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February 2, 2014

मायूस इक आसमां से गुजरता सितारा हूँ
रखो पानी का थाल नीचे उसमें ठहर जाऊंगा

जब भी हंसता हूँ शुबहे उभर आते हूँ
रो लेने के बाद ही दिल को सुकून होता है

प्यार खुद से रंजिशें भी खुद से हीं
खुदा भी मैं बंदा भी मैं कायनात मुझ से ही

होती हसरतें पूरी तो बेहसरत सा हो जाता हूँ
ज़िंदगी गुदगुदाती है तो रुआंसा सा हो उठता हूँ

लिये सौ सूरज निगाह में दौड़ता हूँ ले जलते पैर रेत पे
शाम होने पे ढूंढता हूँ गर कोई तारा टिमटिमाता है

तपिश दिन की है पर जलन बाद शाम के होती है
और सोचता हूँ गर सलवटें रात की चुनीं होती

तेरे होने पे क्या होता ये मुझको नहीं मालूम
तेरे ना होने पे हाँ मैं लेकिन रोज़ रोता हूँ

उदासी है सबब इसका है नहीं ठीक से मालूम
मालूम होता तो भी क्या मैं हंस रहा होता

सब कुछ जान जौऊंगा तो करूंगा क्या मैं ए दोस्त
नासमझ ही रहने दो है समझदारी में क्या रखा

आंसू हैं खुद अपना रास्ता खोज ही लेंगे हम तक
हम उनको बुलाते हैं जो खुद कही रुख इधर का नहीं करते

अब मत हँसाओ की हंसने में बड़ी तक़लीफ़ होती है
तज़ुर्बा ये नया है और अब तज़ुर्बे अच्छे नहीं लगते

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मेरे बदले लिबासों पे मत जा ए दोस्त
दिल के हालात अब भी फटीचर से है

हाँ ये टी शर्ट का बटन है अभी हाल में टूटा
ये बेसुध लापरवाही है है सीना नहीं धड़का

देखना है तो उंगलियाँ फिरा मेरे कपड़ों के नीचे
सीने के पास रफू किया इक पैबंद मिलेगा

मत चूम इसको मत उधेड़ अभी ताज़ा है ये ज़ख्म
उंगलियों फिरा के मर्ज़ जानने का हुनर है तो और बात है

सह लूंगा तेरी खातिर दर्द ये और यही मेरा प्यार होगा
दूंगा दर्द जो फिर तुझको उसको समेटना तेरा हिसाब होगा

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आज सितारा टूटा है
सारंगी का तार कोई
वृक्ष के तन से जा लिपटा है
आज सितारा टूटा है

आँखों में अंकित विस्तृत आकाश
आगोश में आज आ सिमटा है
आज अंधेरा चमका है

टूटी टूटी ठहरी ठहरी
पानी की जलधार कोई
में आज इक भाटा उट्ठा है
हाँ कोई सवेरा बैठा है
आज सितारा टूटा है

रेतों की बोरी के नीचे
पैर सिकोड़े सिर को पकड़े
कोई सवेरा लुका बैठा है
हाँ आज अंधेरा चमका है

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खड़ा हूँ
उपर है सुराख आसमानों में
दिखायी कुछ नहीं देता उसमें से
हाथों में सूखता पत्ता
चूर हो जाता उंगलियों की जुम्बिश से
गहराती शाम ठहरी खडी है
टुकड़ों से पनपती एक तस्वीर
मैं लेटा देखता उसको
और शाम ढलती बंद आँखों से
इंतेज़ार में मेरे पहले कदम के