एक मुट्ठी अनार के
मैंने तुम्हें दिए थे
क्या किया तुमने उनका?

ख़त कुछ प्यार वाले
मैंने तुम्हें लिखे थे
क्या किया तुमने उनका?

वो जो मेरे अरमान थे
वही, जो तुम्हारे लिए
बस सजावट का सामान थे
क्या किया तुमने उनका

मैं कल बारिश में चलता था
धूप में पिघलता था
एक टीला था उधर ही
ऊँचा सा था वो
बड़ा नुकीला सा था वो
बैठ गया था उसके ऊपर
बड़ा मटमीला सा था वो
उसके ऊपर बैठकर
जो मंजर मैंने देखा
मालूम तुम्हें क्या था?
आग लगी हुयी था
सब कुछ ही जल रहा था
धुआं बड़ा काला सा
यूँ, ऐसे, सब तरफ उठ रहा था
एक कुत्ता घूमता था
एक हाथ खींच लाया था कहीं से
पर छोड़ चला गया
इतना कुछ जल गया था
अपनी भूख भूल आया था
चारोँ तरफ देखा उसने
सिर्फ मैं था टीले पे
दौर पड़ा वो मेरी तरफ
आकर बैठ गया मेरे पास
चाटने लगा मेरे पाँव
जैसे कह रहा हो मुझसे
बचा लो इस शहर को
जाकर देखो तो सही अन्दर
शायद कोई सांस लेता हो
अरे कुछ तो करो
कैसे बन गए हो तुम
क्या हो गए हो तुम
जाते क्यूँ नहीं हो
चलो मैं भी चलता हूँ
मेरे साथ आते क्यूँ नहीं हो
पर वो गया नहीं
बैठा रहा मेरे
मेरे पाँव चाटता हुआ
उस धुऐं में ज़हर था
ये उसका ही असर था
की मैं बैठा हुआ था
वो लेटा हुआ था
कुछ आवाजें उठने लगी थीं
बदहवास सी आवाजें
दर्दनाक सी आवाजें
कैसे करूँ बयाँ
बड़ी खतरनाक सी आवाजें
जैसे जानती थी वों
बैठा है कोई उस पार
उस ऊंचे टीले पे
वो साले सब आ गए
जाने कहाँ से वो आ गए
जल रखे थे वो सब
बड़े कुरूप बड़े घिनोने
से हो रखे थे वो सब
मैंने उन्हें देखा
थोड़ा सा हंसा
और ढेर सारा थूक दिया
वो देखते थे मुझको
वो जान गए थे मुझको
अपने लिए नहीं मेरे पे तरस खाके
यूँ ऐसे खुली नयनों से ताकते थे मुझको
वो अन्दर चले गए
शहर के साथ हो गए
वो जो धू धू कर जलती थी
उस आग के हो गए
वो भस्म हो रहे थे
खून निकल आया था
हाथों के नीचे बहकर
जमीं पर लुढ़क आया था
चाटता था जिसको वो कुत्ता
भूख मिटाता था जिससे वो कुत्ता
जीभ अपनी लपलपाकर
आँखों में प्यार दिखाकर
मन में भूख छुपाकर
और मांगता था वो कुत्ता
धीरे से हलके हाथ से
छिले उघडे हुए मांस को दबाया मैंने
वो जो उसमें पड़ सड़ गया था
उस खून को बहाया मैंने
कैसा बेरहम था वो
कितना बेबस था वो
जीने को किसी को तो नोचना था
मेरे ही खून से भूख अपनी
मिटा रहा था वो कुत्ता
सूरज ढल चूका था
शाम भी जा रही थी
वो जिसमें सब कुछ दिखने है लगता
वो रात आ चुकी थी
जो जानता था मैं कबसे
वो सब समझ आ रहा था
वो शहर था अनहोने अरमानों का
उसको जल जाना ही था
बड़े उलझे हुए अरमान थे वो
उनको घुट जाना ही था
मैं खुद से कह रहा था
बैठा रह युहीं इस टीले पे
मत दौड़ उनकी तरफ
तुझको बच जाना ही था
देख अपने भी घावों को
कितनी चोटें लगी हुयी हैं
दर्द नहीं होता तुझको?
खोने को था जो वो तो खो ही दिया
जो खो रहा है उसका
अहसास नहीं होता तुझको?
उठ के चल दिया मैं फिर
उस टीले से नीचे
उस शहर की ओर
पाँव रुकते नहीं थे
नज़र थमी ही रहती थी
जिस ओर भी देखता था
हर चीज़ बात करती थी
झाँका था जिससे बाहर
वो रोशनदान था उसमें
वो घडी, वो पेंसिल वो पेंचकस
क्या क्या सामान था उसमें
सब कुछ नहीं था होने लायक
बहुत कुछ वाहियात भी था उसमें
एक सर मिला मुझे उसमें
किसी प्यारे का था
ओर ये, ये देखो ये किताब, ओर ये कपड़ा?
ओर ये छड़ी जिससे किसी ने मारा था
ओर वो फूलों वाली क्यारी
जिसे हमने खेल खेल में उजाड़ा था
उसके फूल भी थे आज वहां
मुरझाने से पहले जल गए थे
मैंने हाथों में उठाया उनको
वो मेरे जैसे ही तो थे
उनको सहलाया मैंने
मुझे माफ़ कर देना
उनके कानों में बताया मैंने
फिर उनको हाथों से गिरा दिया
साढ़े पाँव में सीधा चल दिया
अब भी मेरे साथ मेरे पीछे
आता था वो वफादार कुत्ता
सूँघता उन फूलों को
चाटता, नोचता, खाता
कुछ बोटियों को, कुछ लोथड़ों को
में जा बैठा था
शहर के बाहर उस तालाब के किनारे
मैं उसमें उतर रहा था
उसके पानी में मिल रहा था मेरा खून
जिसे वो कुत्ता पी रहा था
उसकी भूख मिट चुकी थी
शहर की आग बुझ चुकी थी
मैं अब भी जल रहा था
तालाब का पानी खारा हो चला था
शायद मैं रो पड़ा था

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