Archive for October, 2010

October 30, 2010

Prayers…

there is bit of noise
but its soft and slow
face is placid n pale
its calm but sans glow

past is getting buried
future yet to be planted
taking a stock of my prayers
as many rejected as granted

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October 27, 2010

अनकही

कहाँ कहता हूँ मैं वो सब
जो मैं कभी नहीं कहता हूँ
जग के लिए हैं बाकी बातें
मेरे लिए जो नहीं कहता हूँ

शोर में भी उन्हें सुन लेता हूँ
भीड़ में उनमें ही गुम रहता हूँ
हो लाख सदाएं दुनिया की संग
कुछ बाने मन के बुन ही लेता हूँ

दब जाते हैं जो शब्द मेरे यूँ
कविता में उनको सी लेता हूँ
इनमें भी अक्सर ढूंढ़ न पाया
वो जो मैं कभी नहीं कहता हूँ

गर सुनते वो जो हैं ख़ास मेरे
बिगड़े बदसूरत अलफ़ाज़ मेरे
बीच की सहसा चुप्पी में पाते
वो जो मैं कभी नहीं कहता हूँ

——————————————-
कहते कहते बस रह जाता हूँ
वो जो मैं कभी नहीं कहता हूँ
जग के लिए हैं बाकी सब बातें
मेरे लिए है जो नहीं कहता हूँ

शोर में भी उसे मैं सुन लेता हूँ
भीड़ में भी उनमें गुम रहता हूँ
हो लाख सदाएं दुनिया की संग
कुछ मन के बाने बुन ही लेता हूँ

दब रह जाते हैं जो शब्द मेरे यूँ
कह कविता मन हल्का कर लेता हूँ
पर इनमें भी अक्सर ढूंढ़ न पाया
वो जो मैं कभी नहीं कहता हूँ

October 11, 2010

क्या गलत किया?

तुमसे मैंने जो प्यार किया
तो बोलो क्या कुछ गलत किया?
किया किया तो बस किया किया
सही करके भी किसने क्या कर लिया?

तुम न मिलती तो क्या मर जाता?
लोग ऐसा भी कभी यूँ पूछा किये
क्या कर लेता ऐसा भी मैं बोलो
तुम बिन बस जो यूँ जी जाता?

मुझको न मालूम जीवन की बातें
इतना मुझको कुछ ज्ञान नहीं
जो होता भी मुझको सब मालूम
क्या भाग्य मेरा कुछ बदल जाता?

कुछ करने से कुछ बनता है नहीं
कुछ न करने से न कुछ बिगड़ जाता
जो होता है उसे अब हो जाने दो
यूँ भी जग मैं क्या है रह जाता?

तुमसे मैंने जो प्यार किया
तो बोलो क्या कुछ गलत किया?
किया किया तो बस किया किया
सही करके भी किसने क्या कर लिया?

October 11, 2010

आँखों से है छुआ…

हम दोनों खोये खोये से हैं
हैं दोनों खुद से जुदा जुदा
हों चाहे रोने के लाख बहाने
हंसी ओंठ से है न जुदा

हंस देती हो तुम खुलकर जब
मूरख सा मैं कुछ कह देता हूँ
मैं उठ कर नाचने लगता हूँ
पर तुम बस चुप हो जाती हो

कैसे बोलूं क्या कुछ बोलूं
कई बार ये सोचा करता हूँ
फिर देख तुम्हारी ओर प्रिये
यूँ ही मैं फिर हंस देता हूँ

कहा नहीं है तुमने कुछ
पर मैंने है ये आभास किया
मैं चुप चाप सोया रहता हूँ
और तुमने आँखों से है छुआ

October 6, 2010

सुपर कमांडो

 

खाना खाने के बाद छेदी की ताकत मनो बढ़ सी गयी थी. आखिर वो भी पहले दर्जे का सुपर कमांडो था. अगर बैज़नाथ को अलग कर दिया जाये तो शायद ही कोई उसका मुकाबला कर सकता था. “बैजनाथ का भी बस किस्मत का खेल है. अगर शाका उसकी जगह मुझे मिला होता तो आज मैं बैजनाथ से बेहतर होता,” छेदी बडबडाया. उसकी नाराज़गी बेवजह नहीं थी. बैजनाथ स्कूल मैं नया आया था. छेदी वहां का पुराना चैम्पियन था. फिर चाहे बात फ्ल्यिंग किक मारने की हो या पाइप  के रास्ते स्कूल की बिल्डिंग पर चढ़ने की, छेदी सबसे अव्वल था. अभी पिछले ही साल जब बिजली का तार पकड़ने की शर्त लगी थी, तब भी तो वो नहीं घबराया था. हॉस्टल की एक मंजिला इमारत से कूदकर उसे सामने से जाती बिजली की तार छूनी थी. ‘हवा में लटकते हुए तार छूने से कर्रेंट नहीं लगता,’ ऐसा हॉस्टल के उभरते हुए वैज्ञानिकों का मानना था और छेदी इसे सिद्ध करना चाहता था. उसके इस कारनामे ने कुछ तो सिद्ध किया ही था, भले ही इसके लिए उसे बिजली का तेज़ झटका सहना पड़ा, जिसने कई दिनों के लिए शर्म से उसकी नज़रों को जमीन से उठने नहीं दिया था. यह देखकर हॉस्टल के मनो-वैज्ञानिकों ने एक रास्ता निकला जिसके तहत उस रात कई लोग उसके कमरे के बाहर जमा हो गए और आपस मैं यह चर्चा करने लगे की हो न हो, छेदी जैसा बहादुर कोई नहीं. 

“भाई ऐसा कुछ करने के लिए कलेजा चाहिए, जो मेरे अंदर तो नहीं है भाई” उनमें से एक बोला.

“सही बात है. मैं तो कहता हूँ छेदी पहले नंबर का कमांडो है.” दूसरे ने जोड़ा.

“मेरा भी यही मानना है. मेरे हिसाब से वो ही हमारे स्कूल और हॉस्टल का सबसे उत्तम सुपर कमांडो है” तीसरे ने तुकारी लगायी. 

कमरे के अंदर से सोने का नाटक कर रहे छेदी की मानों बांछे खुल गयी थीं. कुछ देर बाद वो ऐसे निकला जैसे उसने कुछ सुना ही ना हो. सभों की ओर देखते हुए मुस्कराया, ओर वे सब भी मुस्करा दिए. छेदी ने समझा उसकी बहादुरी की क़द्र करते हुए मुस्कराए हैं. वो उसकी नासमझ हरकतों पर खुश हो रहे थे ओर सोच रहे थे अगला धमाका कब होगा. 

लेकिन अब हालात बदल गए थे. बैजनाथ दूसरे स्कूल से आया था ओर बड़ी ही रफ़्तार के साथ बहादुरी ओर सुपर कमांडो दल मैं उसने ऊंची पदवी हासिल कर ली थी. उसकी फ्ल्यिंग किक अजय देवगन जैसी है, ऐसा लोग कहने लगे थे. छेदी मैं फुर्ती तो है पर बैजनाथ में ताकत भी है.

“मियाँ एक लात लग जाये तो समझे मुंह नहीं सीधा होने का कई रोज़ तक.”

“मैं कहता हूँ ऐसी नौबत ही क्यूँ आने दिया जाये. बैजनाथ से तो दोस्ती बनाये रखने मैं ही भलाई है.”

“हाँ. ओर वो नेकदिल भी तो कितना है. अभी पिछले हफ्ते एक कबूतर को चोट लग गयी थी. उसने उसका इलाज़ किया ओर अब अपने ही कमरे मैं रखा हुआ है. ओर क्या बात मनाता है वो उसकी. उर कर उसकी उंगली पर बैठ जाता है. मैं कहता हूँ वो छेदी से बेहतर कमांडो बन चूका है.” 

छेदी को मानों काटो खून नहीं. उसकी सरजमीं पर किसी ओर ने आकर अधिपत्य जमा लिया था ओर वो बेबस सा देख रहा था? कभी नहीं. आज वो खाना खाकर जल्दी आ गया था और बैजनाथ के कमरे के बहार खड़ा था. एक जोर की लात के साथ दरवाज़ा खुल चूका था. अंदर मैदान साफ़ था. बाकी सभी लोग अभी भी खाना खाने में व्यस्त थे. छेदी की निगाहें शाका पर जा टिकीं. वो अपनी खिरकी पर फुदुक रहा था. चप्पल उतार कर छेदी बिस्तर पर चढ़ गया ओर शाका को अपने हाथों मैं ले लिया. थोरा पुचकारने के बाद वो उसकी भी उंगली पर ऐसे बैठ गया मानों उसी का कबूतर हो. एक मधुर और कुटिल मुस्कान छेदी के चहरे पर आ टिकी. अब उसे लोगों के आने का इंतज़ार करना था, ताकि अपने नए करतब का प्रदर्शन कर के वह खोयी हुयी सुपर कमांडो की पदवी हासिल कर सके. 

इसमें कितनी देर लगनी थी. तमाशा अच्छा हो तो तमाशबीन आप ही जुट जाते हैं. थोरी ही देर में संभु, राजू और मनीष सब जमा हो चुके थे. छेदी कमरे के बीच में खरा शान से मुस्कुरा रहा था. माज़रा कुछ समझ में न आ रहा था. लेकिन जो भी था कुछ अच्चा ही होने वाला था. छेदी फिर से बिस्तर पर जा चढ़ा और अपना हाथ हवा में फैला दिया. पंखा बंद कर दिया गया था जिससे की शाका को कोई चोट न पहुँच सके. एक छोटी सी सीटी के साथ ही शाका उर और उर कर उस के हाथ की उंगली पर जा बैठा. ठीक वैसे ही जैसे कुली मैं अमिताभ बच्चन के कंधे पर बाज़ जा बैठता था. फिर क्या था. तालियाँ बजने लग पारी. इतने में बैजनाथ वहां आ पहुंचा. नज़ारा देखकर उसे मसला समझते देर न लगी. छेदी के सामने खरा होकर उसने बोला, “छेदी भाई मान गए. आखिर ये तुमने कर ही दिखाया. मुझे तो पहले से ही पता था.” बैजनाथ ने शाका की ओर देखा मानों इशारों ही इशारों में शिकायत करता हो. कुछ नाराज़गी सी भी थी. शाका को अपने पर दया करने वाले की आँखों में बेरुखी कुछ कम भाई. उसने अपनी पाकर छेदी की उंगली पर बढ़ाई और देखते ही देखते उसके नाख़ून छेदी की उंगली के आर पार थे. खून बह चला था. आखिर हर जुंग की तरह सुपर कमांडो की जुंग में भी खून तो बहाना ही पड़ता है.