Archive for February, 2015

February 25, 2015

कारवाँ कहाँ, मंज़िल कहाँ, सुकून कहाँ
कोई चीख रहा है ले के नाम, पर दीखता नहीं

पीछे गुबार है, आगे भी गर्द है
ये जो है मचल रहा, है धड़कन या दर्द है

दिया था पता वक़्त चलते, मुसाफिरखाने का किसी ने
याद हो किसी को तो बता दो की खुद कुछ सूझता नहीं

ये तो ठीक मालूम है की हम कौन हैं,
हाँ ये पता नहीं की हम हैं भी की नहीं।

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On the fateful night
the writer found the pen
hurled it on the paper
and dug lines over it
as his own fate crumbled
around its cracking folds

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