Archive for December, 2013

December 5, 2013

रात फिर अनज़ान मंज़िलों ने आकर पूछा
हमारा पता मिल गया?
नहीं? तो फिर खाली कैसे बैठा है?
चल उठ, कुछ काम कर

मैं ना हिला
दबाकर रिमोट उँगलियों के बीच चैनल दबाता रहा
छोटी छोटी उलझनों को दोहरा के उनको बड़ा बनाता रहा
कल कैसे सुलझाऊंगा उनको, उसकी बिना बात स्कीमें बनाता रहा
खैर मैं तो निकम्मा हो ही चला था
खुद से इससे अधिक क्या उम्मीद रखना
पर ये अनजान मंज़िलें,
इनके पास बड़ा काम है
बड़ी हरामी चीज़ हैं ये
जब भी कोई राही
इनके पथ से पथ भटककर कोई और मंज़िल पा ले
कोई सराय, कोई आराम का घर, कोई पानी का तालाब पा ले
कोई नुक्कड़ कि रंगीली चौपड़ में उसका मन लग जाये
या किसी सुनहरी ज़ुल्फ़ वाली के नितम्बों में उसका मन अटक जाये
तब, ऐसे हर एक सुकून से भरे क्षड़ में ये बरबख्त करमजली आ टपकती है
बड़ी मस्ती भरे रुआब से अपनी आमद फरमाती है
कभी दूर से सीटी बजाते हुए,
तो कभी गले में घंटा टांग कर आती है
कभी कभी तो चुप चाप हौले से बिना आहट के, बिना बताये, बिना दरवाज़ा खटखटाये
अंदर आ जाती है और आकर पलंग के पास खड़ी हो जाती है
देख कर अपने दीवाने कि सुकून वाली नींद, मंद मंद मुस्काती है
खुद से कहती है, आदमी बनता सा लगता है, अब साले को कुत्ता बनाती हूँ
मुझसे दोस्ती करना कितनी टेढ़ी खीर है, अब ससुर को समझती हूँ
तुम मुझसे दूर हो भी जाओ, मैं एक बार चपक गयी तो दिन हो या रात
घर हो या बहार, वक़्त बेवकत, मूड बेमूड, चौबीसों घंटा एक ही सवाल पुछवाती हूँ
मिल गया मेरा पता? कहाँ हूँ मैं? खोजो मुझे
धीरे से मेरे बाल सहलाते हुए उसने फ़रमाया
मेरे लाल चल उठ जा, मेरी खोज नहीं करनी
मैंने तकिये को हाथों के बीच जकड कर कहा
सोने दे डार्लिंग तम तो यहीं हो, कहाँ जाऊँ तुझे खोजने
उसने कहा साले, बिना पेंदी के पियाले, उसळदानी में पड़े बिना पिसे मसाले
अब मैं तुझे बताती हूँ, देख कैसा सताती हूँ
तू खोज खोज थक जायेगा, हाथ नहीं आउंगी
खूब उछलेगा कूदेगा, सेंटी मरेगा
गुमसुम हो जायेगा
जैसे गले के भीतर दबा के रखी हो एक आंसू की थैली
ये सब करके मुझे गिल्टी फील कराएगा
पर मैं हाथ न आउंगी
दूर खड़ी रहूंगी, तमाशा देखूंगी
साबुन लगे हाथों के बीच गिरते पानी कि तरह
मैं तुझे छू छू के फिसल जाउंगी

 

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khud se hi baatein karo wohi achchha hai
auron se karoge to wo gair bante jayenge

abhi jaan-pehchaan hai dua salaam ho jaati hai
kabhi fursat ke palon mein baat ho jaati hai
haal mil jaata hai waqt guzar jaata hai
koi baaton ka guchchha zindagi mein thahar jata hai
roz miloge, khayal karoge, sochoge bulaunga to aayenge
pichhli mulaqat ki gudgudi yaad karke ke sochoge, aaj kitna hansayenge
wo aa bhi jayenge bulane par, lekar ek bandhi si hansi
saath chalenge, kuchh kahne ko na hoga, anokhi baat kahoge
kuchh zamane pe hansoge, kuchh khud ko sharminda karoge
wo baaton ka khilkhilata guchchha, gale se lipat jayega
khushboo to na hogi, fande sa ban jayega
sochoge ye kya hua, kahan gayi wo gair-masrufiyat
tab samajh aayega ki baat jo khud mein hai wo kisi mein nahin
wo khoye rahne mein, simte rahne mein,
apni hi kheenchi linon mein uljhe rahne mein
wo beeti baaton ka pari-drishya, wo aane wali tasveerein
wo aaj ke chitra-patal par ukeri aadi tirchhi lakeerein
wo hi to hain, bas wohi to hai, haath laga ke rakhne ko
wo to hai is khamosh zamane mein dil tika ke rakhne ko
unse hi raho qarib, na dur bhatak jaya karo
na jaya karo yun auron se ubharte sheeshai pratibimbon ki aur
aa jao apne ghar ye ghar uljha hua hi sahi
pakad ke rakho iski parchhatti,
eetein iski sarakti huyi hi sahi
ki ban raha hai ye aur saath iske ban rahe hain hum
girega to iske malbe mein na dab ke rahenge ham
niklenge bahar aur chal denge ghumne duniya
laut ke aayenge to baithenge unhin eeton ke dher pe
ho sakta hai le gaye hon log utha kar unko bhi
to khali huyee zameen pe bichha chadar letenge
aur takeinge sitare ko jo ugta hoga thik upar chhat par
wo bhi chala ajayega, peechhe subah ki peeli chadar ke

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हम कुछ भी नहीं करते हैं खुद से
सब कुछ वो करवाता है हमसे
हाथों में दे आंसू का प्याला
फिसलती सी हंसी निकलवाता है हमसे

rone ka hunar bhul aaye hain kahin
‘Nasir’ ko padha to phir khayal aaya

ham mein bhi pale ‘Nasir’ si thandi aag kaise
aanshuon ko panaah deni hogi ye jawaab aaya

kuchh der huyi koi taqleef nahin,
hai thandak kyun nahin phir seene mein
seene ko pakde phira karte the
khol ke maal lutaya to araam aaya

Nasir ko padha to ye ahtaram aaya
Sab kuchh karke bhi kyun nahin araam aaya

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की अक्सा अक्सा रक़ाब उठ रहा है
की अक्सा अक्सा बेनक़ाब हो रहे हैं हम

जाकर बड़े शहर में कौन खुद को खो दे
हम तो छोटे शह्‌र में ही खुश हैं ग़ालिब

ये काला हिस्सा मेरा ही है
हाथों के उपर से सरकता हुआ
कुछ देर थम कर हथेली के पीछे
मूझे अपने होने का अहसास करता हुआ
ये काला हिस्सा मेरा ही है

काली है
ए रात तू बिल्कुल काली है
चमकते थे पहले जुगनू तुझमें
पर अब तू बिल्कुल काली है

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