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July 24, 2015

सफ़ेद पड़ता मेरा बदन
उँगलियाँ जमती हुयी, नाखून पिघलते हुए
खिड़की के ऊपर लगे परदे के उस पार टंगी सैकड़ों खिड़कियां
और उनपर ढकी हुयी उलटी तसवीरें
खुले हुए दरवाज़े पे तुम खड़ी थी
जैसे कोई मूरत लगी हो म्यूजियम में
हज़ारों लोग उसको रोज़ देखते हैं
पर उसे मालूम है की ये उसका घर नहीं है

तुम मुझसे मिलने आई थी मेरे हलके बुलावे पर
जो तुमने निकलवाया था अपनी तिरछी, घूमी फिरी बातों से
तुम्हारी दोनों कोनों से बित्ता भर कटी स्कर्ट
तुम्हारे छोटे छूटे नितम्बों के पास से उठी हुयी
जैसे उनके ही सहारे टिकी हुयी हों तुम्हारे शरीर से
उनसे बाहर लटक रहीं तुम्हारी दो भूरी टाँगे

कई दिनों का सूखा हुआ पत्ता
पेशाब के पानी को बारिश की फुहार मान सिहर उठता है
मेरे सफ़ेद पड़ते बदन में ऐंठन हो रही थी

उभर आया था सीने पे एक लाल निशाँ

खिड़की का पर्दा गिर पड़ा था
दरवाज़ा बंद हो चूका था, तुम अंदर आ चुकी थी
तुम्हारी स्कर्ट हट चुकी थी, बहुत कुछ हटना बाकि था
तुम्हारा डर, तुम्हारी हिम्मत, तुम्हारे वहम, तुम्हारे बेवकूफ इरादे

लाल निशाँ फट चुका था, शर्ट लाल हो चुकी थी
बिस्तर पे लेती थीं तुम्हारी दो मोम हो चुकी टंगे

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वक़्त, शहर, घर, होटल; सब ठहर गए थे

तुम थी, मैं था और था एक शख्स
जो सब देख रहा था

था जिस्म, थी जरुरत
थी मोम सी टांगे
थे अंगारों सने हाथ
और था वो शख्स
जो आईना बन घूम रहा था

आइना, जो तुम देखना नहीं चाहती थी
आइना, जो मैं तोड़ देना चाहता था
आइना, जो तुम्हारे इर्द गिर्द लिपट गया था
आइना, जिसे मैं परत दर परत खुरच रहा था

नीचे था एक स्याह तालाब
जिसके तल में था तुम्हारा चेहरा
डर और आकाँक्षा की झुर्रियों से दबा हुआ