Archive for February, 2013

February 1, 2013

तेरे झूठ पकड़ते पकड़ते रात गुज़र गयी
सुबह को जो मिला उसे ही सच समझ लिया
क्या करूँ तेरी ताबीद में दौड़ता ही मैं रहूँ?
चैन से बैठता नहीं है मुझको बेचैन कराने वाला।
तुझसे ही आबाद हूँ और तुझसे ही शिकन है
मेरी बरबादियों में सर रखता है मुझको आबाद कराने वाला।
तू चला जायेगा तो जीना मुश्किल होगा मगर
तेरे होते जीना आसान नहीं होने वाला
है कोई और नहीं मुझको जलाने वाला
आईने देखते ही मिल जाता है मुझको रुलाने वाला।

लिखना जानता हूँ सो लिख रहा हूं मैं
सुनना जानते हो तो सुन लेना तुमभी

ज़ेहन में उठ गया है कुछ, सफाई पे निकला हूँ
वफ़ा की गंध बहुत है, झाड़ू बेवफाई की लेके निकला हूँ

महफिलों में बैठता था तो खाली खाली लगता था
अब तलाश में किसी की तन्हाई लेके निकला हूँ

बैठ लेता हूँ किसी के संग ज्यादा देर घुटन होने लगती है
वो भीगी सी तन्हाई भी अकेले में ज्यादा देर कहाँ रहती है

कभी उठ पड़ता हूँ, कहीं चल देता हूँ, जरा बहक लेता हूँ
वो जो कहती थी बात बात पे एक बात,
वो आवारगी भी अब कहाँ कुछ कहती है

जुस्तजू लेके निकलते हैं और थकन साथ लौटती है
बस कुछ हिलते पल ही रूकती है ज्यादा देर ये भी कहाँ साथ होती है

एक हंसी ख्वाब, कोई मुक़म्मल मुक़ाम, किसी नुरानी हूर की तलाश
घर से निकलते वखत ये सिक्के साथ रखते हैं
कोई लम्बी मुलाक़ात, इफरात बातें, कुछ इरादे
इनकी दरम्यान में ये जाने कब खर्च हो जाते हैं
और लौट आते हैं हम, सब कुछ जाया हो चुकने के बाद
दिमाग खामोश, चाहतें गुम, बदन टूटता हुआ
बाकी नहीं रहती कोई आरज़ू, कोई बुलंदी, कोई बात कहने को
अपने पास रखा सब कुछ जैसे अपने पास कुछ ढूंढता हुआ
और पसर के इनके बीच ढके हुए इनकी झीनी कपकपाती चादर में
होक बोझिल हम एक गहरी नींद में सो जाते हैं
और उठने पर सामने होती हैं कुछ खुली परतें
एक धीमी सी सरकती हुयी गतिहीन सड़क
लोटा लेके उसके किनारों पे हगती हुयी झुर्रीदार बुढ़िया
उगते, खुलते, उमड़ते, बिगड़ते उबड़ खाबड़ रास्ते
और उनपर बेतहाशा दौड़ते हुए वो तमाम लोग
सीने में ग़म, हाथों में खंज़र, और जुबां पे सवाल लिए
और देख कर उनको मैं लौट पड़ने को मुड़ता हूँ
वहीँ को जहाँ से मैं कभी चला था
सीने में ग़म, हाथों में कागज़ और जुबां पे मलाल लिए

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क्या करोगे बंधू अब याद कर के तुम किसी को
चलो पिटारा एक गुमनामी वाला अब खोला जाये
वो खाली बक्सा और उसकी वो स्याह सी दीवारें
चलो अब ऐसी ही किसी ईमारत में रहा जाये
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बन तो जाऊंगा यूँ भी, कुछ न कुछ तो मैं लेकिन
तेरे प्यार में बनता तो कुछ और बात होती
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हाथों में नहीं कुछ है
है पैरों में रमी चप्पल
आगे है नयी बस्ती
पीछे कुछ उजड़ा सा रहता है

वो मेरा यार था जो एक
था हमेशा बोलता रहता
हुआ है उसको न जाने क्या
अब चुप चुप सा रहता है

कुरेदा है उसे मैंने
खदेड़ा भी है दूरी तक
झकझोर के हाथों से है पूछा
मगर वो कुछ भी न कहता है

आँखें हैं झुकी उसकी
कुछ घायल सी भी लगती हैं
रहूँगा चुप और बैठूँगा
तो शायद वो कुछ कह देगा

चलूँगा मैं तो देखेगा
गिरूंगा तो वो रो देगा
कीमत है बड़ी उसकी
चुकाऊंगा तो बोलेगा

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