Archive for June, 2013

June 10, 2013

दर्द भी न रहा प्यार भी न रहा
चैन भी न रहा करार भी न रहा
दौड़ती थी दिलो में धड़कन मंद हो गयी
गूंजती थी ज़हन में आवाज़ वो सो गयी
हम हैं नहीं है कौन जाने ध्यान कुछ न रहा
कल ही कहा था जाने क्या याद कुछ न रहा

खोल दौड़ जायें जिसे वो द्वार भी न रहा
बैठें जहाँ मंज़र लगे वो अहसास भी न रहा
आगे नहीं कुछ न सही पीछे पलट के भी क्या करें
छोड़ा था जिसको जिस मोड़ पे वो उस मोड़ पे ही न रहा
पलटे तो पाया कुछ नहीं, कुछ था ही नहीं जो छूटता
छोड़ा था खुद को जिस मोड़ पे वो मोड़ भी न रहा
आगे सड़क है, बिछोना है बिस्तर है रात है बात है
चलने में बस रफ़्तार है अंदाज़ अब न रहा
जितने कदम आगे चलें लगता है पीछे आ गए
जो भी मिले सब आम है ख़ास कुछ न रहा
बुत मिले काफिर मिले थी सबकी शक्लें एक सी
बातें बहुत देर की पर फिर भी लगा मिला नहीं
खोये थे हम जागे जब आवाज़ संतरी ने लगाईं
जाग के भी करते क्या देर तो हो गयी
एक अफसाना है मंजिल है है गीत कई गुनगुनाने को
कहती थी चलो कुछ कहते हैं वो ललक ही खो गयी
जाने किसकी मौत हुयी हम तो अभी जिंदा है
सोच कर भी जाना नहीं आखिर बात फिर क्या हुयी
खेत है पौधे हैं पानी भी है भरा हुआ
फसल ही नहीं हुयी बरसात तो खूब हुयी

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अपने अन्दर का लौंडा जगा कर रखो
एक कोना दिल का संजीदगी से बचा कर रखो
दुनिया वालों के पास नहीं है इलाज़ कोई
दर्द-ए-दिल को हकीमों से छुपा कर रखो
आज मिला है वक़्त आज ही काम निपटा लो
अपने इरादों को वक़्त की आंधी से बचा कर रखो
जब भी चलेंगे ये खुद को ही करेंगे घायल
अपने हथयारों में जंग लगा कर रखो
जल्दी क्या है, आज नहीं तो कल मिट जायेगा नाम-ओ-निशाँ
बुझने की जल्दी में भभकते दिए को ये बात बता कर रखो
न पूछ कर आता है वक़्त न बता कर जाता है
आये तो खड़े हो सको, हौसला इतना बचा कर रखो

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सिर्फ जहाज ही नहीं खो जाते
कुछ समुंदर भी गुमशुदा होते हैं
हर रोज़ लेटे हुए उबती उंघती आँखों से
उबकाइयों , उबासियों, झपकियों के बीच से
देखते हैं गुज़रते, रोज़ रंगत बदलते चाँद को

जिन्हें रहती है तलाश
होती है जरुरत, होता है इंतज़ार
किसी भटके हुए जहाज का
किसी खोजी दस्ते का
किसी मचलते हुए कारवाँ का
किसी खोये हुए मुकाम का
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ऐ दुनिया,
तेरे हाथों की मिटटी हूँ
तेरे पैरों के निशाँ हूँ
तेरी हथेली की धूल हूँ
तेरे पतलून की जुराब हूँ
खड़े होते हैं लोग अक्सर जिस मस्जिद पे
उसकी उखड्ती हुयी मेहराब हूँ
जो थी कभी खड़ी सीधी
देता था बांग जिस पर से मौलवी सुबह को
और रातों को उगलती थी ये काला गहरा धुआं
अब है सिर्फ कालिख बची आग तो बुझ गयी
सीढियां ढेर हुयीं, सामान खो गया
इकट्ठे होते थे जहाँ लोग वो दालान
अब तो बस मिटटी और गारे का एक मलबा हो गया
जागता ही रहता था जो जुगनू भी अब तो सो गया
पीठ पर पड़ते थे जो हाथ अब गोया तमाचा हो गया
आया था सादिक घूमने और था बड़ा अचंभित सा
चंद रात ही बहार रहा और इतना तमाशा हो गया?

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एक लकीर बना के मिटा सकूँ तो कोई बात बने
एक तस्वीर बना के लटका सकूँ तो कोई बात बने
घर के अंदर से तो देखा है बहुत देर तलक सूरज को
एक ज़रा हाथ लगा सकूँ तो कोई बात बने

एक ज़ख़्मी सी चादर हूँ ओढ़ के लेटा हुआ
छेदों से झांकता हुआ दबी सी सांस लेता हुआ
एक ज़रा करवट दिला सकूँ तो कोई बात कहूँ
मुर्दे में अहसास ज़गा सकूँ तो कोई बात कहूँ

हैं शीशे कई कमरे में रखा है करके बंद जिसमें
है आदमकद कोई, बौना, है दिवार पर जड़ा हुआ
देखूं शक्ल जिसमें है कोई नहीं, है हर एक ही चिटका हुआ
किसी को तोड़ के आइना बना सकूँ तो कोई बात कहूँ
मुर्दे में अहसास ज़गा सकूँ तो कोई बात कहूँ

मत कहो मुझसे कुछ कहने को की मैं कुछ कह ही बैठूँगा
फिर कहोगे ये क्या कहते हो कुछ और कहो ये नहीं कहना था
ये ही कहना था तो बेहतर से तुम्हें चुप ही रहना था
खामोशियों को मैं आवाज़ बना सकूँ तो कोई बात बने
बाँध घुंघरू उन्हें सरे बाज़ार नचा सकूँ तो कोई बात बने

June 3, 2013

wahan dur gagan mein jo tu dekhta hai
uski kali parchhaiyon mein jo tu dhundhta hai
wo tara wahan par hai hi nahin
ae pagle tu kyun nahin ye sach dekhta hai

neeche ke gagan mein jhaank jara
dharti ki tah mein dekh jara
dekh wahan kya rahta hai
wo jo tujhko hi dhundhta hai

us ajgar se tu lipat jara
munh khol uske daant gin to le
kab se jabron mein hain fansi ek baat
nikal use tu ro to le

hai raat bahut lambi maana
hai timir ghira sab jag suna
suraj se hi ye sab jayega
par suraj kab tere liye hi aayega

aayega jab wo aana hai
uski niyati nahin tere sang hai
chanda bhi nikalega apni gati se
tu chaddar to ek taan jara

aa neeche jara baith shwaas to le
dharti ki tu thori thaah to le
un pushpon se mil jo jane kab se
apni khusbu wali baahein khole hain khade

tu dekh jara neeche ko dekh
jungle hai, mad hai, andhapan hai
tu latka hai kabse pakde jhula aasmani
ye bhi to bas tera pagalpan hai

tu aankhon wala andha hai
chal sakta hai par tu langda hai
hai chaal teri matwali maana
par tu bas ghas charta ek arbi ghoda hai

chal been utha koi saanp pakad
kuchh tikdam kar, uspar yun akad
kuchh jhuti muthi baatein hi kar
chhor paijama naada ab pakad

aaja aaja ab khelnge
mitti ke kulhad mein chai bhi pi lenge
pyala mad ka ham bhar lenge
usse geeli apni bushat bhi kar lenge

tar hoja hai baarish aane wali
soch ke rakh kuchh matwali gaali
jhumenge ham us free ke shower mein
sab mail badan ke dho lenge

kar de man ghar ko tu ab khali
man par nahin koi bojh tu rakh
ho tapakta sawera ya ho sukhi raat
tu chaal apni bas matwali rakh