Archive for December, 2012

December 31, 2012

I wish I was free
of myself. of my longings
of need to be, of want to become
of wanting to explore
of wanting to sit still
I wish I was free

There is no end
to this existential angst
you keep doing
keep making yourself
keep defining, keep constricting
keep forming yourself
and keep turning into a slave
slave to yourself, to your image
to the mirage of yourself
to the thousand desires
and infinite pangs
to the ideas of future
of the shards from the past
searing through your present
leaving you withered
turning you into a whorehouse
robbing you of yourself
you the rapist, you the victim
you the desecrated
you the doer, you having been done with

chanting all along
I wish i was free

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December 28, 2012

हर बड़ी चीज़ की शुरुआत छोटी होती है
हर पहला कदम तनहा होता है
हर आदमी अपनी मंजिल अकेला तय करता है
लेकिन अकेले कुछ नहीं होता
होता है जब लोग मिलते हैं, जुड़ते हैं, हमसफ़र बनते हैं
जब ध्येय मिलता है, लक्ष्य हासिल होता है
जब मुश्किलें आती हैं, जब हार होती है, जब सब थम जाता है
जब सब रुक जाता है, टूट जाता है, जब हौसला आता है
जब आदमी फिर से सर उठता है, जब वो चिल्लाता है
और कहता है खुद से, औरों से और ज़माने से
मैं जीतूँगा, मैं जीतूँगा, जीतूँगा

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कुछ न कुछ करते रहने की आदत
साधारण सत्य से भागने का हठ
उथल पुथल को समेटने की आकांक्षा
किसी नव निर्माण में खुद के निर्मित होने की उम्मीद
मुझको तुझ तक लाती है

क्या मैं जा कर माँ से जिद करूं
चीखुं चिल्लाऊं
उसकी हर पुरानी गलती याद करा के
उसको पुनः पुनः उनके लिए
गिल्टी फील कराऊँ

एक दिन मैं ऐसा विचार बिंदु पा जाऊंगा
जिस पर चढ़कर सब समतल हो जायेगा
सब कुछ होगा जैसे एक सपाट कहानी
थोड़ी बाधा थोड़ी कठिनाई तो है आनी जानी

एक लड़की है, जिससे मैं प्यार नहीं कर पाता हूँ
जिस्म, हाँ वो मैं उससे अक्सर सटा आता हूँ
और सब कुछ हो जाने पर ख़तम,
सब पूरा हो जाने पर
फुर्ती से किसी तेज़ी के साथ
सब धोने चला जाता हूँ
जैसे वो जो अपने पीछे पर अपना ही
बिस्तर पर छोड़ के आता हूँ
उससे मैं भाग जाना चाहता हूँ
छुप जाना चाहता हूँ, नहीं नज़र मिलाना चाहता हूँ
वोह जो झांकता है मेरे अंतर्मन में
और कहता है अक्सर मुझसे
तू क्यूँ यहाँ चला आता है
कहीं और क्यूँ नहीं दिल लगाता है
वो जिसको मैं बेबसी का पाठ पढ़ाता हूँ
वो जिसको मैं समझाता हूँ
की तेरी बातों से दाल नहीं है गला करती
जैसा तू बतलाता है जगत में वैसा कुछ भी नहीं हो पाता है
कुछ भी पाने का रस्ता, सब कुछ खोने के गलियारे से होकर जाता है
वो फिर चुप होकर रह जाता है
जान अपनी बेबसी, मेरी मज़बूरी भी समझ जाता है

एक लड़का है जिसको मैं बचपन से करता हूँ प्यार
वो था मेरा बाल सखा उसकी सौ बातें थी मुझको स्वीकार
अब वो दर दर भटका करता है
और सब जगहों से हो जाने पे चूर
मेरे कंधे ढूंढा करता है
और मैं अपने जर्जर कंधे उसको
ज्यादा देर को नहीं दे पाता हूँ
दे देता हूँ जब उसको
तो कई रात मैं खुद कोई ऊँगली ढूंढा करता हूँ
फिर वो मेरे अन्दर का प्राणी रह जाता है मौन
है उसको मालूम कटु कुटिल सत्य

कुछ और भी हैं जिनके बीच मैं उलझा रहता हूँ
इन जबरन की आफत में खुद से कुछ जुदा रहता हूँ
और जब कभी आवेश में, संयोग से या विवश हो
मैं इन सब से खुद को दूर कर लेता हूँ
तो जो पाता हूँ उसका कोई नाम नहीं
वहां शोर नहीं सन्नाटा है
उसका किसी के साथ ज्यादा देर दिल नहीं लगता
और वो खुद के साथ भी घबरा जाता है
और वो चल पड़ता है
किसी नयी मुसीबत, किसी नयी परेशानी
किसी नयी चिंता की खोज में

December 22, 2012

ले चलो मुझको दूर इन दुनिया के उजालों से
बंद कर के रखो मुझे किन्हीं अँधेरे गलियारों में
जहाँ तन्हाई हो, उदासी हो, एक ठहरा सा आलम हो
जब भी हो आँख गीली, पोंछने को एक टुकड़ा-ए-ग़म हो

यहाँ शोर बहुत है, लोग चिल्लाते बहुत हैं
भरसक नींद नहीं आती, जागते रहो की आवाज़ लोग लगाते बहुत हैं
मुझे अपने साथ रहना है कोई दूसरा नहीं चहिये
सब कुछ बिखरा रखना है, आबाद नहीं चहिये

क्या तुम बनोगे मेरे साथी और मेरे साथ चलोगे
हम इक शहर बनायेंगे अजनबी दोस्तों का
सबके पास होगी एक गठरी उनकी अपनी
दुबकी रहेगी वो कोने में झोपड़ी के
और हम मिलेंगे बाहर मैदानों में
खामोश से चलेंगे हम सड़कों पे
कोई आवाज़ नहीं होगी, कोई बात न करेगा
एक दूजे से टकरा जायें तो कोई न कुछ कहेगा
यूँ रहेंगे साथ जैसे हम अकेले हों
यूँ करेंगे बात जैसे कोई अनहोनी बात बोली हो
मैं अपनी कहूँगा, तुम अपनी कहोगे
हो किसी की भी कहानी, हम सबमें अपनी सुनेंगे
हमें बस अपना ध्यान होगा, हम बस अपनी सुनेंगे
होगा न कोई हमारे दिलों में और हम सबके दिलों में रहेंगे
होकर दर्द से खाली, बनेंगे हम खुद से बेखुद बवाली
रंज भी होगा, ग़म भी होगा हमारे पास
हमें आम रहना है नहीं चहिये कोई ख़ास
हम शोर करेंगे, हम हुंकार भरेंगे
बिना बात के यूँ ही हम तकरार करेंगे
हम खुद को नोचेंगे, हम चेहरे पे निशाँ खींच लेंगे
की अपनी किसी भी हस्ती को हम पैरों से रौंद देंगे
न जायेगा कोई खाली हाथ हम भर भर के खून देंगे
जिधर भी गड्ढा दिखेगा हम छलांग मार लेंगे
की जमीन से उठ न पाएं हाथ पैर इतने तोड़ लेंगे
और फिर पड़े रहेंगे, चिल्लाते रहेंगे
आसमान फट पड़ेगा न जब तक, हम रोते रहेंगे
बारिशें भी होंगी, अंधड़ भी चलेंगे
पर हम न हिलेंगे हम पड़े रहेंगे
ज़ख्म जब हमारे सड़ के गलने लगेंगे
सूख कर पपड़ियाँ निशान बनने लगेंगे
हम सहलायेंगे उनको, जीभ से गिला करेंगे
एक आध दो को हम उधेड़ कर भी देखा करेंगे
रुला के आसमान को हम फिर घर को चलेंगे
बेदर्द है वो, बेरहम है
सबको मालूम है ये, पर अहसास करा के रहेंगे
पैर हिलने लगेंगे, घुटने गिरने लगेंगे
दर्द से न रोये पर इस बेरुखी पे हम रोने लगेंगे
और जाकर अपने घरों में बैठेंगे
उन कोनों में जहाँ राखी हैं वो बंधी पोटलियाँ
खोल कर उनको कभी देखा करेंगे
कभी लेट जायेंगे बिस्तरों पे और आसमान ताका करेंगे
वो ऊपर हम बिन प्यासा है और हम ज़मीं पर फांका करेंगे
उस दिन ख़ामोशी आएगी और बैठेगी हमारे पास
जो कोई कह न सका वो बतलाएगी वो बात ख़ास
अरे आसमान क्या है वो बस बादल का एक घर है
तुम्हारे साथ रहे कहाँ उसको इतनी फुर्सत है
और क्या सोचते हो, तुम्हें कहाँ उसकी ज़रूरत है
वो बारिश करता है, तुम हाथ फैला लो
पानी को उसके अपनी मुट्ठी में भींच लो
देखो झाँक के इसमें जो चाहे अक्स देख लो
और उठ कर खिड़की से हाथ निकल दिए
आसमान ने भी जैसे द्रवित होकर दो बूंद गिरा दिए
लेकर उनको हथेली पे मैं बैठा देखता रहा
आँखें की मैंने गीली उनसे और बहार निकल गया
आसमान रहा वहीँ और मैं उसके नीचे चलता चला गया
जाने कौन थे वो लोग कहाँ से आये थे
वो साथ आते गए और कारवां बनता चला गया
बड़ी दूर निकल गए हम, बड़ी देर चले हम
कुछ ज़ख्म भर गए, कुछ नासूर बन गए
कुछ ने चाल डगमगा दी, कुछ हौसला सिखा गए
बैठे हम होकर बोझिल एक चट्टान पर चौड़ी
पसरी हुयी थी चांदनी और हवा में नमी भी थी थोड़ी
सो गए हम उसपर करके पैर सीधे
नींद आ गयी, थकान चली गयी
बड़े दिनों से थमी थी जो दिल में, वो रात गुज़र गयी
सूरज उग चला था, धुप होने वाली थी
चिलचिला उठे थे हम जिसमें वो सुबह फिर से होने चली थी
पर अब उतनी थकान न थी, कोई दुबकी शिकायत परेशान न थी
हाँ ये और बात है की अभी भी चेहरे पे मुस्कान न थी
पर हमें मालूम था की फिर से शाम होनी है
की फिर दिन ढले कुछ बातों के साथ बादल से मुलाक़ात होनी है
कभी वो कुछ गिरा देगा कभी सूखा ही गुज़र जायेगा
मेरे हाथ न फ़ैलाने पे कभी घनघोर बारिश भी करा देगा
मेरे दिल को जगाने को कभी बस बिजली खड़का देगा
मेरे उठ खड़े होने पे जोरों से हंस वो देगा
और मैं रहूँगा खड़ा पकड़े खिड़की की अपने सलाखें
ज़बरन सी हंसी लेके अपनी उसे देखा करूँगा
उसके मज़ाक पर मैं कोई न गुस्सा करूँगा
उसको जाते देख मैं पीछा न करूँगा
वो तमाम सवाल भी करे तो भी मैं ज्यादा कुछ न कहूँगा
वो जो रह जाती है उसके पीछे में उसके साथ रहूँगा
बैठ कर खिड़की पे हवा मन्ह्सूस करूँगा
उड़ती है दूर आसमान के कोने पे जो चिड़िया
बनती हैं जो उसके कतरनों पे डिजाइनें
उभरती हैं जो उसके साफ़ फैले पट पे चित्रकरियाँ
मैं उन्हें देखूंगा, पहचानूँगा, नाम दूंगा उनको
वो मेरे लिए हैं आती, एक अंजाम दूंगा उनको
मेरे जैसे और हैं जो रहते खामोश से खाली
उन्हें साथ जोडूंगा और काम दूंगा उनको
और जब थक के गिर जाऊंगा
जब सब कुछ करके फिर ऊब जाऊंगा
औरों के बीच बैठ कभी फिर से तनहा हो जाऊंगा
कुछ न कहूँगा, मैं कुछ न करूँगा
खामोश आकर फिर से अपनी झोपड़ी में
मैं लेट जाऊंगा, मैं सो जाऊंगा
सब एक लम्हा है और मैं उस लम्हे का होकर रह जाऊंगा

December 17, 2012

और है यहाँ अब कुछ भी नहीं
न निशान बाकी हैं
न हैं ढहती दीवारें
न रेतीली जमीं है
न भुरभुराता आसमां
है तो बस एक मंज़र
आँखों के सामने खुलता हुआ, बदलता हुआ
फिसलता हुआ, सरकता हुआ
उसपे लुढ़कते हुए लोग, उनकी आती हुयी आवाजें
जैसे कोई चीख कर गया है वहां से
जहाँ मैं अभी खड़ा हूँ
पर कोई दिखाई नहीं देता
कुछ सुनाई नहीं देता
कुछ रेंगता है कानों के पीछे
कुछ है जो उभरता है आँखों के बीच
कुछ है जो यूँ उठता है किसी सुगबुगाहट की तरह
और फिर गिर के कहीं गम हो जाता है
जैसे कोई था ही नहीं, कोई है ही नहीं
जैसे किसी ने कुछ कहा ही नहीं,
जैसे ये वक़्त हुआ हुआ ही नहीं
जैसे कोई हादसा जिसका किसी को पता ही नहीं
जैसे कोई इंसान जो मिलता नहीं
पर जिससे भी पूछो कहता है, ऐसा तो कोई लापता नहीं
और वो जो उसकी खोज में निकला है
लेकर हथेली के बीच उसका अक्स
बंद कर के मुट्ठी चल पड़ता है
उन दूर घुमड़ते रेत के बादलों की तरफ
और उसे देखने वाला जोड़ देता है एक और अंक
उनकी सूची में जिनका कभी पता कोई चला नहीं
क्यूंकि उन रेट के बादलों के बीच क्या है
ये कोई जानता नहीं
कुछ लोग पहले भी जा चुके हैं उधर
पर अभी तक कोई उधर से लौटा है नहीं
कुछ दूर, कुछ देर रहे उनके कुछ निशान
कहीं कहीं जमीन की रेत रही नाम उनके जाने के बाद
कभी उड़ के हवाओं से हाथों में आ गए उनके छोरे हुए सामान
और उनसे पता लगी उनकी थोड़ी सी सिमटती हुयी दास्ताँ
कहते हैं एक बार एक बाशिंदा आया था
वो गम था एक रात उन्हीं बादलों के बीच
और सुबह मिला था लेता हुआ रेत के बिस्तर के नीचे
उससे पूछा किया काफी देर की उस रात क्या देखा
उसने देखा उनकी और उनकी आखों में जैसे देखता हो कोई भूत
और भाग पड़ा वो वापस उन्हीं बादलों की और जैसे उन्हें जनता ही नहीं
जनता ही नहीं, पहचानता नहीं
वो उनके जैसा नहीं, उनसे उसका कोई नाता नहीं
वो फिर हो गया गम उन्हीं बादलों के पार
छोड़ कर हाथों में सिर्फ एक सूची जाने वालों की
जिनके नाम नहीं थे पहचान नहीं थी
वोही सूचि हवा में फड़फड़ाती थी
बंद कर उसे बक्से में, बहार से जड़ के ताल
बैठ गया मकान के बहार वो सूचि रखने वाला
पहले भी कई बार ये सूचि यूँ ही फड़फड़ायी थी
और उसको लगा था उस पार से है कोई आने वाला
वो जागता बैठा था कई रात उसके इंतज़ार में
बंद कर डब्बे में खाना करके उसको गरम
वो आएगा तो साथ खाऊंगा
वो आएगा तो चलेंगे झील पे नहाने
वो आएगा तो दिन भर होंगी डूब कर बातें
वो आएगा तो रात फिर से जवां होंगी
वो आएगा तो संग लायेगा खबर उनकी जो नहीं आये
वो आएगा तो बतलायेगा रखा क्या है बादल पार
वो आएगा तो बतलायेगा बातें नयी पुराणी
वो आएगा तो कहेगा होती क्या है चीज़ जवानी
वो आएगा तो रंग एक नया लायेगा
वो आएगा तो वो घर कोई फिर से चूना लगवाएगा
वो आएगा तो आँगन में लगा दूंगा एक नया पौधा
वो आएगा तो मंदिर की कर के सफाई
वही कुएँ की पास की मिटटी से बनाकर मूर्ति
लगा देंगे उस उजर चुके मंदिर में
उसके आने की सोच में आ गए उसकी आँखों में हल्का पानी
पोंछ कर उनको वो उठ बैठा और खोल दिए किवाड़
और दूर से आती उन सन्नाटे की आवाजों में सुनता कदमों की आहट
उसकी पलकों ने कर लिए बंद उसके मन के दरवाज़े
और ऐंठती पीठ करती खुद को सीधा
पसर गयी बिस्तर पे करके पैर सीधे
और फिर सुबह हुयी वहां कोई नहीं था
उठ के उसने एक और दिन जोड़ दिए उन दिनों की सूचि में
जिसमें लिखा था की आज फिर कोई नहीं लौटा
जिसमें था हिसाब की कब से है सब काम रुका हुआ
जिनको था पता की कब से है हाथ थमे हुए
जिनमें था बंद एक ठहरा हुआ सा इंतज़ार
जिनको था सब मालूम और ये भी पता था
की जिस दिन कोई लौटेगा सबसे पहले
ये शक्स उसको ये सूचियाँ दिखायेगा
और वो कहेगा फाड़ दो इनको पहले
अब मैं हूँ लौट आया अब इनको जाने दो
और इसके हाथ कापेंगे और कर न पाएंगे
हो चुकी है इतनी इंतज़ार की आदत
और दोनों बैठ के गुजारेंगे कुछ एक रातें
और फिर से हो जायेंगे यूँ जुदा
की आने वाला लेकर बैठेगा हाथों में सूची
और वो जिसने कब से इनको थाम रखा था
खुद जायेगा देखने की बादल पार क्या है
और बन जायेगा खुद एक और संख्या सूचि में
और जाकर उस पार वो जानेगा
की क्यूँ कोई वापस नहीं आता
क्यूँ वापस आने वाला कभी कुछ नहीं कहता
क्यूँ वो आँखों में देख कर औरों की घबरा उठता है
क्यूँ वो औरों से दूर रहता है
क्यूँ वो कहता है जला दो ये सूचियाँ
क्यूँ वो अक्सर बैठा रहता है जैसे की पत्थर हो
क्यूँ वो हिलता नहीं, किसी से मिलता नहीं
क्यूँ उसका चेहरा कहता है वो मिल के भी किसी से मिलता नहीं
क्यूंकि जाने वाला उस पार है इतनी दूर निकल जाता
की वापस आकर है वो सिर्फ तन्हाई ही पाता
कैसे वो किसी को समझाएगा
वो कैसे किसी को क्या क्या बतलायेगा
सब कुछ बताकर क्या वो बस एक कहानी नहीं बन जायेगा?
तन्हाई को भी वो दे देगा अलफ़ाज़ तो उसके पास क्या रह जायेगा?
उसकी आँखों में फिर से छलक आये हलके से आंसूं
और होठों पे तैर गयी एक मुस्कान
सूचि फिर फड़फड़ायी, हवाओं ने फिर से कुछ कहा
इस बार जो था सूचि के साथ वो सब समझ गया
खोल दिए उसने भी किवाड़, लेट गया वो भी सीढ़ी करके पीठ
सुबह ही उसको कहीं और निकल था जाना
उसे करना था कहीं और उसका इंतज़ार जो गया था बादल पार

December 9, 2012

हुए ख्वाब न मुकम्मल, कोई मंजिल न सही हासिल
कुछ और हुआ न हुआ, लेकिन खलिश ने तो आराम पाया

लगता था कैसे सम्हालेंगे, ये बोझ मलीदों का
कैसा खैर-ख्वाह था, संग अपने अपनी दवा लाया

सोचा था चंद रोज़, पर वक़्त लम्बा साथ बिताया
कतराते थे जिससे मिलने से, अक्स उसमें ही अपना पाया

काफी दिनों से उसको दागी बताते घूमते थे
आइना साफ़ किया तो चेहरे पे वोही निशान पाया

कोई हकीम नहीं था, कोई रकीब न मिला
खुद में छुपा था मर्ज़, खुद में ही इसका इलाज़ पाया

दर्द बढ़ा, पिसते गए और फिर हंसी छूटने लगी
हंसी ढूंढने निकले थे और रोकर ये हुनर आया

आया है जब से ये, मिला है जबसे हमको
लगता है पुराने यार ने, है बिन कहे ही गले लगाया

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मुद्दतो बाद कोई साथी हम जैसा मिला
हम सबसे अलग हैं, वो हमसे थोड़ा अलग मिला

उसकी शक्ल में हमको आइना मिला
दाग जो हममें है वोही उसमें भी मिला

अक्सर सोचते थे लोग हमसे क्यूँ कर कतरा जाते हैं
उसके चेहरे पे हाथ फिराया तो अहसास खुरदुरा मिला

December 4, 2012

इस राह क्यूँ चले
क्यूँ मंजिलों से भटके
क्यूँ कारवों से अलग हुए
क्यूँ खुद से हम मिले

राही थे भटके हुए
राहों से अलग हुए
अब न राह है न हम हैं
कुछ ऐसे हैं सिलसिले

उधार के थे कुछ दिए
वो भी अब गुम हुए
चुप थे सब जवाब कब से
अब हम भी चुप हुए

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कुछ दोस्तों की दोस्ती
एक माँ का प्यार
कभी कभी आज़ाद
बाकी बहुत लाचार