Archive for December, 2010

December 22, 2010

tapish…

हर रहगुजर से गुजरा, अनजानों की तरह
अपनों में रहा मैं अक्सर बेगानों की तरह
यूँ तो सजाया गया हूँ मैं भी कई बार
पर पेश हुआ हरदम बस नजरानों की तरह

ये जो अपनी बेपरवाह तपिश है
धीमी आंच पे रखी अंगीठी सी है
सुलगती रहती है उबलती कभी नहीं
महसूस होती है दिखती कभी नहीं

कयास में यूँ ही कई दौर गुजार दिए
दिल खुश्क हो चला इसके इंतज़ार में
दिल के अरमानों को कई नाम दिए
मालूम हुआ कि खुद से रंजिश ही है

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December 15, 2010

Looking why I am

Is someone somewhere,
looking for something,
just the way I am?

am not really looking,
looking for something,
as, looking is what I am.

Are you one of them,
doing something
and saying,
doing what I am?

Do you get bothered when,
people want you to know,
doing this why I am?

tell them not to do it
it doesn’t really matter
this, doing this why I am?

if they still persist
and you cant resist,
just run away by saying,
thats the way I am!

December 4, 2010

जुस्तजू…

ज़िन्दगी अब तुझसे कोई वादा ना रहा
इरादतन जीने का तुझे इरादा ना रहा

जुस्तजू थी हमको जिसकी, वो मंजिल भी आ गयी
मंजिल तो मिल गयी पर, वो जुस्तजू ही ना रही

ये जुनून-ऐ-जुस्तजू है, या जुस्तजू-ऐ-जुनून है
ज़िन्दगी किसी पहेली में फंसे रहने का खेल है

ना होती जो ये उल्फत, तो कोई और गफ़लत होती
जो ये तड़प ना होती, ये फितरत भी तो ना होती

सौ ज़वाब मिलते, तो भी सवाल होते
हर बला से छूटे, तो भी बवाल होते

दुनिया है क्या बस ख़ाक-ऐ-परस्ती है
बुझती हुयी शमा के परवानों की बस्ती है

मालिक ने दे दिए हैं सबको चार दिन
काटने को इनको दिए दो ख़ुशी दो ग़म