Archive for April, 2014

April 30, 2014

जब भी गिरता है द्वार पे कोई पत्ता
मैं तुमको याद करता हूँ
सरक जाती है शाम हाथों से छोड़ तन्हाइयां
मैं तुमको याद करता हूँ

उठता हूँ सोकर तो चटकती हैं बिस्तर की दरारें
नहीं सुनाई देती थी ये पहले
रहती थी गूंजती तुम्हारी रात की आवाज़ कानों में
सरकते रहते थे गुज़रे पल बाहों के आगोश से
और मैं उनमें डूबा तैरता रहता था
अब सब सुनाई देता है
गूंज आने वाले खोखले पलों की
दातों के बीच से लुढ़ककर बाहर आती हंसी

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मैं, अपने हर टुकड़े में कितना खूबसूरत हूँ
उन टुकड़ों के संगम में ही बदसूरत हूँ

ऐसे भी हमें ज़िंदगी है तुझसे कोई प्यार नहीं
पर ऐसा भी हाल मत कर की नफरत हो चले

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हो सकता है की तुम जीत जाओ
पर मैं हार जाऊँ ये मुमकिन नहीं

दोस्ती निपट गयी, जब भी दोस्त से सौदा हुआ
कुछ हाथ हासिल ना हुआ, नुकसान चौतरफा हुआ

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इक चिड़िया इक पंछी इक उड़ान

सब बंद हैं किसी डब्बे में

तोड़ना संभव नहीं जिसकी दीवारों को

हैं बनी वो मुलायम मखमली अहसासों की

हैं जंज़ीरें पैर में सख्त बहुत

हैं ज़र्ज़र हो सकती हैं भंगुर एक झटके में

लेकिन रखना है उनको पास, है ढूंढना उनकी चाभी

तोड़ने पर वक़्त और किस्मत का पहरेदार

लाकर बाँध देगा नयी मोटी ज़ंज़ीरें

हिलाना होगा जिनको मुश्किल

होगा तोड़ना नहीं संभव

छोड़ेंगी जो मोटे घाव गहरे निशान पैरों पे

बदन को ही नहीं जकड सकती हैं वो रूह तक को

सो थामे बैठे रहो इन पिघलती लोहे की सलाखों हो

की जब तक आसमां की आग भरती नहीं उंगलियों के पोरों में

और आकर समां जाती नहीं बिजलियाँ हथेली के मध्य में

और निकलती रस्सियां कलाइयों से

तब तक थाम के बैठो उड़ती जाती शाम को

की चटकने ko hain betaab jiski parchhaiyaan

ki hain shaamil ismein sabhi aasmaan au dharti wale is saazish mein

ki ruko thoda sabr k

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April 6, 2014

कोई अच्छी खबर नहीं
कुछ खास नहीं कुछ काम नहीं
किसी भी कुयें में
तुम्हारा अक्स तुम्हारा अयाम नहीं
हर वृक्ष से लटकते हैं मुर्दे लिपटे चादरो में
बदबू है शीतल छाया नहीं
स्थिर है शाम खड़ी लटकाये भुजायें
लटका हुया गले से मध्य से फटे एक चादर का लिबास
उंगलियों के बीच बुनता एक जाला जैसे हो डायन का
खड़ी घात में शाम बुझने को सूरज का आखिरी चिराग
जब लपकेगी ये मुझको लिपटा लेने अपनी उँगलयों के मध्य के जाले में
और लटका देगी मुर्दों के जंगल में
तुम आओगी जब, ढूंढोगी मुझको
सब चादर के बीच पहचानोगी मुझको
टूट पडूंगा मैं खुद ही जैसे पेड़ से टूटा फल
फाड़के चादर फिर मुझको निकालोगी तुम
लेना मुझको बाहों में मत देना आंसू मुझको छुने तुम
रख देना अपने अधर मेरे अधरों पे गर चाहना छूना मुझको तुम
जी उठूँगा मैं फिर से हो जाऊँगा खड़ा
कैसे निकलेंगे जंगल से सोच ना घबराना तुम
पकड़ तुम्हारा हाथ पेड़ की डाल बनेगी अपनी कटार
काट उसी से जाले सब निकलेंगे उस पर हम
जहां खड़ा होगा झरना और उसके पीछे सूरज
दौड़ेंगे चीते हम पर और झपटेंगी चीलें भी
पर हम जूझेगे सबसे और निकलेंगे जीवित भी

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एक खिड़की खोल खडा हूँ
जीवित बाहर अंदर मृत पड़ा हूँ
एक बेल सरकती है
उपर को उठती है
कर स्पर्श मेरे हाथों का
छाती से लिपटती है
कर अधरों पे सिहरन
दे कुछ कम्पन
सर पे आन टपकती है
एक बेल लटकती है

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जाने किस बात पर itna हंस रहा था वो क़ातिल
कत्ल कर रहा था या खुद कत्ल हो रहा था वो क़ातिल

खुद को लुटा दोगे तो जीने का मज़ा आयेगा
राहों में खो जाओगे तो जहां हो वहां होने का मज़ा आयेगा

ख्वाहिशों के समंदर में तैरता चाहतों का मोती है
जिसने देखा था सपना रात में, दिन में वही आंख रोती है

मेहनत से जी चुराओ, आराम में मन लगाओ
गर्मी का मौसम है, आओ बैठो कच्चे आम खाओ

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Hey road. Don’t end just yet.
I wanna keep bicycling a little while more.
Don’t make me take a turn.
A few more calories left for the day to burn.
Hey Road. Don’t go close on me.
Am gonna keep banging on your door till you acquiesce.
Hey road, don’t be a quitter.
Hey road, do you hear me.
Don’t be so huffy puffy.
Hey road, I have been here many times before. …
but never before have I wanted to go cross you.
Hey road, just open up.
Hey road, just hold on still.
Hey road, just fall upside down.
Hey road, I wanna fall down you.
Hey road, I will catch you somewhere in the fall.
Hey road, take a fall, you shall be safe falling along me.
Hey road, if we meet the ground,
with the jaws crushed and tar broken,
we will keep holding hand.
And when the new road is built,
it shall bear our name.
Hey road, lets fall, lets fall, lets fall

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ये ही हो के रेह गयी है ज़िंदगी अपनी यारों
थोडी ट्रेन में बाकी प्लेटफार्म पे कट रही यारों