Archive for August, 2012

August 31, 2012

दबा लाया हूँ मुट्ठी में कुछ
देखो तो इसे क्या है
मुट्ठी बंद है आज फिर मेरी
देखो तो क्या लाया हूँ मैं
झोले में मेरे पास जो था
वो लेकर बैठ गया
हर आने वाले को देता गया इक मुट्ठी झोले से
उसने जो दिया लेके रख लिया झोले में
देखो तो उन्होंने क्या दिया
इक खाली डब्बा, टूटी हुयी चप्पल
वो लुढ़कती हुयी बोतल
यही चुरा लाया हूँ
बचा कर ले आया हूँ
छुपा के ले आया हूँ
घर में घुसा हूँ इन्हें लेकर
सब सामान अब भी वैसा ही पड़ा है
जैसा छोड़ कर गया था
पीछे से है कोई आया नहीं
कोई कहीं गया नहीं
कोई मेरे पीछे था ही नहीं
वो खाली डब्बा
मैंने उलट पलट कर देखा
जैसे उसमें था कभी काम का कोई सामान नहीं
जैसे उसे अपने वज़न पे है कोई गुमान नहीं
जैसे उसे ये याद नहीं वो क्यूँ बना था
उसे कुछ पता नहीं वो क्यूँ तुला था
वो बाज़ार, वो हाट वो दुकानें
जिनमें वो कभी रोशन था
अब वो जैसे कहीं हैं ही नहीं
जैसे वो कभी थी ही नहीं
बस वो यूँ ही था हमेशा
इक खाली डब्बा, बेकार सा, बेढब सा
जिसमें रख लिया करते हैं लोग कोई भी सामान
कुछ भी काम का उसमें अमाता नहीं
वो किसी के भी ठीक काम आता नहीं
वो दे देते हैं उसे जो भी उसे ले जाता है
वो भी चला जाता है जहाँ भी उसे ले जाते हैं
रख देते हैं उसे जहाँ वहीँ पड़ा रहता है
रख देते हैं उसमें जो भी वो ले लेता है
कभी कोई कीमती चीज़ जैसे घड़ी
कभी खाने का कोई तेल लगा सामान
उसे मालूम है उसकी कीमत रखे हुए सामान से नहीं
उसे मालूम है उसकी बोली अब नहीं लगेगी
उसे मालूम है वो बिक चुका है, वो चुक चुका है
लुढका दी बोतल मैंने जमीं पर
कुछ देर खनकती इक आवाज़ के बाद
बंद हो, खामोश हो बैठ गयी है कोने में बिस्तर के नीचे
कितनी जल्दी समझ गयी है ये यहाँ के रिवाज़
ऐसे लगता है जैसे देने वाला इसे यहाँ से ही चुरा ले गया था
जैसे अपने ही घर की कोई चीज़ वापस आ गयी हो
जैसे इसके बिना कोई कमी सी थी
जैसे इसके होने से वो कमी और बढ़ गयी
टूटी चप्पल को नीचे रखकर मैंने डाल दिए उसमें अपने पैर
थोड़ी बड़ी है, पाँव छोटे हैं, अंगूठे और उँगलियों के दबाव से
इसकी आँखें निकल आई है, घिस चुकी है, उधड़ रही है
धीरे से सरका दिया इसे मैंने बिस्तर के बाजू में
कल मोची के ले जाऊंगा, टांका लगवा दूंगा
देखो कुछ मेरी ही तरह इसके भी टुकड़े निकल रहे हैं
कुछ कीलें लग जाएँगी, दुरुस्त हो जाएगी
कुछ दूर और चल जाएगी
मुझे भी तो जाना है इक मोची के पास
अपनी मरम्मत करवाने, तुरपन लगवाने
दिवार पे एकटक कुछ देर युहीं देखा
पड़े हर सामान पर फिर से नज़र गयी
ये भी आये थे यूँ हीं किसी रोज़
और जबसे आये हैं यहीं के होके रह गए
बाहर की दुनिया में इनका कोई ख़ास मोल नहीं
मेरे पास भी इनका कुछ ख़ास काम नहीं
रख पाता हूँ मैं इनका कुछ ख़ास ख्याल नहीं
पर इनके होने से यूँ लगता है कुछ है
कुछ है जो अभी अटका हुआ है
कुछ है जो अभी रवां है, अभी चल रहा है
कुछ है जिसे अभी दुरुस्त नहीं करना
कुछ है जिसे मोची के पास नहीं ले जाना
और यूँ ही सोचते आँख लग गयी
जाना होगा इक रोज़ मोची के पास
पर अभी वक़्त है, शायद अभी वक़्त है

August 14, 2012

पुचका पुचका है समां
धुप्प अँधेरा भी है
कुछ करो कुछ करो अभी
बुझता सवेरा है मियाँ

चार दिवारी है जंजीरें हैं
लोहे की मोटी सलाखें हैं
पास जा कर देखो इनके
छीटों की खून के आमादें हैं

कोने में इसके एक कोई
परछाई सिमटी बैठी है
आवाज़ नहीं आकार है बस
यूँ सिकुड़ी सिमटी बैठी है

सलाखों पर चोट करो तो
आँखें लाल दिखाई देती हैं
फट पड़ती है उठ पड़ती है
फिर यूँ चिल्लाती ये फिरती है

मत छेड़ो इसको बैठे रहने दो
मत पूछो कुछ चुप रहने दो
कुछ पकडे बैठी है हाथों में
रिसता है लहू तो यूँ ही बहने दो

है पास नहीं कुछ बस अंगारे हैं
बेबस कुंठित लाचारी है
है शोर बहुत भीतर अंदर
उसे ख़ामोशी में रहने दो

——————————————————–

एक कमरा है
जिसके कोने में एक पत्थर है
कुछ करता नहीं है
वो हिलता नहीं है
किसी से कुछ कहता नहीं है
वो पत्थर मैं हूँ

——————————————————

मैं उगता सूरज नहीं हूँ
इक टूटता तारा हूँ मियाँ
मिलूं जाऊं तो दुआ मांग लेना
पूरी हो जाएगी मेरे जाते जाते

———————————————————–
धुप्प अँधेरा काली रात
कैसी है घनघोर ये रात
कोई आओ कुछ तो ला दो
माचिस डिबिया ढिबरी जला दो
———————————————————–

ना सोने का कोई कारन ना उठने की कोई वजह,
लगने लग गयी है जिंदगी हमको बेवजह
—————————————————————

मेरे तरकश में अब भी कुछ तीर बाकी हैं
जख्मी हो भले ही दिल अभी शरीर बाकी है

कमान से निकला हुआ तीर हूँ, मुझे कहीं जाना नहीं है
कहाँ जाके गिरूंगा देखना है, खुद को आजमाना नहीं है
कि वापस जा नहीं सकता, सफ़र ही अब तो मंजिल है
कि जब तक हूँ संग साथ चल, मेरा कोई ठिकाना नहीं है

————————————————–
कब से बदन भीगा नहीं है
कब से जिस्म को है हाथ न लगा
लगता है आज भी यूँ ही जायेगा
लगता है आज भी न नहाऊंगा मैं
—————————————————
जिस्म से टूट कर गिरता लहू
सूखे लहू के टुकड़ों में उभरता अक्स
ये अक्स किसका है?
—————————————————-

August 13, 2012

उठा कर फ़ेंक दो मेरे को किसी गड्ढे में की मैं थक गया हूँ

ले लो मेरे सर से ये बोझा की मैं अब थक गया हूँ

की दे दो फिर से मेरी पीठ पर वो ही बस्ता पुराना

की फिर से भेज दो मुझे स्कूल मुझसे पढाई करवाओ

खड़ा कर दो मुझे बेंच पे मारो मुझे डंडियों से

की दौड़ाओ मुझे व्यस्त रखो इतना की यूँ ही नींद आ जाये

की इतना लाद दो मुझको तुम ज़माने भर की तानाशाही से

की दो पल जो मुस्कुरा लूँ तो समझ लूँ मायने आजादी के

August 9, 2012

तुमसे मुलाक़ात नहीं हुयी
आज फिर कोई बात नहीं हुयी
दिन बीते हुए देर हो चुकी है
पर लगता है जैसे आज फिर रात नहीं हुयी

बारिशों में भीग आया
बड़ा लम्बा एक सफ़र कर आया
घर पहुँच कर दरवाज़ा खोला तो पाया
साथ वापस आई हो ऐसी कोई बात नहीं हुयी

August 4, 2012

दूर तलक देखो
जहाँ तक जाती है नज़र
वहां तक घुमा के देखो
है कहीं कोई मुकाम नहीं

शाम ने पाई और गहराई है
दिन में भी एक धुंधली छाई है
लाशों से पेड़ बन खड़े हैं
किसी की छांह में कोई राहत कोई आराम नहीं

(शाम ने पाई और गहराई है
एक धुंधली दिन में भी छाई है
जंगल में लाशों के खड़े हैं
कहीं कोई राहत नहीं
है कहीं कोई आराम नहीं)

शहरों में रह कर देखा
बाजारों में चल कर देखा
दुकानों में रह के देखा
चौसर पे बिछ के देखा

चालें बदल के देखा
पासों से दोस्ती कर के देखा
अपने ही जूतों से खुद को मार
संग औरों के हंस के देखा

यूँ दागी निकला सामान
माल अपना कहीं बिक न पाया
हर सौदे में मिली रुसवाई है

रहती पहले अपने साथ
एक भारी सी तन्हाई थी
आज जब गुल्लक को खंगाला
पास उसके सिर्फ धुंधली सी परछाई थी

(भीगे दामन ने किया सामान गीला है
इसके दाग भी खुल कर उभर आये हैं
दाम कुछ भी हो कोई खरीददार नहीं
हर सौदागर ने बांटी सिर्फ रुसवाई है

रहती पहले अपने साथ
एक भारी सी तन्हाई थी
आज जब खोल गुल्लक मैं झाँका
पास उसके सिर्फ धुंधली सी परछाई थी)

खींच के उसको मैं लाया आईने के पास
पकड़ हाथों से खड़ा किया
सख्त हाथों से मुंह ऊपर किया
आँखों में उसके कैसी ये दरारें उभर आई हैं

मैं खिड़की से बहार ताकता हूँ
वो खुद मैं सिमट आई है
अभी अनजान नहीं बने हैं लेकिन
दरम्यान दूरी सी निकल आई है

————————————

वो जो शीशे से लिपट कर खड़ी है
वो परछाई मेरी है
जो रात भर रोई है और आँख अब भी नम है
हाँ वो भीगी सी तन्हाई मेरी है
कट गए हैं शीशे की तेज़ धार से इनके किनारे
इनके कटने से निकल आई जो चीख है
हाँ वो चीख मेरी है

—————————————
तन्हाई से गीले हो चले दामन को
सूखने दाल दिया है तेरे आँगन मैं
——————————————-

ज़िन्दगी की अपनी करवटें हैं, हमारी अपनी उड़ान है
उसके उड़ते पन्नों के बीच रह गया, मेरा छूटा सामान है

——————————————–
लाओ आज मेरे हाथों में तुम मशालें दे दो
अँधेरा साथ लाया हूँ मुझको उजाले दे दो
सौदा करो मुझसे आज तुम तो बड़े सौदाई हो
कटारें ले के मेरे हाथों में अब तलवारें दे दो

खंजर से है डर किसको लहू बदन में क्यूँ कर चहिये
ढहा डालूँगा सख्त नाखूनों से कितनी भी दीवारें दे दो
——————————————–