की व्यथा पे आंसू बहाऊँ मैं
या कहानी सिर्फ अपनी ही सुनाऊँ मैं
कौन हूँ कहाँ से आया हूँ ये कहूँ तुमसे
या आज क्यूँ मिलने आया हूँ ये बताऊँ मैं

उलझा हूँ जिन धागों में वो थमा के तुम्हें
बातों में उलझा तुम्हें खुद को सुलझाऊं मैं
या ये जो खुल के निखर आया है आसमाँ
याद आती है जो कहानी वो सुनाऊँ में
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औकात मेरी ज़िन्दगी ने आज बताई है मुझे
जो सुन न सका कभी वोही बात सुनाई है मुझे
घोंट कर गला मेरा बंद कर दिया डब्बे में?
मेरी नहीं अपनी जात दिखाई है मुझे
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मैं फिर तेरी राहों में आ गया हूँ ज़िन्दगी
हो तनहा तेरी पनाहों में आ गया हूँ ज़िन्दगी
मुझको मालूम है इस बार तू हाथ थाम लेगी
ठोकरों से तेरे काबिल हो गया हूँ मैं ज़िन्दगी
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कुछ है जो मरा नहीं है अभी
दिल में है कहा नहीं है अभी
कह दूंगा जरा सबर तो करो
घायल है भरा नहीं है अभी
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मंजिलें किसको हासिल होती हैं
हाँ मुकाम मिल जाते हैं
सफ़र नहीं ख़त्म होता है
कुछ देर को थकान मिट जाती है
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कैसी जगह आकर खड़ा हो गया हूँ मैं
मिल गया हूँ कि गुमराह हो गया हूँ मैं
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दड़बे से निकल रहा हूँ अभी
उड़ना है फुदक रहा हूँ अभी
जाना है पहाड़ी के उस पार
जाऊंगा कह रहा हूँ अभी
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मेरी कोई राह नहीं
मैं चलता रहता हूँ
किसी मंजिल नहीं जाना
कहीं हर दिन पहुंचता हूँ
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May 27, 2012

दिमाग में मेरे कितने लोग रहते हैं
भसड करते हैं और रेंट भी नहीं पे करते हैं
कभी कोई आ जाता है कभी कोई आ जाता है
बिना मेरी इज़ाज़त मुझसे बातें करते हैं

हैरान करते हैं मुझे परेशान करते हैं
जगाये रखने के सिवा नहीं कोई काम करते हैं
इतने सारे हैं ये लोग और सब मिल के
मेरे दिमाग की माँ बहन एक करते हैं
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एक फैसला ले लिया मैंने
जाने कोई गिला ले लिया मैंने
कभी लगे पल का कभी उम्र भर का
कैसा ये सिलसिला ले लिया मैंने
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ये कैसा उजाला है जिसमें दिखाई नहीं देता कुछ
वो रात ही अच्छी थी चल लेते थे ठहर ठहर
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अब सबकी तरह बनाओ मुझे
रोज़ दस बजे सुलाओ मुझे
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लाइफ को हम फ्री में टफ बना लेते हैं
काम करने को अपनी आदत बना लेते हैं
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रात बाकी है दोस्तों
बात बाकी है दोस्तों
कह चुका हूँ काफी कुछ लेकिन
अभी ख़यालात बाकी है दोस्तों
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तेरे घर में हमारा कोई काम नहीं है
किसी भी मंजिल पे मेरा नाम नहीं है
मुसाफिर हूँ, मंजिल हूँ, रास्ता भी हूँ में
सफ़र में रहने के सिवा मुझे कोई काम नहीं है
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May 27, 2012

भीड़ से अलग आ गया हूँ मैं
लोगों से दूर आ गया हूँ मैं
पहले भी अलग हो जाया करता था
अब अलगाव में ही रह गया हूँ मैं

जाने कब से उस शोर में खड़ा था मैं
जाने क्या ढूंढा करता था मैं
यूँ तो लगता था की कुछ कमी है
पर सबके बीच खोया रहा करता था मैं
अब जो महफ़िल छोड़ी है तो जाना है
शोर में सन्नाटा सुना करता था मैं

अब जो इतनी दूर निकल आया हूँ
वो बरातें वो रोशनियाँ छोड़ आया हूँ
तो वो खुद चल के मेरे पास आती हैं
अपनी तन्हाई की कहानियाँ सुनाती हैं
राजदार मुझे अपना बनाती हैं
दर्द अपना दे मुझे वापस चली जाती हैं
उनके अहसासों में मेरी रात गुजर जाती है

यूँ लगा एक पल, इनमें मैं कहाँ हूँ
साथ रहकर जिनका हो न पाया
अकेले में उनसे मुलाकातें करता हूँ
मेरे खुदा बता दे ये मैं क्यूँ करता हूँ

May 27, 2012

ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है
चले गए जो बाल वो तो वापस न आयेंगे
गुजर गए जो साल वो क्या मिल पाएंगे
जिनके होने से होती थी एक खुशफहमी
वो असर तो न होगा गर ख्याल मिल भी जायेंगे

May 27, 2012

All I can tell you, is where I come from
And I can tell you where all I have been
And may be I can say, why I was there
But I can not tell you how I reached here
For I do not know, I didnt mean to be here
And do not ask me where am I going
I will reach somewhere for I would be walking
And when I have reached I would be able to tell
where I come from, where all I have been
but wont still be able to tell
how I reached there

May 26, 2012

जाने वाले जा चुके हैं
मैं खड़ा हूँ तकता राहें
मन दुखी भी है उदास भी
और शायद अकेला भी
चलता साथ तो क्या होता
थाम लेता हाथ तो क्या होता
शायद हम बिछड़ जाते
हालात ऐसे ही रह जाते
या इससे भी बिगड़ जाते
क्या फरक पड़ता है क्या होता
कुछ तो होता जो भी होता
जो भी होता इतना बुरा न होता
की हम अपने आप से ये भी न कह पाते
जो अब अक्सर कहना पड़ता है
की इससे भी बुरा हो सकता था

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समझना खुद को हो तो दिल टूटना जरूरी है
समझना दुनिया को है तो दिल तोड़ना जरूरी है

May 26, 2012

सेंसिबल समझदार लोगों से
तुम मुझको रखो दूर
तुम करो जो तुमको करना है
मत पूछो मेरा प्लान क्या है
जो आता है कुछ कह जाता है
चार बातें ज्ञान की पिला जाता है
अबे मैं जो चाहे करूँ
तेरे बाप का क्या जाता है?
अरे तू अच्छा आदमी होगा
दुनिया कैसे चलती है
तुझको सब पता होगा
पर एक बार मेरी भी तो सुन
अपनी तो तू कर ही रहा है
एक बार मेरी धुन भी तो सुन
चलने से पहले तू रस्ता खोद लेता है
फिर उसपर आड़ा तिरछा चलता है
कभी लेफ्ट जाता है कभी राईट होता है
फिर ठोकर खाकर सीधा हो जाता है
मैं कहता हूँ चल तू पहले रस्ता खुल जायेगा
एक कदम ले अगला कदम दिख जायेगा
तू कहता है ऐसे कैसे होगा
मैं खोदूंगा नहीं तो रस्ता कैसे होगा
रे मुरख अज्ञानी जग में कहीं कोई रस्ता है?
जग बनाने वाला सुबह शाम हम पर हँसता है
जग तो यूँ ही है एक बड़ा विस्तार
तू जिधर चलता है वो ही रस्ता हो जाता है
जब उसपर सब चलने लगते हैं तो
उधर रस्ते का एक बोर्ड लग जाता है
फिर कोई ग्यानी मुरख मर जाता है
और वो रस्ता उसके नाम पे हो जाता है
इतनी क्यूँ माथापच्ची करता है
क्यूँ मेरे दिमाग का दही करता है
तू यार एक काम कर
मेरी फिकर छोड़ अपना काम कर
में अपना काम कर लूँगा
जिधर तुझे जरूरत होगी मैं मिल लूँगा
बस ये मत बोल ये रस्ता है और ऐसे ही तू चल
फिर मैं तेरे पीछे उस रस्ते पे भी चल लूँगा
अब दिमाग मत खा, घर जा सो जा

May 26, 2012

एक मुट्ठी अनार के
मैंने तुम्हें दिए थे
क्या किया तुमने उनका?

ख़त कुछ प्यार वाले
मैंने तुम्हें लिखे थे
क्या किया तुमने उनका?

वो जो मेरे अरमान थे
वही, जो तुम्हारे लिए
बस सजावट का सामान थे
क्या किया तुमने उनका

मैं कल बारिश में चलता था
धूप में पिघलता था
एक टीला था उधर ही
ऊँचा सा था वो
बड़ा नुकीला सा था वो
बैठ गया था उसके ऊपर
बड़ा मटमीला सा था वो
उसके ऊपर बैठकर
जो मंजर मैंने देखा
मालूम तुम्हें क्या था?
आग लगी हुयी था
सब कुछ ही जल रहा था
धुआं बड़ा काला सा
यूँ, ऐसे, सब तरफ उठ रहा था
एक कुत्ता घूमता था
एक हाथ खींच लाया था कहीं से
पर छोड़ चला गया
इतना कुछ जल गया था
अपनी भूख भूल आया था
चारोँ तरफ देखा उसने
सिर्फ मैं था टीले पे
दौर पड़ा वो मेरी तरफ
आकर बैठ गया मेरे पास
चाटने लगा मेरे पाँव
जैसे कह रहा हो मुझसे
बचा लो इस शहर को
जाकर देखो तो सही अन्दर
शायद कोई सांस लेता हो
अरे कुछ तो करो
कैसे बन गए हो तुम
क्या हो गए हो तुम
जाते क्यूँ नहीं हो
चलो मैं भी चलता हूँ
मेरे साथ आते क्यूँ नहीं हो
पर वो गया नहीं
बैठा रहा मेरे
मेरे पाँव चाटता हुआ
उस धुऐं में ज़हर था
ये उसका ही असर था
की मैं बैठा हुआ था
वो लेटा हुआ था
कुछ आवाजें उठने लगी थीं
बदहवास सी आवाजें
दर्दनाक सी आवाजें
कैसे करूँ बयाँ
बड़ी खतरनाक सी आवाजें
जैसे जानती थी वों
बैठा है कोई उस पार
उस ऊंचे टीले पे
वो साले सब आ गए
जाने कहाँ से वो आ गए
जल रखे थे वो सब
बड़े कुरूप बड़े घिनोने
से हो रखे थे वो सब
मैंने उन्हें देखा
थोड़ा सा हंसा
और ढेर सारा थूक दिया
वो देखते थे मुझको
वो जान गए थे मुझको
अपने लिए नहीं मेरे पे तरस खाके
यूँ ऐसे खुली नयनों से ताकते थे मुझको
वो अन्दर चले गए
शहर के साथ हो गए
वो जो धू धू कर जलती थी
उस आग के हो गए
वो भस्म हो रहे थे
खून निकल आया था
हाथों के नीचे बहकर
जमीं पर लुढ़क आया था
चाटता था जिसको वो कुत्ता
भूख मिटाता था जिससे वो कुत्ता
जीभ अपनी लपलपाकर
आँखों में प्यार दिखाकर
मन में भूख छुपाकर
और मांगता था वो कुत्ता
धीरे से हलके हाथ से
छिले उघडे हुए मांस को दबाया मैंने
वो जो उसमें पड़ सड़ गया था
उस खून को बहाया मैंने
कैसा बेरहम था वो
कितना बेबस था वो
जीने को किसी को तो नोचना था
मेरे ही खून से भूख अपनी
मिटा रहा था वो कुत्ता
सूरज ढल चूका था
शाम भी जा रही थी
वो जिसमें सब कुछ दिखने है लगता
वो रात आ चुकी थी
जो जानता था मैं कबसे
वो सब समझ आ रहा था
वो शहर था अनहोने अरमानों का
उसको जल जाना ही था
बड़े उलझे हुए अरमान थे वो
उनको घुट जाना ही था
मैं खुद से कह रहा था
बैठा रह युहीं इस टीले पे
मत दौड़ उनकी तरफ
तुझको बच जाना ही था
देख अपने भी घावों को
कितनी चोटें लगी हुयी हैं
दर्द नहीं होता तुझको?
खोने को था जो वो तो खो ही दिया
जो खो रहा है उसका
अहसास नहीं होता तुझको?
उठ के चल दिया मैं फिर
उस टीले से नीचे
उस शहर की ओर
पाँव रुकते नहीं थे
नज़र थमी ही रहती थी
जिस ओर भी देखता था
हर चीज़ बात करती थी
झाँका था जिससे बाहर
वो रोशनदान था उसमें
वो घडी, वो पेंसिल वो पेंचकस
क्या क्या सामान था उसमें
सब कुछ नहीं था होने लायक
बहुत कुछ वाहियात भी था उसमें
एक सर मिला मुझे उसमें
किसी प्यारे का था
ओर ये, ये देखो ये किताब, ओर ये कपड़ा?
ओर ये छड़ी जिससे किसी ने मारा था
ओर वो फूलों वाली क्यारी
जिसे हमने खेल खेल में उजाड़ा था
उसके फूल भी थे आज वहां
मुरझाने से पहले जल गए थे
मैंने हाथों में उठाया उनको
वो मेरे जैसे ही तो थे
उनको सहलाया मैंने
मुझे माफ़ कर देना
उनके कानों में बताया मैंने
फिर उनको हाथों से गिरा दिया
साढ़े पाँव में सीधा चल दिया
अब भी मेरे साथ मेरे पीछे
आता था वो वफादार कुत्ता
सूँघता उन फूलों को
चाटता, नोचता, खाता
कुछ बोटियों को, कुछ लोथड़ों को
में जा बैठा था
शहर के बाहर उस तालाब के किनारे
मैं उसमें उतर रहा था
उसके पानी में मिल रहा था मेरा खून
जिसे वो कुत्ता पी रहा था
उसकी भूख मिट चुकी थी
शहर की आग बुझ चुकी थी
मैं अब भी जल रहा था
तालाब का पानी खारा हो चला था
शायद मैं रो पड़ा था

May 26, 2012

वक़्त बदल जायेगा
दरया समंदर बन जायेगा
कुछ देर और ठहर
नामुमकिन मुमकिन हो जायेगा

रो लेने दे तू खुद को
आते है आँखों में गर आंसू
इनके ढुल जाने की देर है
जमीं पे पड़ मोती में बदल जायेगा

आसमां क्या है
बस कागज़ का पेड़ है
खुद चलके आसमां वाला
मिलने तुझसे जमीं तलक आएगा

सीने में समंदर रखते हैं
ओठों पे ज़हर रखते हैं
फकत वक़्त आने की देर है
छुपा दामन में खंजर रखते हैं

क्या समझता है तू मुझ को
क्या क्या कह लेता है तू मुझ को
तू कहता है मुझे रस्ता नहीं मालूम?
रस्ता खुद अपना पता पूछता है मुझ को

फसल उग जाने की देर है
बारिश हो जाने की देर है
तू रुक जरा मेरी फौज सोती है
वरना घर के पिछवाड़े तोपों की ढेर है

आग लगा दूंगा मैं चमन में
रहने न दूंगा किसी को अमन में
बैठा हूँ ले माचिस बारूद के पास
रुक जरा शहर के उठ जाने की देर है

May 24, 2012

वो मैं हूँ …

जो टूट गया वो मैं न था
जो बनता है अब वो मैं हूँ
गिरा था जो वो भी मैं था
दौड़ता है जो अब वो मैं हूँ

बोला था तुमसे राह धरो
थोडा मेरा इंतज़ार करो
रुकता है जो तालाब नहीं
चलता है जो समय वो मैं हूँ