Archive for October, 2011

October 21, 2011

हौसला इतना किसकी चाहत में है…

मन में हो ना और ओठों पे हाँ ले आये
हौसला इतना किसकी चाहत में है

खुली बाहों में तेरी समां न सकूं लेकिन
सर दीवारों से टकराना मेरी आदत में है

हर उभरती सुबह गुज़रती शाम में ही है
करिश्मा ऐसा ही कुछ इस कुदरत में है

तुम प्याला बढाओगे तो हम पी ही जायेंगे
बिन प्यास पीते जाना मेरी फितरत में है

भंवर में डूब जाना कभी हो ना सका लेकिन
बैठ साहिलों पे रोना मेरी किस्मत में है

ठुकरा के तेरी चाहत खुद में खो जायेंगे
गुर वो खुदपरस्ती वाला मेरे दामन में है

हो कोई भी मौसम वो महकता ही रहे
पेड़ वो तुलसी वाला मेरे आँगन में है

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कोई जब हँसता है, अच्छा लगता है
छेड़ देता है मुझे, अच्छा लगता है

अकेले भी नहीं है मायूसी यूँ तो कोई
कोई जब साथ होता है तो अच्छा लगता है

तेरे होने से होती एक उमीदी है
तू मेरी सबसे बड़ी नाउमीदी है

किस्सों में तकसीम कर सुनाई आप बीती है
सहेजे फूलों वाले खाली गुलदस्ते सी रात बीती है

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सफ़र में निकले हो तो कुछ पीछे छूटना ही है
नयी यादें बटोरते हो तो पुरानी भूलना ही है

ख्वाबों में जिनके सर हों कदम जमीन पर नहीं हो सकते
खुद से मोहब्बत इतनी करोगे तो औरों को तो रूठना ही है

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उठता जहेन में ये तूफान सा क्या है
सिहरता बदन ये अनायास ही क्यों है

ये किसके अरमानों ने अंगडाई ली है
करवट ये किसकी दी हुई तन्हाई की है

चलेंगे फिर दौर मेरी दीवानगी के, आवारगी के
बनेंगे फिर किस्से तमाम मेरी बेचारगी के
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हम फिर आये हैं तुम फिर ठोकर मार दो हमको
कुछ देर रो चुप हो जाने की अपनी आदत पुरानी है

वही अंदाज़ हमारा है रुख तुम्हारा है नहीं बदला
किस्सा ये नया ठहरा पर कहानी वही पुरानी है

बेमतलब दिल तुड़वाने की अपनी आदत पुरानी है
हर मौका आजमाने की अपनी आदत पुरानी है

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October 19, 2011

चाहिए मुझे…

हर एक खूबसूरत चीज़ चाहिए मुझे
आसमां का हर एक चाँद चाहिए मुझे
बाज़ार से खरीदी है तुने कोई भी चीज़
कीमत किसी ने हो चुकाई चीज़ चाहिए मुझे

जाने कैसी है ये रात दिन में तो सब ठीक था
सन्नाटे में ही जैसे छुपा इस शोर का बीज था
है कुछ नहीं बदला, बदला सा लगता है मगर सब
हूँ इस पल मैं कोई और पिछले पल तक तो रफ़ीक था

मत बता मुझको तू आया कहाँ से कौन है
बस ये कह की कब से बोलना चाहता है पर मौन है
है तू नहीं अकेला सबकी जबाँ मैं नाप है एक तौल है
बरबस नहीं कहता कोई, कहता है जिसका मोल है

October 19, 2011

ब्रह्मराक्षस…

तोड़ दो तालों को
और फ़ेंक दो गुच्छियाँ
फिसला है कोई गुसलखाने में
रहने दो उसे वहीँ पर
रेत के महल हैं
हैं दिखावटी चेहरे
नोच लो इनको
लाओ वही मुखौटे
आदर्श मटिया चुके
ढह चुके हैं खँडहर
कौन जाने कौन सा विष
है फुट कर घुला
धरती के वस्त्र बादल
हरती इन्हें हवा
बहा ले जाती बादलों को
छोड़ नग्न सी धरा
कहते थे किसी कथा में
रहता पाताल में ब्रह्मराक्षस
मिलता नहीं किसी को
दिखता भी नहीं है
पास जाओ नोच खाता
कान के नीचे रख कर लगाता
जैसे करता हो वो तांडव सा
टूटता जर जार करके
टूटता, गिरता, झुकता
टकराता, बिखरता
खुद को खोने की ललक में
खुद को पाने की हवस में
श्वास उसकी घुट सी जाती
हिलते सारे कपाल हैं
घुल गया है वायु में
जैसे वही ब्रह्मराक्षस

October 19, 2011

मैं और तू…

मिलती हैं तेरी परछाइयां
तू नहीं मिलता
खयाल में दिखता है
रूबरू नहीं होता

मैं हूँ तो बस हूँ
तू मेरे होने से है
तू है तो मेरा सच है
नहीं है तो मेरा गुमाँ है
तू नहीं तो मैं कुछ भी नहीं
मैं नहीं तो तू है ही नहीं

October 14, 2011

उलझन सुलझन

बात सारी बकवास हो चुकी
सुबह हो कर शाम हो चुकी
चलता रहता हूँ तो लगे चल रहा हूँ मैं
रुक कर देखता हूँ तो लगे कब चला हूँ मैं
सबब कभी कोई और बने उलझनों का
कभी खुद की उलझनों में उलझता हूँ मैं
भाग कर उलझनों से सुलझ जाता हूँ मैं
सुलझ कर फिर उलझनों की ओर दौड़ जाता हूँ मैं

लोग संग हों तो अच्छा नहीं लगता
अकेले भी ज्यादा देर बैठता नहीं हूँ मैं
बैठता हूँ कुछ देर फिर घूमता हूँ मैं
क्या बदलता है मेरे बदलने से ये देखता हूँ मैं
काम करता हूँ कुछ देर फिर छोड़ देता हूँ मैं
क्या नहीं होता मेरे बगैर ये देखता हूँ मैं

होता नहीं काम पूरा बगैर मेरे किये
हो जाता है बहुत कुछ बगैर मेरे हुए भी
न होगा कितना बगैर किये ओर होगा कितना मेरे बगैर
रोज़ कर कर के ना कर के वही लकीर ढूँढता हूँ मैं

October 13, 2011

I am the rubble

I may not tow the line you draw
I do not draw my own line to tow
I am not a rebel

I may not follow the system
I do not disrupt it
I am not an anarchist

I may not fit in any of your slots
I do not exist outside of it
I am not a nobody

I am the rubble at the end of the road
to some I stink
to some am still useful
they dump what is theirs
but has no place in their homes
has no place in their lives

sometimes dogs come and sniff
they lick me pick me chew on me
I let them for they feel me

sometimes come the ragpickers
they assort me sort me use me
I let them for I empathy them

but sometimes just sometimes
come the rare species
they find their art in me
lifting my spirits
giving me a slot
no more a rubble

there is gold in me
there is dirt in me
You can take the gold
thinking you have taken me
but I am not the gold
I am not the stink
I am the whole lot
I am the rubble
you get the whole lot
or you do not get me