Archive for March, 2013

March 28, 2013

और जब मैं उठ कर लेता हूँ ताज़ी हवा में सांस
तो लगता है की मैं आज पहली बार उठा हूँ
हाथों में लेकर काफी का मग जब खड़ा होकर झांकता हूँ खिड़की से बाहर
तो गुजरते ट्रक के धुंए में भी महसूस कर पाता हूँ पहाड़ों की हवा
जो शहर में आकर मैली हो गयी है
और वो कहती है मुझसे मुझको भर ले अपनी मुट्ठी में
और बैठ आज या कल शाम की ट्रेन में
निकल जा कहीं दूर जहाँ सड़क पर बिखरे डब्बे न हों
जहाँ न हों ईटों के अजीबो-गरीब आकारनुमा बक्से
जिसमें लोग बंद रहना चाहते हैं
जहाँ हों ऐसी खुली वादियाँ की
जहाँ रास्ता भटक जाना, खो जाना मुश्किल न हो
और जहाँ कुछ भी प् जाने का, कहीं भी पहुँच जाने का
कोई भी मुकाम मिल जाने का तरीका
उसके खो जाने से, बिछड़ जाने से होकर जाता हो
जहाँ कहीं भी पहुंचकर ये याद न रहे की कहाँ के लिए चले थे
और कोई भी पोटली में लई चीज़ हाथ न बचे
बस रहे एक थकन जो बिस्तर पर लिटा दे
और सुबह उठ कर फिर चल पडूँ
एक बार फिर खोने को ताकि
पहुँच सकूँ वहां जहाँ से निकला था
और पहुँच कर सोचूं की
कहाँ को निकला था, कहाँ पहुंचा, कहाँ से होकर आया हूँ
और फिर कोई दे दस्तक और न कोई आवाज़ दे
आकर अंदर लेट जाये बिस्तर पर और सो जाये एक गहरी नींद
और मैं समझ जाऊँ,
ये कहीं को निकला था, कहीं पहुंचा, कहीं और जाने वाला है

March 21, 2013

आसमान से उखड़ कर गिरा वो
जैसे दीवार से उखड़ा हो पुराना पेंट
पीछे छोड़ आया एक सुराख़ आसमान में
गिर नीचे रेतीली मिटटी में लौंदे सा
पलट कर देखता आसमान में हुए सुराख़ को
जो धीरे धीरे भर चला था
उसके कोनों पे उभर आये थे नुकीले किनारे
जिनसे लटकती एक पिघले हुए लोहे की बूंद
गिर पड़ी थी फिसलकर उसके ऊपर
कई रात वो लेटा हुआ सिसकता रहा
उसके ऊपर गिरी लोहे की बूंद सूख कर कड़ी हो चली थी
दिन के शोर में लोगों के पैरों के नीचे दबता हुआ, कुढ़ता हुआ
वो लौंडा टेढ़ा मेधा हो चला था
उस लोहे की सूखी पपड़ी ने उसे बचाया था
टूट कर मिटटी हो जाने से
लेकिन रात को उसके कानों को रौंदती थी
लुहार के हथोड़े की आवाज़ जो चलती थी आसमान के कोनों पर
सीधा करने को पीछे छूटे तेज़ किनारे
मोड़ कर सूख चले लोहे को नया आकार देने को
और चाँद दिनों में उसने दे दिया था उसे एक नया रूप गुलदस्ते का
जिनसे लटकते थे फूल नीचे को मुरझाकर हर रात जो गिर जाते थे उस लौंदे पर
सुबह को देखकर उसके किनारे पे फूलों का जमावड़ा
एक चौकी लगा दी, एक पंडित रख दिया
उस अंदर अंदर सुबकते लौंदे को अपनी आस्था दे
उन्होंने मंदिर बना दिया
उसके ऊपर चढ़ी लोहे की परत पे होने लगा तिलक
पानी चढ़ने लगा
पानी, जो रिस कर पहुँच जाता था लौंदे तक
जिससे वो पिघल कर मिलने लगता था नीचे की मिट्टी से
मिटटी जिससे उसे मिलना न था, मिटटी जो उसे बनना न था

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वो कहते हैं की मैं बदल गया हूँ
हाँ, मैं हार मानना सीख गया हूँ

रुला के मुझे ख़ुशी मिली तुझे तो अच्छी बात है
कि हंसा के मुझे बहुत लोग रोये हैं।

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एक कबाड़े में से खजाना ढूंढने निकला हूँ
मुझे तो कुछ समझ नहीं आता,
तुम्हें बताओ की मैं किन राहों पे निकला हूँ
बहुत से बुत दीखते हैं मुझे इनपे हिलते हुए
फिर भी ये क्यूँ लगता है की अकेला निकला हूँ
मेरे पहले भी हजारों आये होंगे इनपे
मेरे पीछे भी लोग चल रहे होंगे
मगर हर शख्स कह रहा है की मैं पहला निकला हूँ
किसी के हाथ में है बक्सा स्टील का, कोई है संदूकची दबाये हुए
घबराहट होने लगती है जब देखता हूँ की एक मैं ही हूँ
जो हाथ में लेकर एक खाली थैला निकला हूँ
मंजिल की फिकर नहीं, हाँ रस्ते की कुछ थकन है
रह रह के रुकना पड़ता है, लेके जेबों में कुछ ऐसा बवेला निकला हूँ
झोपड़ियों में किनारे कुछ लोग बैठे हैं मोमबत्तियां जलाकर
मुझे बुलाकर, खाना खिलाकर कहते हैं की मैं एक मकसद-ए-अलबेला निकला हूँ
मेरे हाथों के मिटटी के ढेलों को यूँ देखते हैं जैसे किये हों वो किसी जिन्नात से हासिल
और खोल के अपनी अलमारी दिखाते हैं अपने सीने में की ज़ब्त एक पहेली
दबा के हाथ मेरा हौले से, आँखों की नमी पाकर, कुछ बुदबुदाते हैं
वो जिसको ढूंढा करते हैं खुली आँखों से, राज़ वो मुझको दिखाते हैं
और फिर शाम ढले मुझे देके विदा, बंद हो जाते हैं किवाड़ों के पीछे
और बीच बुतों के मैं खड़ा रह जाता हूँ ये सोचता
कि साथ लिए इन पहेलियों को शायद मैं खुद एक पहेला निकला हूँ
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ऐ तकदीर यूँ मुझसे रंज न कर,
थोड़ा तो बराबर इन्साफ तू कर
लग जा गले तू पल दो पल या फिर कह दे
मैं हूँ ही नहीं तेरी मोहब्बत के काबिल
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नहीं कोई तरावट सीने में
है आँखों से भी नींद उड़ी
तकदीर मेरी आ लग जा गले
या मैं हूँ ही नहीं तेरे काबिल?
मुडेर छोड़ मैं जब भी उड़ा
कोई राह नहीं पूरी सिमटी
हैं टुकड़े टुकड़े ये पंख मेरे
या परिंदा ही हूँ मैं कागज़ का?
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अब बख्श दे मुझको जाने दे, कहीं और बना तू घोंसला
ऐ कौव्वे जैसी मेरी काली किस्मत, जा कहीं और कांव कांव कर
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March 21, 2013

शायद मैं एक खयाली पुलाव भर हूँ
बेवक्त लगने वाली आंव भर हूँ
आम का खट्टा हो चूका अचार हूँ
एक अधूरी कविता का सार हूँ

आधी लिखी कहानी जो बीच में ही पूरी हो गयी
दो नन्हे हाथों में समां भर रह गया विस्तार हूँ
दिमाग में उपजने से जिसके दिमाग बंजर हो चले
जिसे न कहा कहा जाये न जिया जाये, एक ऐसा विचार हूँ
जहाँ से देखने से दुनिया दिखाई देने लगती है बहुत दूर
जिसका छेद है इतना महीन, की कोई धागा न घुस सके
उसकी सिलाई से निकली हुयी साडी की फाल हूँ मैं
स्वीमिंग पूल में ठहरे पानी पर जमती एलगी हूँ
उसके ऊपर मंडराते मच्छरों की भिनभिनाहट हूँ
उनसे मचती चिढ़ हूँ, इरिटेशन हूँ, अपवाद हूँ मैं
थोरी देर रखोगे मुंह में तो जानोगे, कितना बेस्वाद हूँ मैं

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आखिर तुमसे मिलना ही पड़ा
जो कहने लायक नहीं था वो भी कहना ही पड़ा
आखिर तुमसे मिलना ही पड़ा
इसे कौन समझेगा मालूम नहीं
ये किसीके काम का होगा लगता तो नहीं
पर गर्मी की लम्बी खाली दोपहरी में
जाने कैसी है कुवत, कैसी है कुर्बत
जो नहीं है कहने लायक, कहला देती है
जो नहीं किसी के समझ में आता, समझा देती है
कोई होगा जो लेट पलंग पर, मोड़ पैरों को घुटने से
ले किताब हाथों में, अंगूठा चूसता मुंह में
पलटेगा पन्नों को इसके जैसे हवा पानी की सतह को सहलाती है
और थम जायेंगी उसकी निगाहें पाकर ये दो चार पसरी सी पंक्तियाँ
जो न कुछ कहना चाह रहीं, न कुछ पाना चाह रहीं
जिनके पास नहीं है कुछ भी देने को
जिनको लगता है अनमोल हैं वो
हाँ लगा नहीं उनका कोई मोल अभी
जो हर पल हर घट में ठुकराई जाती हैं
जब जब पन्ने पलटे जाते हैं वो
पलटते पन्नों के बीच में ही दबी रह जाती हैं
हैं आज मिली उनको दो आँखें
जाने वो कैसा घूरा करती हैं
वो देख पा रही उनमें जो
वो खुद भी अधूरा कहती हैं
और पढ़ के फिर वो दो चार दफा
कर बंद किताब को बैठेगी
कहते कहते जो नहीं कहा
बात वो उसके दिमाग में घूमेगी
उठ कर बनायेंगी वो चाय खुद के लिए
फिर पलट खोल फिर देखेगी
ये क्या लिख डाला है इनमें
है छुपा क्या वो ये सोचेगी
एक तरंग तरन्नुम में होगी
एक अदृश्य हास फिर नाचेगा
है जिसको सब कुछ मालूम वो
काल समय कथा फिर बांचेगा
बोलेगा कथा वो जो अधूरी है
खाली पन्नों से ही जो पूरी है
वो नहीं कथा किसी एक मानुस की
है वो तो कहानी हर जग की
जिसके आधे पन्ने ही उकेरे जाते हैं
बाकी की कथा खुद ही कहनी सुननी होती है
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आसमान से उखड़ कर गिरा वो
जैसे दीवार से उखड़ा हो पुराना पेंट
पीछे छोड़ आया एक सुराख़ आसमान में
गिर नीचे रेतीली मिटटी में लौंदे सा
पलट कर देखता आसमान में हुए सुराख़ को
जो धीरे धीरे भर चला था
उसके कोनों पे उभर आये थे नुकीले किनारे
जिनसे लटकती एक पिघले हुए लोहे की बूंद
गिर पड़ी थी फिसलकर उसके ऊपर

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March 21, 2013

नींद तू मुझसे अक्सर दूर रही
आई पर ठीक से नहीं आई
मैंने भी ठीक से तेरी वक़त न की
दोस्ती की खातिर अक्सर तुझको जाने दिया
और देख उस दोस्ती ने मुझको क्या दिया
कुछ ऐसा जिसने मुझे कई रातों जगा दिया
तेरी गोद में कैसा हष्ट पुष्ट था
तुझसे अलग हो कैसा मरियल सा हुआ
रात में उठ कर शीशे में देखा तो
आँखों के नीचे एक नयी झाई मिली
अब तू शायद मुझतक डर डर के आती है
आती है तो संग कैसे अडबडे सपने लाती है
सपने, जिनसे पहले रास्ता दिखाती थी, अब डराती है
नींद, तू फिर से मेरे पास आ जाना
तेरी गोदों में ही है मेरा हर खजाना
तुझे छोड़ अब मुझे किसी के पास नहीं जाना
मत मांग मुझसे हलकी से बेवफाई का इतना बड़ा हर्जाना
मैं आज फिर मिलूँगा तेरी राहों में मूंद कर आँखें
पर तू किसी तेज़ चलते ट्रक पर बैठ मुझसे मिलने मत आना
कोई बुरा सपना भेज मुझको मत डरना
आना किसी तरन्नुम की तरह
किसी मीठी ख़ामोशी में लिपटी हुयी
और धीरे से, चुने कदमों से चलकर
पार्श्व में मेरे लेटकर मुझसे लिपट जाना
नींद तू मुझसे मिलने जरुर आना