Archive for March, 2017

March 9, 2017

मैं आया हूँ.
देखो चौराहे पे धुप उगती है.
गीदड़ भी आज भौंकते हैं
साज़िशें बोलती हैं
तरकीबों की दुकान खुली है
सड़कों पे फैला है लाल लहू
सिद्ध कैसे करोगे आदमी का है
आदमी है फोटू में कैद
कुत्तों का आदमकद पुतला खड़ा है
घास खेतों की जल चुकी है
रावण का पुतला घर को चल पड़ा है
की पट मंदिरों के आप खुल पड़े हैं
रावण बैठा है मध्य में
शिव है बाहर करता चौकीदारी
और वो मंदिर का घंटा बजता ही जा रहा है
की आज चमारों की बस्तियों में उफान आया है
उठो की देखो आज फिर दरिया में तूफान आया है
हैं मछलियां व्याकुल, सड़क पे दौड़ती हैं
पानी जल पड़ा है, मरघट चल पड़ा है
कटे नरमुंडों को ठोकर मारते
शोर मचाते, हाथ लहराते
ये किसके धड़ हैं सडकों पे
हैं किसके पैर जिनका कोई ठिकाना नहीं है
पीपल के पेड़ के नीचे जो छोड़ आये थे
वो मटका देखना किसके दरवाज़े सजा है
छाती छू के देखना इसपे पैबंद किसका है


 

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