Archive for October, 2014

October 21, 2014

एक चिड़िया मेरे हाथों से कूद गयी

कुछ केहते हैं वो उड़ना सीख गयी

कुछ केहते हैं उसकी टांग टूट गयी
सब कुछ ना कुछ केहते हैं
बस वो चिड़िया कुछ नहीं कहती
जाने क्या मंज़र देखा उसने कूदकर
की सच केह्ता हूँ वो है फुदकना भूल गयी
 ————————
जब वक़्त सो जाता है

मन चिड़िया बन उड़ जाता है
तब अक्सर घर के गलियारों में
मैं खुद से मिलता हूँ
बिछड़े यारों से मिलता हूँ
चुप्पी में बंधे थे जो शब्द वो केह्ता हूँ
और करके कान बाहर को खिड़की से
वक़्त की सिकुड़ी चादर में
सलवटों में लिपट आये
अंधेरों में सिमट आये
तन्हाई में सुलझ आये
उन काग़ज़ के ढेरों को बुनता हूँ
हाँ, मैं खुद से मिलता हूँ
————————————

बहुत शहर देखे, कई गाँव भटके
किसी की धूल बटोरी, किसी के पत्थर समेटे

Advertisements
October 12, 2014

ek mutthi ret daal baithe
main bhi tum bhi
dafn ho chali wo dastaan jismein the
main bhi tum bhi

kal yahi se to uth kar gaye the
mein bhi tum bhi
chhod peechhe un palon ko jinmein the kaid
main bhi tum bhi
pal, jinmein gunahgaar the donon
pal, jinmein talabgaar the donon
uljhan ke shikaar the donon

un yaadon ki zameen pe
dafn armanon ki khaad se
zamindoz ansuon ki nami se
ek paudha ugega wahan
jiski khushbu mein phir se ji uthenge
alhada alhada
main bhi tum bhi