Archive for February, 2009

February 15, 2009

हिंदी कविता: खोया पाया

जब सब खोया, तब खुद को पाया
जो खुद में डूबा वो कब उतराया
तुझ से मिलकर खुद को जाना
खुद के अंदर तुझ को पहचाना

पतंग बना मैं उड़ता हूँ
चिड़िया से बातें करता हूँ
हुयी शाम वो चली घोंसले
मैं किस दर जाऊं ये पूछता हूँ

तूने मुझको उड़ना सिखाया
आसमान से ना डरना सिखाया
फिर कटने का डर क्यूँ है समाया
बेघर बंजारा सा क्यूँ है बनाया

जब तू मेरे ही संग रहता है
फिर गलत राह पर क्यूँ भटकाया
तारों की सी गति दे कर मुझको
जमीन पर है क्यूँ ठहराया

जिस ओर भी मुख कर जाता हूँ
खुद को अधूरा सा पाता हूँ
हर पल हर छन हर असमंजस में
पाकर भी प्यासा रह जाता हूँ

तुझसे मिलने की नहीं है आस मुझको
क्या ढूंढता हूँ नहीं आभास मुझको
पर तू चाहे और मिट ना पाए
इतनी तो नहीं है प्यास मुझको

खुद को तुझको अर्पित करता हूँ
हर डर तेरे शर्नित करता हूँ
मैंने खुद को छला, तू भी ना छल दे
बस इस आखिरी बात से अब भी डरता हूँ