Archive for August, 2013

August 31, 2013

बाबा जी कहाँ छुपे हो, बाहर आओ पुलिस खड़ी है
छोडो तुम, ये माला कमंडल, बाहर आओ पुलिस खड़ी है
एक हाथ में उनके है इक वारंट, दूजे हाथ में मोटी छड़ी है
बाबा जी अब आ भी जाओ, बेसब्र कबसे पुलिस पड़ी है

मज़ा किया है तुमने बहुत सा, आओ अब परीक्षा की घड़ी है
हाथ जोड़ो, सत्संग कर के दिखाओ, नाचो कूदो पुलिस खड़ी है
बोलो भैया, छोड़ दो मुझको, समझो तुम्हारी बहेन बड़ी हूँ
राखी बांधो, शीश नवाओ, जो बोला था कर के दिखाओ

बाबा जी अब आ भी जाओ, देखो नीचे पुलिस खड़ी है
पब्लिक भी अब आती ही होगी, जूते चप्पल लाती ही होगी
खाया है बहुत प्रसाद तुमने, थोडा अब जुतियाये भी जाओ
जेल का मैदान बड़ा है, वहीँ बैठ अब प्रवचन गाओ

बाबा जी क्या करते हो, हमको इतना मत तरसाओ
बहुत किया है हल्ला तुमने, जो बोला था कर के दिखलाओ
हम तो हैं सब तुम्हरे चेले चपाटे , हमको सच्ची राह दिखाओ
फूलों पर तुम बहुत चले हो, कांटो से इतना मत शरमाओ

बाबा जी, हो तुम गज़ब हरामी, बच जाओगे हमको भी पता है
पैसा ऐंठा न्यूज़ चैनल से भी तुमने, इनकी टीआरपी इतनी मत बढाओ
बोर हो गए देख शक्ल तुम्हारी, अब हमको नयी कोई न्यूज़ दिखाओ
बाबाजी मान भी जाओ, बाहर आओ शकल दिखाओ

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कभी मेरे सर पर बाल थे, आजकल गंजा हूँ मैं
पहले सरपट दौड़ती सड़क था, अब खडंजा हूँ मैं
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क्यूँ मैं तुमको ये बतलाऊं की कौन हूँ मैं
क्यूँ मैं तुमको ये जतलाऊं की देखो देखो कौन हूँ मैं
मज़बूरी में सीधा साधा हूँ, बन सका न ठीक से हरामी
नाम मेरा क्या करोगे जानकर पर हूँ मैं नामी गिरामी
पल भर में बोतल गटकाऊं और पैग में कर दूँ उलटी
बैठूं जहाँ भी उकडू होक वहीँ निकल जाये टट्टी
काम नहीं, कोई नाम नहीं, नहीं वाहियात रद्दी
मंझा गया सब कटी पतंग संग, बची पीछे बस सद्दी
गया खेलने क्रिकेट मैच मैं संग एक टीम फिसड्डी
सेंचुरी मारने ही वाला था की अंपायर को दे दी गाली भद्दी
वाट लगा दी अंपायर ने निकाला मार के पीछे लात
मैं भी साला चुप्प रह गया, डर था पहुंचूं न बेटा हवालात
सुना है मैंने ‘गिरीश दद्दा’ जी से उधर हैं तूड़ते बहुत
दद्दा जी तो अब तक टेढ़े हैं, हैं दो तीन हड्डियों रहित
वापस आया, चुप चाप बैठा, पैग लगाया सो गया
सुबह उठा, सूअरों को लंच कराया, अपना पाप पुण्य हो गया
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लिख दिया मेरा मुक़द्दर उसने प्याज के पानी से
कागज़ में आग लगाता हूँ तब स्याही उभर के आती है।