Archive for ‘Uncategorized’

March 9, 2017

मैं आया हूँ.
देखो चौराहे पे धुप उगती है.
गीदड़ भी आज भौंकते हैं
साज़िशें बोलती हैं
तरकीबों की दुकान खुली है
सड़कों पे फैला है लाल लहू
सिद्ध कैसे करोगे आदमी का है
आदमी है फोटू में कैद
कुत्तों का आदमकद पुतला खड़ा है
घास खेतों की जल चुकी है
रावण का पुतला घर को चल पड़ा है
की पट मंदिरों के आप खुल पड़े हैं
रावण बैठा है मध्य में
शिव है बाहर करता चौकीदारी
और वो मंदिर का घंटा बजता ही जा रहा है
की आज चमारों की बस्तियों में उफान आया है
उठो की देखो आज फिर दरिया में तूफान आया है
हैं मछलियां व्याकुल, सड़क पे दौड़ती हैं
पानी जल पड़ा है, मरघट चल पड़ा है
कटे नरमुंडों को ठोकर मारते
शोर मचाते, हाथ लहराते
ये किसके धड़ हैं सडकों पे
हैं किसके पैर जिनका कोई ठिकाना नहीं है
पीपल के पेड़ के नीचे जो छोड़ आये थे
वो मटका देखना किसके दरवाज़े सजा है
छाती छू के देखना इसपे पैबंद किसका है


 

July 31, 2016

 

Am a surreal dream

in a sleepless night

of a painless sorrow


Memories,

like a open wound

scars,

will take forever to form

the window,

still seems to be warm

from the lovely embrace

the rest of it

has fallen apart

stars,

fallen into a pit

your arms

the only piece of warmth

i have forgotten

road is all I remember

the window opened on

I looked out of the house

and met the star

you are also looking at

yes we meet again

years have passed us by

am going back to sleep

you can keep looking on

 

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there are no tears when I cry

and no sound when I howl

even I don’t know when I lie

the white bird on water has drifted away

a large hole is there in the sky

am holding a plant, it is too small

ground shakes every awhile

and there comes the marching army

foot soldiers going past the town

the flower looks at me and smiles

ocean has begun to swell

a water balloon has burst

and we all are getting washed away

all the volcanoes have melted away

the sea is full of vegetarian sharks

it is the grass am afraid off

the sun shines between the water

and am holding onto its image

it surely is going to keep me warm


 

दिल के कोने में बर्बादी का टुकड़ा
और ज़हन में जन्नतों का नक्शा


 

कोई बादल नहीं आसमां में मेरे नाम का
ज़मीं पर वृछ नहीं कोई मेरे नाम का
समय के तालाब में जब हाथ मैंने डाला
कोई मछली नहीं थी उसमें मेरे नाम की

परछाई नहीं थी, आकार नहीं था
अदृश्य नहीं था, कुछ भी साकार नहीं था
था एक वृत्त, कोई शुरुआत कोई अंत नहीं था
था एक सत्य, जिसके होने का कोई प्रमाण नहीं था

वोह पगडण्डी देखते हो
उसपर चलती पदचाप सुन सकते हो तो सुनो
कहो, चिल्ला-चिल्ला कर अपनी बात
और सन्नाटे में पसरा हुआ झूठ अपना सकते हो तो चलो

अब ये दुनिया कहती है की आ मेरी गोद में आजा
अन्न का दाना वृछ बन नहीं सकता
दिया कितना भी जल ले, उजाले से लड़ नहीं सकता
अँधेरा है वजूद मेरा, अँधेरा बिन जले रोशन है
दिया है पर चुप रहता है, यही उसका अस्ल है


 

 

May 4, 2016

श्याम वर्ण आसमां
स्याह रंग रास्ते
काठ के पैर
पतले तल्ले के जूते
जमीन दागी करते हुये
चलते हुए जैसे साइकल का पहिया
गोल गोल, गोल गोल, गोल गोल

उँगलियों के नट बोल्ट खोल
टेबल पर रखे
अंदर थीं मांस की लचीली हो चली डंडियाँ
सफ़ेद हो चलीं, सुन्न हो चुकी
चटकाना अभी मुमकिन न था

बाहर, बल्ब की धूप में
घूम रहे थे बेचैन साये
पैर जाना चाह रहे अलग अलग
पर संग बंधे सायकल की चेन से
पतीले की चाय उबाल ले चुकी थी
और दिन भर में मर चुकी परत
आहिस्ता आहिस्ता उतर रही थी

क्यूंकि आदमी किसी एक दिन नहीं मरता
आदमी हर एक दिन मरता है


 

वक़्त
गोल, चौकोर या अण्डाकार
या एक सपाट जमीन
जिस पर चलने का अहसास है
होने का नहीं

खिड़की से झरती रौशनी
रूम की दीवारों को करती सुसज्जित
स्पष्ट नज़र आती उनपर टंगी तस्वीरें
पर वो फिर भी ढका रह गया
जो लेटा है उसी झरोखे के नीचे
दीवार से लग के, दीवार में घुस के


 

जो आज वैलुएबल लगता है
कल माटी हो जायेगा
जीवन का चिल्लर है समय
सूद समेत खो जायेगा
नोट जनम का कोई खोज न पाया
ग्यानी ध्यानी या पागल पीछे माया
जाली की कोई पहचान नहीं
जो चल जाये वही असली है

बिन बारिश सब गीला है
लगे कसा पर ढीला है
दौड़ो देखो बैठ न जाना
रहो खड़े कहीं लेट न जाना
सर पर हाथ लगा के रखना
पैरों में उबटन मलते रहना
वक़्त तुम्हारा आएगा
जाली भी चल जायेगा
थूकोगे, अमृत कहलाएगा
समझो बैंक बन गए हो
मार्किट में तुम भी चल गए हो
कर्रेंसी अपनी बचा के रखना
सबको इन्फ्लैटेड वैल्यू बताते रहना
थोड़ा गोल्ड बनाते रहना
बैंक एक दिन रुक जायेगा
बन कपूर वक़्त उड़ जायेगा
असली भी नकली कहलायेगा
कुछ चिल्लर बचा के रखना
नोट यहाँ वहां दबा के रखना
खेल जुआं मन बहलाते रहना
आशिकों की बरात में बैंड बजाना
पत्थर की फिर पतंग उड़ाना
पानी की नाव चलाते रहना
जिन अर्थों का कोई अर्थ नहीं है
उनका अर्थ बनाते रहना
जाने कब क्या चल जायेगा
कब क्या वैल्युएबल हो जायेगा
वक़्त का क्या है, है बड़ा जुआरी
बन चौसर फिर बिछ जायेगा

 

March 21, 2016

 

ख़ुशी की राह में जो ग़म आये
वो बदनुमा दाग़ ही शायर बनाये
खोजा क्या था मिला क्या इसकी छोड़ो
बुझ गयी आग पर धुंआ जिंदगी से ना जाये
ढूंढ पाना मुश्किल, खो जाना भी न मुमकिन
किस तरफ जाये यही सोच शायरी बन जाये

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खो गयी है आग
ठंडी हो चली जो राख़
जेब में रखता हूँ

मध्य में रात्रि के
जैकेट की जेब स्पर्श कर
राख का उभार महसूस कर
खोयी आग टटोलता हूँ

परदे के पार होगी
सागर के पार होगी
किसी के पास होगी

शामों में उसको देखा
धुँधलों में उसको ढूंढा
हवाओं से उसको पूछा

पानी के भीतर उतरा
राख मुट्ठी की छोड़ दी
जहाँ आग हो नहीं सकती
वहां वो खोएगी भी अब कैसे

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चलो आज दिल्लगी करता हूँ
खुद से ही कुछ अनकही कहता हूँ
पत्थर जो किसी ने फ़ेंक कर मारे
उनकी याद में समेट लिया करता हूँ
हो आता है जब भी उन पर रंज
चौसर सजा पत्थरों से जीत लिया करता हूँ
पत्थर हैं खुद कभी चोट नहीं करते
ज्यादा याद आती है तो उछाल दिया करता हूँ

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रात नहीं है दिन भी नहीं है
बंधू कहो ये वक़्त कौन सा है?
दरवाज़े के बाहर आसमान है
क्षितिज वही है, दृश्य नया है
बंधू कहो ये शहर कौन सा है?
मिट्टी है, बंजर रेती है

 

 

 

February 4, 2016

परिधि के पार जो लक़ीर है
उस लक़ीर पर खड़ा हूँ
इस तरफ़ अंधकार है
उस पार क़ुछ है ही नहीं।

 

October 12, 2015

समंदर की लहरों के बीच पानी की एक बूँद
सूरज की किरणों में चमकता धूल का एक कतरा
वक़्त का रिसता हुआ एक पल
हाथों के स्पर्श को ढूंढता उढ़का हुआ दरवाज़ा

पर खुलने का इंतज़ार करती चिड़िया
वादियों में बहता हुआ एक कम्बल
आँखें मींचे कृतिम ध्यान में लीन साधु
ढलान पे खिसकती साइकिल

आज आईने ने कोई शक्ल अख्तयार नहीं की
सारे मुखोटे उतर गए

July 24, 2015

सफ़ेद पड़ता मेरा बदन
उँगलियाँ जमती हुयी, नाखून पिघलते हुए
खिड़की के ऊपर लगे परदे के उस पार टंगी सैकड़ों खिड़कियां
और उनपर ढकी हुयी उलटी तसवीरें
खुले हुए दरवाज़े पे तुम खड़ी थी
जैसे कोई मूरत लगी हो म्यूजियम में
हज़ारों लोग उसको रोज़ देखते हैं
पर उसे मालूम है की ये उसका घर नहीं है

तुम मुझसे मिलने आई थी मेरे हलके बुलावे पर
जो तुमने निकलवाया था अपनी तिरछी, घूमी फिरी बातों से
तुम्हारी दोनों कोनों से बित्ता भर कटी स्कर्ट
तुम्हारे छोटे छूटे नितम्बों के पास से उठी हुयी
जैसे उनके ही सहारे टिकी हुयी हों तुम्हारे शरीर से
उनसे बाहर लटक रहीं तुम्हारी दो भूरी टाँगे

कई दिनों का सूखा हुआ पत्ता
पेशाब के पानी को बारिश की फुहार मान सिहर उठता है
मेरे सफ़ेद पड़ते बदन में ऐंठन हो रही थी

उभर आया था सीने पे एक लाल निशाँ

खिड़की का पर्दा गिर पड़ा था
दरवाज़ा बंद हो चूका था, तुम अंदर आ चुकी थी
तुम्हारी स्कर्ट हट चुकी थी, बहुत कुछ हटना बाकि था
तुम्हारा डर, तुम्हारी हिम्मत, तुम्हारे वहम, तुम्हारे बेवकूफ इरादे

लाल निशाँ फट चुका था, शर्ट लाल हो चुकी थी
बिस्तर पे लेती थीं तुम्हारी दो मोम हो चुकी टंगे

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वक़्त, शहर, घर, होटल; सब ठहर गए थे

तुम थी, मैं था और था एक शख्स
जो सब देख रहा था

था जिस्म, थी जरुरत
थी मोम सी टांगे
थे अंगारों सने हाथ
और था वो शख्स
जो आईना बन घूम रहा था

आइना, जो तुम देखना नहीं चाहती थी
आइना, जो मैं तोड़ देना चाहता था
आइना, जो तुम्हारे इर्द गिर्द लिपट गया था
आइना, जिसे मैं परत दर परत खुरच रहा था

नीचे था एक स्याह तालाब
जिसके तल में था तुम्हारा चेहरा
डर और आकाँक्षा की झुर्रियों से दबा हुआ

December 23, 2014

लकड़ी की नाव है

है खपचियों की पतवार

हौसला भी कर लूंगा
पानी में तो बहाव हो
जंगल पार कर आया हूँ
दरया मुहाने हूँ बैठा
भटकूँ की लुढ़क जाऊँ
कोई जायज़ चुनाव हो
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किसी और दुनिया में ले चलो मुझको
यहाँ पर खून बहुत है
हरा, पीला, बदामी, नीला
ऐसा कोई रंग दिखाओ मुझको
यहाँ पर खून बहुत है

मारूं की मर जाऊँ
बहाऊँ की बह जाऊँ
कोई दूसरा रास्ता बताओ मुझको
की इसपर खून बहुत है

नस में छुप कर जो बहता है
उसकी दुनिया प्यासी क्यूँ
की ब्लड बॅंक वालों को बुलाओ
यहाँ पर खून बहुत है

October 21, 2014

एक चिड़िया मेरे हाथों से कूद गयी

कुछ केहते हैं वो उड़ना सीख गयी

कुछ केहते हैं उसकी टांग टूट गयी
सब कुछ ना कुछ केहते हैं
बस वो चिड़िया कुछ नहीं कहती
जाने क्या मंज़र देखा उसने कूदकर
की सच केह्ता हूँ वो है फुदकना भूल गयी
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जब वक़्त सो जाता है

मन चिड़िया बन उड़ जाता है
तब अक्सर घर के गलियारों में
मैं खुद से मिलता हूँ
बिछड़े यारों से मिलता हूँ
चुप्पी में बंधे थे जो शब्द वो केह्ता हूँ
और करके कान बाहर को खिड़की से
वक़्त की सिकुड़ी चादर में
सलवटों में लिपट आये
अंधेरों में सिमट आये
तन्हाई में सुलझ आये
उन काग़ज़ के ढेरों को बुनता हूँ
हाँ, मैं खुद से मिलता हूँ
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बहुत शहर देखे, कई गाँव भटके
किसी की धूल बटोरी, किसी के पत्थर समेटे

August 1, 2014

Am I writing you

or you are shedding me

Am I killing your memory

or you are evacuating me

Am I living in you

or you are dead in me

Am I burying you

or you are gonna keep me alive

you exist because of me

or I do, of you

is there a land

where twain can meet

oh, do not leave me

because you complete me