Archive for October, 2015

October 12, 2015

समंदर की लहरों के बीच पानी की एक बूँद
सूरज की किरणों में चमकता धूल का एक कतरा
वक़्त का रिसता हुआ एक पल
हाथों के स्पर्श को ढूंढता उढ़का हुआ दरवाज़ा

पर खुलने का इंतज़ार करती चिड़िया
वादियों में बहता हुआ एक कम्बल
आँखें मींचे कृतिम ध्यान में लीन साधु
ढलान पे खिसकती साइकिल

आज आईने ने कोई शक्ल अख्तयार नहीं की
सारे मुखोटे उतर गए

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