Archive for October, 2012

October 28, 2012

जो भी कहे तू हमसे
हम तेरा फरमान बजा लायेंगे ऐ ज़िन्दगी
नाचे हैं तेरी धुन पे ये सोच की कभी
हम तुझको भी नचाएंगे ऐ ज़िन्दगी

मिल जायेगा सोने को हमें फैला सा आसमान
धरती पे लेट जायें तो बिस्तर मिल जायेगा ज़िन्दगी
पर हमको तेरी ख़ाक में फिसलना, गिरना, गिर के फिसलना पसंद है
लगा दे खाक चेहरे पे, हम मुंह धो धो के लौट आयेंगे ज़िन्दगी

भटकने में तेरी राहों में आने लगा है हमको सुकूं
अब बस्तियों में तेरी किस कदर रह पाएंगे ज़िन्दगी
हाथों में तुझको बंद किया, सीने से भी लपेट के सोये हैं
अब ख्वाब ये है खुली राहों पे, तुझको दौडायेंगे ज़िन्दगी

October 14, 2012

हम आज़ाद पंछी हैं
हमें सस्ते कबूतरों की तलाश रहती है
इस दुनिया की फर्श के नीचे
एक मद्धिम सी परछाई चलती है
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वो जो मैं हूँ, वो जो मैं था, वो जो मैं हो सकता था
वो जिसके होने से बहुत कुछ सिमट सकता था
बहुत कुछ जो अब बन चूका है गहरा निशाँ, मिट सकता था
वो जिसको मैंने बहुत बार है गढ़ा पर साकार कर न सका
वो जिसको मैंने रखा सीने से लगाके पर साथ रख न सका
वो जिसकी चीखें गहराने लगी थीं इतनी कि मैं और सुन न सका
वो जो देखता रहा मुझको आँखों से ऐसी कि दहशत पैदा कर दे
कि पास आकार उनको ढकना पड़ा और कहना पड़ा अब बस भी करो
वो जिसके हाथ हरदम बाहर झांकते रहे
वो जिसको पकड़ा मैंने बाजु से कि कहीं वो मेरा हाथ थाम न ले
वो जिसके साथ अब आगे चलना दूभर था
वो जिसका भार इतना था कि उसका खुद से हिलना मुश्किल था
वो जो चपक गया थे मेरे जिस्म और मेरी रूह से
वो जिसको खरोंचना पड़ा रगड़ रगड़ के
वो जिसको मुझे कहना पड़ा अलविदा
वो जिसको कर बंद बोरे में मुझे रखना पड़ा किसी कोठरी में
वो जिसकी लाश से आती बदबू को मुझे हर रात सहना पड़ा
वो जो जग जाता था अक्सर पूनम कि रातों को
वो जो गा पड़ता था कोई गीत रेशम सा
वो जिसके केशु से महक उठती थी घर कि फिजा
वो जो निकला तो कुछ और ही में तब्दील हुआ
जिसकी आँखों में जैसे दूरी थी, जिसके हाथ थमे थे
जिसने उठाते ही गिरा दिए उसके जो औज़ार थे
जिसकी नर्म आँखों में देख कर मेरी सख्त आँखें झुक गयीं
जिसके पास अब भी न कोई करने को शिकायत थी
कैसे कहूँ वो कौन थी शायद मेरी मासूमियत थी
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मेरे हर गीत में
गुनगुनाहट तेरी होगी
मेरी हंसी में मिली हलकी सी
रोने की आवाज़ तेरी होगी
मेरे हताश हो बैठ जाने पे
गिरेगी पीठ पर जो उठ के
जो होगी खुद अपने बोझ से बोझिल
जो कहेगी मुझको उठने को
और बैठ जाएगी मेरे उठ जाने पे
जिसकी साँसों में मिली होगी
एक ऊबी हुयी सी आवाज़
इक डूबी हुयी सी चीख
इक अनसुनी फरयाद
इक अनकही शिकायत
इक अनसुना शिकवा
इक कड़वी सी कहानी
इक टूटा सा किस्सा
इक बिखरी सी हकीक़त
जो बैठ जाएगी मेरे चले जाने पे
और देखेगी शुन्य में
जो रातों को मेरे सो जाने पे
देखती है अक्सर बंद दरवाज़े को
कभी झांकती है उसे खोलकर बाहर
दूसरे घरों की जली लाइटों में छुपी
घुरघुराते हुए ऐसी और कूलर में दबी
बंद बत्तियों वाले कमरों में अँधेरे से ढकी
जैसे कुछ देर को वो मिल जाती है अपने जैसे औरों से
नींद की झपकियों में अकड़े पड़े बंद झरोखों के
नीचे से फिसल आते हैं वो टुकड़े टुकड़े में
और देख कर इक दूसरे को देते हैं हिचकिचाती हुयी हंसी
हिला के हाथ कह देते हैं वो जानते हैं उन्हें
फिर सब व्यस्त से हो जाते हैं खुद में
कोई जेब में अपनी हाथ डालकर
कोई इक बुझी हुयी सिगरेट मुंह में लगाकर
और देखते हैं अगल बगल की शायद कोई
उनको देखता हो जरा अकपकाकर
फिर जैसे अच्च्नाका हर इक के लिए
बाकी सब बुझ जाते हैं, हो जाते हैं विलुप्त
और वो पते हैं फिर से खुद को खड़ा अकेला
बीच में शोर के घुरघुराते कूलरों के
और दूर हिलाते हुए पेड़ों के बीच से झांकता है कोई
वो चले जाते हैं अपने अपने दरवाजों के अंदर
जहाँ सोया पड़ा है कोई जो उनको जानता था
और लेट जाते हैं बगल में आँख खोले
कभी बंद करते उसको कभी मिचमिचाते
की बगल से हाथ कोई आकर उनपे पड़ता है नींद में
कुछ देर वो भी करवट ले उसको हैं गले लगाते
और जैसे कुछ पल को वो फिर हैं जान जाते
की कुछ है जो अब पहले जैसा नहीं रहेगा
इक टूटा घड़ा जो अब कभी नहीं भरेगा
लेके उसे कुम्हार फिर कुछ बना देगा
बनाकर कोई चीज़ मनोरंजन की किसी आले पे सजा देगा
देख कर उसको जब कोई हंसेगा
कैसे वो उसको उस पल कहेगा
की ऐ हंसने वाले, मुझे इतना आकर्षक पाने वाले
मत पकड़ मुझको ऐसे की मैं रो पडूंगा
की पेट मेरा अब भी है पानी से भरा, कि मैं फट पडूंगा
और जब हाथ तेरा जो जायेगा गन्दा
और मेरे भी चेहरे की पोलिश उतर जाएगी
बाकी है तेरे चेहरे कि ये जो मुस्कान
ये भी किसी बासी हो चुकी सुहाली कि तरह चली जाएगी
और मैं लगने लगूंगा तुझे पिछली दिवाली का पकवान
समय हो गया है जिसको अब त्यागने का
और फिर लगूंगा हाथ मैं किसी कबाड़ी के
जिसके पलड़े पे मेरी कुछ कीमत तै हो जाएगी

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October 7, 2012

मैं,
और जमीन पर ठहरे
मेरे दो प्रतिबिम्ब
एक हल्का, एक गहरा
एक लम्बा, एक छोटा
और उनपर रखा
चप्पलों का जोड़ा

जैसे अगल बगल रखे हुए
एक दुसरे से जुड़े हुए
जिंदगी के हिस्से
और उनपर पड़े
ज़िन्दगी के पत्थर

चप्पलें उठ चुकी हैं
अब पत्थरों की बारी है

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ज्यादा देर कुछ भी नहीं रहता
न मिसरी की तरह पिघलता
जीत का अहसास
न मुंह में किरकिरी करता
हार का स्वाद
ज़िन्दगी जो पहले हरदम बोलती रहती थी
अब अक्सर कुछ नहीं कहती

बैठी रहती है ओढ़ कर इक सूती साड़ी
हवाओं से इसका घूँघट उड़ता हुआ
घुटना, हाथों के जामे में कसा हुआ
कुछ नहीं कहती, बैठी रहती है
क्या है इसकी आँखों में
पता नहीं चलता
चिट्ठियां आती हैं
पड़ी रहती हैं
बारिशों में भीग जाती
ठण्ड में ठिठुर लेती है
पड़े थे ओले जब पिछले साल
बदन जम गया था, आँखें सख्त हो गयी थीं
इक करवट ले ज़मीन पर गिर पड़ी थी
नाक के पास हाथ रखने पर
मालूम पड़ती थी सांसों की हवा
पेट को ध्यान से देखने पर
मालूम होता था की कुछ सरकता है
कोई जुगनू है अंदर, शायद कोई केंचुआ रहता है
जो धीरे धीरे चुपचाप अंदर चलता है

लेकिन आजकल हालात कुछ बदले मालूम होते हैं
उसकी आँखों में कुछ रौशनी सी मालूम होती है
बैठ जाओ गर बगल में और न कुछ बोलो न बोलने को कहो
तो झूठ नहीं कहता, उसकी नब्ज़ भी सुनाई देती है
ऐसा लगता है अभी उठ पड़ेगी, और नाचने लगेगी
रात भर से बैठा रहा उसके मानिद
कल रात तो नाची नहीं, कल रात घूँघट डाले रखी
अभी कई और रातें बाकी हैं,
अभी कई और दिन मैं जागूँगा
हाँ, जब भी उसका चेहरा रोशन होगा
हाँ, मैं उसे तब तक ताकुंगा

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अब हमारे मिलने की कोई सूरत नहीं, ए दोस्त
क्यूंकि पास हमारे जो था, बचा उसका कुछ भी नहीं
वो वक़्त का लम्बा पैजामा, वो उम्मीद का बहता नाड़ा
जब हम में हमारा कुछ भी न था
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October 5, 2012

ऐ मेरी कविता
तू मेरे लिए क्या है
मन बहलाने का साधन
समय काटने का ईधन
या बकचोदी का इंजन
जब दुनिया से थक जाता हूँ
हो जाता हूँ कुछ बोर
जब सब कुछ पाकर भी कुछ नहीं प्राप्य कर पाता हूँ
जब सोच कर मैं कुछ डर जाता हूँ
जब लोगों से मिलकर पक जाता हूँ
सर में हो जाता है दर्द
सब कुछ गलत है लगने लगता
घुमड़ने है लगता कुछ कुछ अंदर
जब कोई चुप चाप से ये है कहने लगता
चल करते हैं बंधू फिर से कविता
जब मैं खुद को कहता हूँ नहीं नहीं
मेरे पास अभी कहने को कुछ है ही नहीं
जब मैं यहाँ वहां खुद को व्यस्त कर जाता हूँ
जब चाह कर भी मैं रातों को सो न पाता हूँ
जब मन में लाकर भी बात कोई
जिसको गरियाना था उसको सुना न पाता हूँ
जब लगता है कोई होता, कोई होता साथ कोई
जब लगता है नहीं हो रही कोई भी नयी अब बात कोई
जब लगने लगती है ये दुनिया सूनी सूनी सी
जब आँखें बंद कर लेने पर भी नींद नहीं दिख पाती है
जब सुबह तक जगे रह जाने की बात सोच
मेरी पतली हालत और भी महीन हो जाती है
जब कम्पयूटर की ओर जाते हुए मेरी उंगली कपकपाती है
जब कई बार खोल कर लैपटॉप कविता अटक जाती है
जब हम खुद स पूछते हैं की
क्या कविता करना जरुरी है?
क्या होती है कविता? क्या स्टर होगा?
हम खुद को कारन पिछले याद दिलाते हैं
की हम तो तब ही लिखते हैं जब खुद को रोक न पाते हैं
चलो आज करो अपवाद कोई, चलो यूँ ही लिख लेते हैं
जो पहले लिखीं उन्हें किसने है पढ़ा? एक और यूँ ही कह लेते हैं
हम कवी नहीं है, हमारे अंदर कविता है
हम तो बस जो रहता है उसे कह लेते हैं
सब बातों का सार यही की
या हम लिखते हैं या जग लेते हैं

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ऐ मेरी कविता
तू मेरे लिए क्या है
मन बहलाने का साधन
समय काटने का ईधन
या बकचोदी का इंजन
जब दुनिया से मैं थक जाता हूँ
हो जाता हूँ खुद से बोर
जब सब कुछ पाकर भी लगता है
ऐ काश की पा जाता मैं कुछ और
जब लाख कोशिशें कर के भी
कुछ प्राप्य नहीं कर पाता हूँ
जब सोच कर किसी अनहोनी का
मैं मन ही मन में कुछ डर जाता हूँ
जब मिलता रहता हूँ लोगों से
और मिल मिल कर उनसे पक जाता हूँ
जब ऑटो वाले से झों झों कर
सर में दर्द हो जाता है
जब चीज़ों के थोड़ा सा बिखरते ही
‘सब हो जायेगा गलत’ लगने है लगता
जब छोटी छोटी सी बातों पर
कुछ घुमड़ने अंदर से है लगता
जब घर जाने का मन न हो
और लगने लगता है लम्बा बहुत ही रस्ता
जब दिल्ली की मेट्रो में खड़े खड़े
पतली टाँगे दुःख जाती है
जब घर वापस जाने वाली आखिरी मेट्रो
देर बहुत लगाती है
जब कोई कन्या कहती है, ‘चलो मिलते हैं’
पर शाम को फ़ोन नहीं वो उठाती है
या उठा कर कहती है अभी करती हूँ
फिर गायब हो जाती है
जब खाना खाते वक़्त हम सोचा करते हैं
उसका फ़ोन अभी आता होगा, वो क्या करती होगी
तभी घंटी बजती है और पुराना घिसा दोस्त दारू पीने के लिए बुलाता है
जब दारू के पैग के ऊपर वो लम्बी कहानी सुनाता है
जब मन सब और से है चटने लगता
जब कुछ भी नहीं है ढंग का लगता
जब प्याज पड़ा गरम उबला अंडा
जबां पर लग, है ठंडा लगने लगता
जब टी वी पर सब पार्टी वाले चिल्ला चिल्ला कर बातें करते हैं
जब लगता है आने वाला पल आएगा फिर नहीं जायेगा
जब लगता है जब जग से सब चाहने वाले चले जायेंगे
तो कौन संग रह जायेगा
जब मैं यहाँ वहां खुद को व्यस्त नहीं कर पाता हूँ
जब चाह कर भी मैं रातों को सो न पाता हूँ
जब मन में लाकर भी बात कोई
जिसको गरियाना था उसको सुना न पाता हूँ
जब लगता है कोई होता, कोई होता साथ कोई
जब लगता है नहीं हो रही कोई भी नयी अब बात कोई
जब लगने लगती है ये दुनिया सूनी सूनी सी
जब आँखें बंद कर लेने पर भी नींद नहीं दिख पाती है
जब सुबह तक जगे रह जाने की बात सोच
मेरी पतली हालत और भी महीन हो जाती है
जब यूँ ही जबरन हाथों से कम्पयूटर की इस्क्रीन खुल जाती है
लेकिन उसके की बोर्ड पर जाते जाते कविता लटक जाती है
तब हम खुद से पूछते हैं की
क्या कविता करना जरुरी है?
क्या लिखने को है कुछ पास तेरे
क्या खालिस हैं ये जज़्बात तेरे
जब हम खुद को जो कल सोचा था
वो सब शब्द याद दिलाते हैं
अनायास उभर आये मन चित्रों को
कविता में अर्पित करने की बात दोहराते हैं
जब हम यूँ ही अपने मन को
भटकते हैं, उलझाते हैं
जब हम खुद पे खाली मुली की शंका पैदा करते हैं
जब हम खुद पे कविता के अनर्गल स्टेंडर्ड थोपा करते हैं
की हम तो तब ही लिखते हैं जब खुद को रोक न पाते हैं
की हम तो हर कविता से अपना स्तर बढ़ाते हैं
तब धीरे से कोई कहता है, बंधू करो आज कोई अपवाद कोई
कह डालो जो भी कहना है, अच्छा या बकवास कोई
गुरु क्या तुमको लगता है तुम हो सुपर स्टार कोई
कविता है नहीं अमृत मंथन है, कर दोगे देवों का उद्धार कोई
बस कुछ शब्दों का इक ढेर है ये, पाखंडों का एक अम्बार है ये
कृष्ण की भूली बंसी है, वीणा का टूटा तार है ये
हम बेगैरत बेदर्दों जग में केवल उद्धार है ये
हम कवी हैं केवल उतनी देर जितनी देर हम कविता कहते रहते हैं
कहते हैं खुद को कवी जो वो कविता नहीं ढकोसला किया करते हैं
अरे बस अंदर कविता होने से कोई कवी नहीं बन जाता है
करने होते हैं त्याग कोई, तब कवी ह्रदय वो कहलाता है
जो पहले लिखीं उन्हें किसने है पढ़ा? चलो एक और यूँ ही कह लेते हैं