Archive for July, 2014

July 21, 2014

ऐ मुक़ाम
तू जब भी मिले
ये जानना
की आज तुझे होती है खुद से नफरत
होती है घुटन
होता है सफर के पूरा होने का गुमान
होता है ज़िंदगी के खत्म होने का खाली होने का अहसास
पर कभी तुझे इसकी ही जुस्तजू थी

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ना मंज़िलें हैं ना मुक़ाम हैं
ना हसरतें ना आरज़ू
ना सफर ना सफर का गुमान
मुंह में आवाज़ नहीं
सीने में पुकार नहीं
इसको क्या कहते हैं
इसका कोई नाम नहीं

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July 7, 2014

चलता नहीं हूँ मैं
रूका भी नहीं हूँ
बस गुजरता हूँ
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कहाँ को चले थे और कहाँ जा रहे हैं

जानी पेहचानी राहों पे फिर अज़नबी मुक़ाम आ रहे हैं

खिलखिला के आवाज़ दी हमको उन फूलों के बगानों ने

कब्र पे जिनकी सजदा हम हर रोज़ करते आ रहे थे

क्या मर्ज़ी है तेरी मौला, है उम्मीद की तुझको होगा मालूम

काशी मिले, कब्र मिले, मक़बरा मिले, जो मिले ठीक है

हम तो ना उम्मीदी में आँखें मीचे यूं ही चलते जा रहे थे
 

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एक तारा टूटा है
मत पूछो किस शाख से निकला है
मत जानो किस आह से उपजा है
बस ये जानो की वो निकला है
वो पिघला है, पिघल के निकला है