Archive for March, 2016

March 21, 2016

 

ख़ुशी की राह में जो ग़म आये
वो बदनुमा दाग़ ही शायर बनाये
खोजा क्या था मिला क्या इसकी छोड़ो
बुझ गयी आग पर धुंआ जिंदगी से ना जाये
ढूंढ पाना मुश्किल, खो जाना भी न मुमकिन
किस तरफ जाये यही सोच शायरी बन जाये

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खो गयी है आग
ठंडी हो चली जो राख़
जेब में रखता हूँ

मध्य में रात्रि के
जैकेट की जेब स्पर्श कर
राख का उभार महसूस कर
खोयी आग टटोलता हूँ

परदे के पार होगी
सागर के पार होगी
किसी के पास होगी

शामों में उसको देखा
धुँधलों में उसको ढूंढा
हवाओं से उसको पूछा

पानी के भीतर उतरा
राख मुट्ठी की छोड़ दी
जहाँ आग हो नहीं सकती
वहां वो खोएगी भी अब कैसे

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चलो आज दिल्लगी करता हूँ
खुद से ही कुछ अनकही कहता हूँ
पत्थर जो किसी ने फ़ेंक कर मारे
उनकी याद में समेट लिया करता हूँ
हो आता है जब भी उन पर रंज
चौसर सजा पत्थरों से जीत लिया करता हूँ
पत्थर हैं खुद कभी चोट नहीं करते
ज्यादा याद आती है तो उछाल दिया करता हूँ

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रात नहीं है दिन भी नहीं है
बंधू कहो ये वक़्त कौन सा है?
दरवाज़े के बाहर आसमान है
क्षितिज वही है, दृश्य नया है
बंधू कहो ये शहर कौन सा है?
मिट्टी है, बंजर रेती है