Archive for October, 2013

October 5, 2013

बरसों किया तेरा इंतज़ार
तुम नहीं आये
अब रुक गया है वक़्त
थक गयी है मंजिल
रूठ गयी है महफ़िल
बैठा हूँ एक मील के पत्थर पे
रख हाथ घुटनों पे
जो हैं घायल उखड़े हुए
ढके कपड़ों से जो दीखते हैं उजड़े हुए
हाँ उनमें हैं वो संगमरमर के पैबंद जड़े हुए
हाँ उनमें उन चुनिन्दा कांच के टुकड़ों की नक्काशी भी है
जिनमें से अक्सर झाँक लेती हैं
मेरी घायल सी आँखें मुझको
जिनमें अक्सर दिख जाती है तेरी ही सूरत मुझको
की जिसके देखे बाद कुछ और दिखाई नहीं देता
तेरी ही हंसी, तेरी ही चुप्पी, तेरी ही गूंज रहती है ज़ेहन में
तुम चली जाती हो पर तेरा एहसास नहीं जाता
आवाज़ थम जाती है लेकिन सन्नाटा नहीं जाता
और भर जाता है माहौल फिर शोर के टुकड़ों से
जो कानों में मेरे भर जाते हैं पर जैसे कुछ भी अन्दर नहीं जाता
जाने क्या हो जाता है मुझको, जाने मैं कौन बन जाता हूँ
आँखें खुली रह जाती हैं पर मैं अन्दर ही अन्दर सो जाता हूँ
सुनने वाला कोई नहीं रहता मैं बोलता चला जाता हूँ
जाने किसको सुनाता हूँ, जाने क्या कह जाता हूँ
पर हाँ, सब के जाने के बाद भी मैं अकेला नहीं रहता
तेरा शोर, तेरा सन्नाटा, तेरी आवाज़, तेरी तड़प, तेरी गूंज
तेरी महफ़िल, तेरी तन्हाई, तेरी हर एक तमाम अदा
टुकड़े तेरे वादों के, तेरे झूठों के पुलिंदे
तेरी मक्कारी, मेरी रुसवाई, तेरा दामन में दिया घाव
वो फटा हुआ अंग वस्त्र मेरा, ये सब, हाँ ये सब
सब रहता है साथ मेरे, कितना कुछ छोड़ जाती हो तुम अपने पीछे
और फिर इस मलबे में जैसे दब के बैठ जाता हूँ मैं
धीरे धीरे लेता श्वास, जो है जीवन का आधार
जो है नश्वर, जो है सीमित हैं जिनमें हम असीमित
उनको पकड़ता हुआ, उर्जा लेता हुआ, तुमसे लड़ता हुआ ख्यालों में
खड़ा हो उठता हूँ यकायक किसी झटके से
पीछे छोड़ता हुआ मलबा, तुम्हें और तुम्हारे बदगुमानी ख्यालों को
धकेलता पीछे तुम्हारे अनछुए, अन्होने, अनुपलब्ध अस्तित्व को
ढूंढता यथार्थ की ज़मीं, पकड़ता पाँव से एक तत्वसार धरातल
होने देता इसकी ठंडी चुभन को अपने अन्दर प्रवाहित
और नकारता तुमको, तुमसे उठती नकारात्मकता को
धकेलता पीछे तुमसे जुड़े हर एक अहसास बिंदु को
जैसे जीने की ललक को बचाता किसी चक्रवात से
आखिर मेरे जीने में ही तो तुम्हारी सम्भावना है
तुमसे मिलने के लिए मुझे तुमको ही खोना होगा
तुमको पाने के लिए मुझे तुमसे विहीन होना होगा
हाँ, तेरे काबिल बनने को मुझे फिर फिर रोना होगा
तुम खड़ी हो शीशे के उस द्वार के पार
जिससे जुड़ी लौह यथार्थ की जाली को हूँ मैं पकड़े खड़ा
जिसके पीछे से तुम मुस्कुराती मुझे बुलाती हो
है ये निशा और तुम इसमें भी मुझे दिवास्वप्न दिखाती हो
ये क्या करती हो, जो पहले से पागल है उसको और पागल बनती हो
मिले हैं जिसके तत्वों में सौ अवगुण, उसमें अपनी दीवानगी का रस भी मिलाती हो
उफ़ ये तो बता दो ऐ सोनपरी आखिर तुम मुझमें ऐसा क्या पाती हो
क्यों मेरी ख़ामोशी में अपना स्पंदन मिलाती हो
क्यूँ हर एक शोर में तुमसे दूर हो जाने का ख्याल ला कर मुझे डराती हो
क्यूँ तुम मिल नहीं जाती, क्यूँ तुम हो नहीं जाती
क्यूँ तुम यूँ बिखरी बिखरी निखरी निखरी
हर पल में कुछ अलग नज़र आती हो
देखो ये तुमने अब है क्या कर डाला
यूँ केश बिखराकर, पैर फैलाकर, आँखें सुजाकर क्यूँ हो बैठी
मेरे यूँ छीटाकशी पर हो क्या छुब्ध प्रिये
क्या है कुछ बतलाओ तो, कह दो क्या ला दूँ बस मान जाओ प्रिये
करो केश श्रृंगार कुछ मादक करो मुस्कराहट से उनपर सजावट
बजने दो ढोल अपनी हंसी के, फैला दो मादकता इस उपवन में
तुम हो मृग मारीच मगर मैं तो हूँ माया राम नहीं
आऊंगा फिर भी तेरे पीछे, मुझे मिलना है तुमसे नहीं ये आखेट प्रिये

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bada thakau kaam hai tumhain likhna
bada jhilau kaam hai tumhein likhna
man bojhil karna padta hai
man se sab kuchh hi kehna padta hai
sahi galat ke paimanon ko
sachche jhuthe armaanon ko
aadhe adhure farmanon ko
bin soche samjhe adaab baja laana padta hai
sach kehta hun tumko kehkar kuch der ko mar jana padta hai

sab so jate hain to tum jag jati ho
sab kaam nipat jate hain to tum bach jati ho
pakar mujhko akela mujhse yun lipat jati ho
jaise ho tum rakt pipasi bel koi
tum ho tum ho koi aatankit nari
tum ho badan ughada sa
mujhse keh raha, lao pehna do mujhko meri sadi
sadi jismein lipat ke main ek aurat ban jaungi
sari jiske alingan se main khud swayam ke qabil ho jaungi
sari jiske konon se main apne mod dikhaungi

kehta humko jaise vish ugla karta hun
gala mera chhil jaata hai, dimag nahin rehta theek kone
sab hil jaata hai, sab pil jaata hai
dharti ambar ka har manzar mujhmein aakar
simte jal sa kisi surahi mein, mil jata hai
fir tum so jate ho, main jagta reh jaata hun
tum pure ho jate ho, main fir akela, adhura ho jata hun
tum chal dete ho, main baitha reh jaata hun
karta tumhara intezaar, paane ko fir se tumhara karchhata pyaar
adhar pipase ho uthte hain, kaaya jalne lagti hai
mjhko to fir jalti agni si, pipal ki chhaya lagne lagti hai
kya kahun nahin keh sakta mat jaya karo
niyati hai tumhari puri ho jaana
hai niyati tumhari mujhko chhod chale jaana
tumko bhi kahan jaana achchha lagta hai
you tukdon tukdon, chhadon mein rehna kahan suhata hai
tum bhi ho mazboor main bhi vivash bandha hua hun
is rachna ki paddhiti ke niyamon, bandhnon mein fansa hua hun
par kar sako agar to kar do itna,
sun sako agar to bas sun lo itna
jaya karo jab bhi jaana hai
par wapas aane mein waqt itna mat lagaya karo
apne is pyaase mitti manav ko itna mat tarsya karo
nahin barish tumse maangta hun, nahin umeed badi koi jodta hun
jaaya karo jab bhi jaana hai, aane ka waqt nahin bataya karo
par jate jate mere sukhe ghade mein
gala geela rakhne ko kuchh bunde chhod ke jaya karo
mat mujhko itna sataya karo

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कहाँ मिलेगी मुझको आग
छोड़ी हाथों से क्यूँ आग
लगी जलाने थी वो हाथ
जलती खाल तो सह भी लेता
थी लगी जलाने चमड़ी वो आग

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