Archive for November, 2012

November 23, 2012

एक और शाम सुर्ख हुई, एक और दिन का बसेरा हुआ
दुनिया की सुबह हो गयी और अपने लिए अँधेरा हुआ
कैसी अजीब बात है, कहने को दोनों की एक ही रात है
तेरी आँखें मूंदे गुज़र गयी, मेरी आँखों में ही रह गयी
वो बाग्चे वो मंज़र वो रास्ते वो इमारतें
गुज़रे तो इधर से ही थे जाने अब किधर गयीं
कुछ शख्स भी हमें मिले और कुछ सामान भी
कुछ खोया खोया सा लगा निग़ाह जिधर भी गयी
शहर में पहुंचे कभी, कभी बयाबां पे सो गए
दिखी जहाँ बगिया और पानी हम वहीँ के हो गए
बदन में हलकी सी सुस्ती आँखों में नमी हो आई थी
हमको पता भी न चला कब नींद में हम रो लिए

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आत्मा बेचैन है और दिल औ दिमाग में कोई उलझन नहीं
अब मैं इसको इधर उधर की बातों में उलझाऊं भी तो कैसे
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किसी को लगता होगा की हमारे पास सब कुछ है
और हमें लगता है की किसी के पास क्या कुछ है
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आज डूबते वखत सूरज जरा देर इंतज़ार में था
मैंने कहा बेकार है मेरा तुझसे कोई वास्ता नहीं
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ठंडी में मोहब्बत में मशगूल अलग से चलते मालूम पड़ जाते हैं
हम कम्बल में सर छुपाते हैं वो खुद की आग में सिकते जाते हैं
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चलने लगता हूँ तो चल देती है ज़िन्दगी
रुक जाता हूँ तो रुक जाती है ज़िन्दगी
आजकल मैं अक्सर बैठा रहता हूँ
इसी लिए शायद बैठी रहती है ज़िन्दगी

चुतियाफा मत करो, फिलोसोफी से सर मत जोड़ो
चूतिया हो तुम इसलिए पत्थर से जाकर सर फोड़ो
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November 19, 2012

ऐ शाम चली जा, मेरा इंतज़ार ना कर
चुप चाप ठहर जा, कोई बात ना कर
मत छू मेरे हाथों को दूर ही रह
न खुद की सुना ना मेरी ही सुन
बीच मेरे तेरे ये जो, उभरते जो गहरे साये हैं
इन्हें रहने दे, इन्हें छू कर देख
कुछ इनसे भी बातें कर के देख
जाने कितनी शामों से ये
तुझसे मिलने को तरसे हैं
तू तरस मुझसे मिलने को आज
और इनके अहसासों को जी कर देख
मैं भी चलता हूँ कुछ दूर कहीं
मुझे जाने दे मत पीछे आ
ना आवाज़ दे, ना हाथ बढ़ा के बुला
खोजूंगा मैं भी कोई माकूल जगह
बैठूँगा मैं जिसके चौबारों पे
ढूढूंगा मैं कोई गलियारा
जिसके खामोश बिसरे सन्नाटों में
मैं मिलूँगा खुद के सन्नाटों से

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ज़िन्दगी मज़े में है क्यूंकि कोई काम नहीं है
मुसीबत ये है की खाली बैठे आराम नहीं है।
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खाना, सोना, रोना, और मुझे अब काम है क्या
अंजाम भुलाने वालों का, इससे बेहतर अंजाम है क्या

हाथों से मेरे वो रोज़ ज़रा, ज़रा सा सरकती जाती है
बाकि अब केवल हाथ रहे, लकीरें नहीं इनपे बाकी हैं
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एक और शाम फलक से टूट के गिर गयी
मैंने हाथ फैलाये थे वो ज़मीं से मिल गयी
मेरे हाथों में फिर से आज चाहतें ही रह गयीं
उन्हें चेहरे पे फिराया, तो लगा नमाज़ अदा हो गयी
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कुछ भी नहीं है पास हमारे बस तन्हाई की बातें हैं
कट जाते हैं दिन तो हमारे, कटती नहीं पर रातें हैं
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November 11, 2012

किसी पेड़ की टहनी से
गुपचुप से आसमानों में
लटकता छतों से मकानों की
एक गुमशुदा सा तारा
गिर के डूब जाता है
शायद इसे किसी की तलाश है।

दो पलकों के दरमियाँ
बंद पानी के चंद कतरे
सिमट आये बन कर आँसूं
औ पलकों से झूलते हैं
जैसे गिरने से पहले इनको
किसी के आने की आस है।

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ये क़त्ल मेरे ही हाथों होना था
इस हादसे में मुझको ही मरना था

लग के जिस खंजर गला हलाक होना था
उस पे मेरी उँगलियों के निशान होना था