Archive for January, 2013

January 29, 2013

मेरे ही खड़पंजों में है मेरी जान फंसी
कब तक न तू निकलेगी और रहेगी मेरी जान फंसी?
मिल जाये अगर भी तो ज्यादा देर सम्हलती नहीं है ख़ुशी
धीरे धीरे खुद के ही अंदर घुटने लगती है हर एक हंसी

कोई ऐसा ध्येय नहीं है जो लगता हो खुद के काबिल
भागे जिस जिस के पीछे, पाया खुद को वहां नाकाबिल
खुद को किया आज़ाद तो बन गयी आजादी बेमतलब
सोने के ही लिए उठे थे तो बोलो उठने का क्या मतलब?

January 18, 2013

माँ

मैंने कभी तुम्हारे पाँव नहीं दबाये, सर नहीं सहलाया
जब भी बोला तो ऊँची आवाज़ में आवाज़ दी
जब भी जगाया गहरी नींद से उठाया
हाँ कई बार तुम्हें गले से जरूर लगाया
पर ज्यादा देर लगाये रखा नहीं
और लगाने के फ़ौरन बाद चाय की फरियाद की
ज्यादा देर पास रुका नहीं, कोई किस्सा पूरा सुना नहीं
पैसे पहुंचा दिए पर सर्दी में गर्म कोट ला सका नहीं
तुम कहती रही तुम मेरी हो,
पर बातों पर विश्वास मुझे कभी हुआ नहीं
तुम ज़माने की फब्तियों से मुझे बचाती रही
मोटी खुर्द हो चली उँगलियों से बाल सहलाती रही
अभी तो बहुत बचे हैं, बाल, ये झूठ सच की तरह बताती रही
और मैं भागता रहा, अपनी किस्मत संवारता रहा
लोगों से मिलता रहा, सड़कों पे फिरता रहा
तुम्हारी गैस पर उबली चाय छोड़
चाइनीज़ स्टाल पर नूडल्स खाता रहा
पर इन सब भटकने के बीच
बाकी मेरा तुझसे बस ये एक नाता रहा
जब हँसता था तो तमाम लोगों की शक्लें ध्यान आती थीं
पर रो पड़ता था जब भी तेरा ज़िक्र, तेरा खयाल आता था

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ये ठहरी ठहरी सी मज़िलें, ये बेनकाब हो चले इरादे
दिल ये कहता है की इनके पार वो जाये तो क्यूँ

इस पार कोई हलचल नहीं, उस पार नहीं कोई मंज़र हंसी
खड़े रहना में है मौज़ कैसी, और कदम कोई बढ़ाये क्यूँ

January 18, 2013

चलो इस रात में कोई सफ़र करते हैं
कहीं दूर जाते हैं कोई मंज़र तलाशते हैं
इक तालाब इक सड़क इक दरिया तूफानी
जिसके थमे पानी में झांकते हैं गहरे तक
और कूद लेते हैं इसमें पकड़ने को
उफनते चाँद की परछाइयाँ

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बड़ा सीधा सा मुआमला है
इसमें मोहब्बत जैसा कोई भी बेरंग बवाल नहीं

January 18, 2013

एक गुमनाम रस्ता है
इक सरफिरा राही
उस सड़क पर खुलती हैं कई राहें
सबमें झांकता हुआ
किसी किसी से होता हुआ
खोता हुआ, मिलता हुआ
गले लगता हुआ, ज़ुदा होता हुआ
पोंछता किसी के आंसू
खड़ा होकर किसी जलती बुझती बत्ती के नीचे
रोता हुआ, रस्ता देखता हुआ, लिफ्ट मांगता हुआ
कुछ पानी को बह जाने देते हुए
कुछ से अपनी चावल की पोटली को सींचता हुआ
वो गुमनाम नागरिक भटकता है उस सरफिरी सड़क पर

एक झोपडी जिसके भीतर से आती है रौशनी और साथ हौले से रोने की आवाज़
आवाज़ को सुनता हुआ, धीरे धीरे उसकी ओर कदम बढ़ाता हुआ
लाकर देता पानी का गिलास उस सुबकती हुयी औरत को
जो लेटी है चारपाई पर, थोड़ी बीमार सी लगती हुयी, सिसकती हुयी, सिमटती हुयी
पाकर पानी का गिलास और देख दो संजीदा आँखें
गटकते हुए पानी अपनी आँखों में चमक पाती हुयी
जैसे उसने ही रचा था ये सारा स्वांग, पकड़ने को उस सिरफिरे राही को
उसे सुननी थीं उससे कहानियां, जानने थे सरे राज़ उस सिरफिरी सड़क के
जिसपे वो चलता था, जिनपर वो अक्सर रहता था
जानना था क्या है उन तंग गलियों में, जिनसे वो गुजरता था
गलियां जिनमें वो जा नहीं पाती थी
जिनके मुहरे पे खड़े होकर कई बार उसने देखा था
जिसके अंदर से आती चीखों को किसी नाटक का शोर समझ कर उसको हुआ था कौतुहल
जिसके अंदर से कभी कभी बहार झांकती कटी फटी लाशों को देख कर वो जाती थी सहम
और वापस लौट जाती थी अपनी झोपडी में
लेट जाती थी वो बिस्तर पर जल कर एक दिया
जैसे उसे तलाश थी, उन्हीं कटी फटी लाशों की
जो भटक गयीं थी, जो छिटक गयीं थी
जो पाकर उसके दालान का पेड़
दोनों बाहें फैलाकर उनसे लिपट गयीं थीं
जिनको वो देखा करती थी अपनी खिड़की से
और एक कातिल कामिनी सी मुस्कराहट के साथ
बंद कर लेती थी अपना किवाड़
उसी दालान से होकर, उसी दरवाज़े से गुजरकर
अन्दर पहुंचा था उस घर में वो सिरफिरा राही
उसने देखे भी न थे दालान से लिपटे हुए प्रेत
जब तक खुद दिखाए नहीं थे उस औरत ने खोल कर वो किवाड़
और फिर बहार जाकर दोनों ने देखा था उन लटके हुए मेहमानों को
जो सूख चुके थे, और चिपक कर पेड़ से उसके ही हो रहे थे
खुरच कर पेड़ से उनको निकलना चाह
पर अब ये मुमकिन नहीं था, इससे कुछ हासिल नहीं था
तभी पीछे के एक पेड़ से गिरी एक सूख चुकी लाश
जिसकी साँसों में बाकी थी कुछ सांस, जिसके हाथ अब भी हिलते थे
और जिसको सम्हाला अपनी गोदी में उस अजीबोगरीब राही ने
जिसकी बाहों में उसने दम तोड़ दिया लेके चंद साँसे
देखता हुआ उसके पीछे कड़ी उस लड़की को,
ताकता आसमान को, पकड़ता अपनी उखड़ती साँसों को
और छोड़ कर उसको एक तालाब के किनारे,
जहाँ से ले जाने वाले थे मगरमच्छ उसको खाने के लिए
आकर लौट गए दोनों फिर से चारपाई पे
वो शख्स सीधा हाथ माथे पे रखे देखता हुआ झोपड़ी की छत
और उसके दरमियान वो सितारों भरा आसमान
और वो औरत लिपट गयी उससे जैसे बदन से कम्बल
दोनों तमाम रात लेटे रहे, कहानी कहते रहे
वो बताता रहा उसको दास्ताँ अपने हर मोड़ की, गली और सड़क की
जब तक वो लुढ़क न गयी होकर बिधाल उसकी बाहों में
और वो भी सो न गया बंद करके अपनी पलकों को चंद लम्हात के लिए
की जिनके वो उठा और हलके से रखकर बगल उसके हाथ
उठ कर चल दिया फिर से उसी सड़क की तरफ जिससे वो आया था
उसने उठकर उसको पीछे से जकड लिया, दूर जाने न दिया
पर खोल के उसका बाहुपाश वो फिर से चल दिया
छोड़ कर पीछे कोई परछाई, कोई विषाद, किसी किताब का पन्ना
पन्ना जिसे नाव बनकर बह निकलना था किसी पानी के धारे में
और मिलना था उस राही से बहुत दूर किसी किनारे पे
जब उसको लगी हो प्यास और सड़क गुज़रती हो किसी मरुस्थल से
और झुक कर देखने पर उसको पाना था ज़मीन के नीचे
वोही धीमे से सरकती नाव, लेकर अपने ओक में पानी
पानी जो थी ओस जो रस्ते से बटुर आई थी
पानी जो थे अनायास रिस आये बदन के आंसू
नाव जो होकर आ गयी थी नीचे से उन्हीं तंग गलियों के
जिनको उसे जीना था, देखना था, करना था महसूस
और उस दिन जाना था दोनों ने वो क्यूँ मिले थे
क्यूँ दोनों ही थे राही एक ही सड़क के
एक को अन्दर से जाना था, संकुचित रहना था
एक को उनके बीच से गुजरना था, बर्बाद होना था
दोनों को संग चलना था पर साथ न होना था
वो नाव थी कागज़ की और वो राही था समंदर का
एक को बहते जाना था और एक को तैर के आना था

January 17, 2013

और वो कुत्ता दौड़ पड़ा सड़क पे
भागता किसी ट्रक के पीछे
कभी किसी तेजी से गुजर गयी जीप पे भौंकता
कभी बचता खुली कार से फेंके गए पत्थर से
वो कुत्ता अपनी पूंछ हिलाता
मुंह अपना अपनी पसलियों में रगड़ता
देखता ऊँची छतों की मुंडेरों पे टंगे रोशन चेहरों को
सोचता ये रोशनियाँ कब उसको तर बतर करेंगी
देखता वो छोटे घरों हिलती दीवारों वाली झोपड़ियों को
सोचता ये दीवारें कब मुझको बसर करेंगी
ढूंढता खुले आसमां में कोई रंग खोया हुआ
आसमां की सीढ़ी सपाट नीली चादरों में
ढूंढता सलवटों को, उधरन के निशानों को
और पाता कुछ नहीं, पाता सब कुछ वैसा जैसा है
सीधा सपाट और समतल
है नहीं कोई दरवाज़ा खुला, है चमकता कोई मकान नहीं
जहाँ जाकर सफ़र रुक जाता हो, है वैसा कोई मुकाम नहीं
है कुछ नहीं छुपा बादलों के पीछे
वो तो बस हैं पानी की सुखी बाल्टियाँ
है और कुछ नहीं उनके पीछे
है कुछ नहीं छुपा आसमानों की कतरनों में
वो एक सीधा कपडा है, उसके कोई टुकड़े नहीं
और मैं, वो कुत्ता, खड़ा हो जाता है सर झुका कर
पैरों से रगड़कर जहाँ भी मिली उसे गरम सॉफ्ट मिटटी
वो लेट गया रख के सर अपना पैरों के बीच
कभी पलट कर देखता, कभी यूँ ऊपर को
ढूंढता कुछ उन खो चुकी आँखों से
झांकता पीछे से उन बंद हो चुकी आँखों से
बैठा बैठा सूंघने लगा ज़मीं
जैसे जब आसमां में न मिला तो अब ज़मीं को तलाशेगा
उसको है खोजते रहने की धुन, एक घिस चुकी रिसती आदत
वो खोजेगा, क्यूंकि उसके बिना वो रह न सकेगा
और वो सो गया
सोते में किसी ने फेरा हाथ उसके सर पर
रखा आगे एक दूध का प्याला, एक रोटी का टुकड़ा
खाकर उसे में उठ पड़ा, आँखों में चमक लौट आई थी
और वो जाकर अपनी कार से निकाल लाया एक नाजुक मोटा पट्टा
दाल जिसको मेरे गले में वो मुझे अपना बनाना चाहता था
और तभी मुझको दिखने लगीं उसमें तमाम बुराइयां
कितना मोटा है ये, साल हँसता बहुत है
कपड़े देखो साला चमकता बहुत है
मैंने पलट कर देखा, दुकानें खुल रही थीं
हलवाई की दूकान पे जलेबियाँ ताल रही थीं
मुझे तो उनकी तलाश थी
हर दिन नयी बनती, नया स्वाद लेकर आतीं
बैठ कर कार में कौन खायेगा रोज़ वोही डबल रोटी
एक जैसी कटी हुयी, एक जैसी बनी हुयी
पास आकर उसने मुझे पुचकारा,
पट्टा मेरे गले के पास भी लगाया
मेरे छिटकने पर भी न हुआ नाराज़
अपनी भलमनसाहत से मुझको और छोटा फील कराया
उससे पीछा छुड़ाना मुश्किल था
तभी दूर आसमान में उभरी एक आवाज़
एक बड़ा पंछी, एक खूंखार दरिंदा
वो जिसके सर पर घूमता रहता है घड़ घड़ करता एक विशाल पंखा
हाँ वो उभरा, और मैं भाग पड़ा उसकी तरफ
छोड़ पीछे उस रेशमी पट्टे वाले को
भागता, भौंकता, गली के और कुत्तों के साथ रेस करता हुआ
पर था जनता की मैं उन जैसा नहीं हूँ
वो भागते हैं देखने को की कौन आया उनके इलाके मैं
की क्या है वो ही उनका मसीहा जिसके बारे में लिखा है उनके ग्रंथों में
क्या वो उतरेगा आज नीचे और वापस दिलाएगा उनको वो सब जो उन्हें का है
वो बड़ी ऊँची इमारतें क्या वो ढहा देगा जिसकी छाया में वो सो नहीं पाते
क्या उनकी हो जाएँगी कल से ये मिठाई की दुकानें
क्या लगेगीं उनकी ही तस्वीरें पत्थरों की अब हर चौक पे
जिस पे मूतना ही अब उनका सम्मान होगा
और वो आज भी निकल जाता है हमको पीछे छोड़ के
छोड़ हमको लौटने को वापस उन्हीं मुकाम पे
वोही दुकानें मिलावटी, पुरानी, जरुरत से कभी ज्यादा मीठी,
कभी समोसे में आलू का छिलका न उतरा हुआ
वोही तेजी से दौड़ती गाड़ियां, उनसे निकलता धुआं
हमारे मुंह को कालिख से रगड़ता हुआ धुआं
वोही बुझती हुयी रात के अलाव की ठंडी हो चुकी राख
वोही लेटकर उसपर देखना दूर जाती कार को
देखना उसमें जीभ निकले बैठे उस पालतू कुत्ते को
और याद करना उस कार वाले को और सोचना उसके पट्टे को
और भौंक देना उस पालतू जीभ लेट कुत्ते पे
उसका चले जाना आगे की सीट पे अपने मालिक के पास
जिसने सहलाया उसे, सीधा किया उसका पत्ता और दाल दिया एक बिस्किट उसके आगे
और मैंने सर रख दिया अपना फिर से अपने पैरों के पीछे
शायद चाहता हुआ पट्टा पर ये कहता हुआ
मैं वो नहीं जो बांध जाते हैं पट्टे से
पाते हैं दुलार पर रहते हैं उस बंद डब्बे के अंदर
मुझको तो उस आसमानी चिड़िया की तलाश है
लेकिन इस लिए नहीं की मुझको पानी है अपनी आजादी
न ही मुझको लगवानी है अपनी स्टेचू किसी चौराहे पे
मुझको तो जानना है उस चिड़िया के भीतर कौन है
जानना है की वो क्या है, क्यूँ है, उसे किसकी तलाश है

January 17, 2013

और कौन बचा है,
बस तुम ही हो तुम ही हो
हाथों से सरक क्यूँ जाते हो
बस तुम ही हो तुम ही हो
जब दूर चले जाते हो मुझसे
महसूस नहीं कर पाता हूँ
लेता हूँ सांस तुम्हारे लौटने के इंतज़ार में
और दम घुटता सा जाता है
हर दम हर पल हर छीन जैसे
एक बेचैनी चढ़ती जाती है
कहने लगती है मुझसे बातें कई
एक बात भी सीधी नहीं लग पाती है
वो बातें जो बीत गयी,
वो गीली गलियाँ जो सूख गयीं
सब मिलकर मेरे उदर में गुड़गुड़ाती हैं
निकलती हैं मेरे अंदर से एक हिचकी बनकर
एक तलाश होकर, एक अरदास बनकर
कहती है चल कहीं दूर चलें
चलें जहाँ बहुत पैसे मिलें
हम काम में डूब जायेंगे
खुद को लाद लेंगे इतना मोहपाश में
खुद को जकड़ लेंगे यूँ पैसों के जंगले में
की कभी फिर उससे बाहर झाँक न पाएंगे
हो न सके अपने तो क्या, किसी के तो होकर रह जायेंगे
लेकिन फिर कहती है वो ठंडी स्वांस
लेकर दो तीन और वो गहरी स्वांस
तू वहां नहीं रह पायेगा
तेरा सर बरबस ही फट जायेगा
हाथों में लेकर सर को तू
सडकों पे मार मार भटकेगा
तू बन जायेगा वोह रिच-बैंक रप्ट
हालत जिसकी कोई भी नहीं समझ पायेगा
वो गरम ऊँचें जंगले वाले
झांकेंगे उनके पीछे से
चुस्कियां लेते ऑफिस की काफी की
तेरी हालत पे भी चू चू कर देंगे
कह देंगे कोई बात संवेदना की
कर लेंगे अपने दिल को भारी
समझा लेंगे खुद को ऐसा ही होता है
ऊँचे जंगले से कूदने वालों का
तू बैठ सड़क पार उन्हें देखेगा
उनकी कोमल गद्दी में चुभेगा किसी कांटे की तरह
और उनमें से कोई खडकी खोल
एक रोटी, एक बची हुयी सैंडविच फेंकेगा नैपकिन में बाँध
तू खाकर उसको फिर चल देगा