Posts tagged ‘5. हिंदी कविता’

October 12, 2015

समंदर की लहरों के बीच पानी की एक बूँद
सूरज की किरणों में चमकता धूल का एक कतरा
वक़्त का रिसता हुआ एक पल
हाथों के स्पर्श को ढूंढता उढ़का हुआ दरवाज़ा

पर खुलने का इंतज़ार करती चिड़िया
वादियों में बहता हुआ एक कम्बल
आँखें मींचे कृतिम ध्यान में लीन साधु
ढलान पे खिसकती साइकिल

आज आईने ने कोई शक्ल अख्तयार नहीं की
सारे मुखोटे उतर गए

October 21, 2014

एक चिड़िया मेरे हाथों से कूद गयी

कुछ केहते हैं वो उड़ना सीख गयी

कुछ केहते हैं उसकी टांग टूट गयी
सब कुछ ना कुछ केहते हैं
बस वो चिड़िया कुछ नहीं कहती
जाने क्या मंज़र देखा उसने कूदकर
की सच केह्ता हूँ वो है फुदकना भूल गयी
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जब वक़्त सो जाता है

मन चिड़िया बन उड़ जाता है
तब अक्सर घर के गलियारों में
मैं खुद से मिलता हूँ
बिछड़े यारों से मिलता हूँ
चुप्पी में बंधे थे जो शब्द वो केह्ता हूँ
और करके कान बाहर को खिड़की से
वक़्त की सिकुड़ी चादर में
सलवटों में लिपट आये
अंधेरों में सिमट आये
तन्हाई में सुलझ आये
उन काग़ज़ के ढेरों को बुनता हूँ
हाँ, मैं खुद से मिलता हूँ
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बहुत शहर देखे, कई गाँव भटके
किसी की धूल बटोरी, किसी के पत्थर समेटे

October 4, 2008

रुका नहीं हूँ…

 

पथ पर चलता, चलता जाता,
चलते-चलते थक सा जाता,
थक कर फिर कुछ बैठ गया यूँ,
समय को रख कर भूल गया ज्यों..

चला सगर सब मंथर गति से,
मैं ना निकला अपनी रति से,
पूछा किये सब लोग हुआ क्या,
चलता पहिया रोक दिया क्यों

मैं बोला कि थका नहीं हूँ
क्या कहते हो? रुका नहीं हूँ..
राह में कुछ छोड़ चला था
उसकी बाट जोह रहा हूँ…

तन भागा था, मन पीछे-पीछे
छूट गया वो दूर कहीं पर
उसके बिना सब सपने झूठे
माटी के जस बर्तन टूटे

आएगा वो मुझसे मिलने,
मेरे उधड़े दिन-रात को सिलने
टांका लगा कर गाँठ बाधूंगा
फिर हरदम बस साथ चलूँगा

थोड़ा धीमा, थोड़ा रुक-रुक
बोझ से जाऊं शायद थोड़ा झुक भी
पर उसमें भी आनंद मिलेगा
जितना भी हो पूर्ण लगेगा..

October 4, 2008

किस डगर…

जाने किस डगर को चले थे, जाने कौन नगर पहुंचे
जाने किसको ढूंढ़ रहे थे, जाने किसके दर पे ठहरे

अनजानी सी शाम सुहानी, धूमिल-मध्धिम सी कुछ थी
यौवन में कुछ चूर से थे, बचपन सा कुछ ढूंढ रहे थे

पग थमते थे नज़र नहीं पर, बदन यहीं था मन दूर कहीं पर
छाया को चित पकर रहा था, उसको असली रूप समझकर

खुद को छलते और मचलते, ऐसा ही कुछ खेल रहे थे
कुछ कुछ तो हम जीत रहे थे, लेकिन सब कुछ हार चुके थे

तिमिर विकट था, मन असमंजस में, रह पे एक बिन मोड़ खड़े थे
चलना था पर रुके हुए थे, कारण सा कुछ ढूंढ रहे थे

व्यर्थ गया यूँ समय बहुत सा, चलते चलते ऊब चुके थे
मन बोला चल घर चलते हैं, उसका पता पर भूल चुके थे

यौवन में कुछ चूर से थे, बचपन सा कुछ ढूंढ रहे थे…..

October 4, 2008

कुछ अज़ीब…

कुछ अज़ीब से हैं मेरे दिल के अंदाज़,
कि ये साफ़ साफ़ मुझसे कुछ कहता ही नहीं है
कुछ इशारे से करता है, कुछ निशाँ से बनाता है
मैं पूछता हूँ क्या है तो कुछ पहेलियाँ सी बुझाता है
ना जाने ये मुझसे खेलता है या खुद को छलता है
जब देर हो जाती है, तो खुद ही तो ज़ार-ज़ार रोता है
 
कुछ अज़ीब सा है ये इंसान, कुछ समझता ही नहीं है
मैं कहता हूँ यहाँ ठहर जा, यही बसर कर, तो हंस सा पड़ता है,
हताश मैं हाथ उठाता हूँ, तो समझता है मैं इशारा सा करता हूँ
दूर दिखते हैं चिरांगा, तो पूछता है चल चलें किस की तरफ
निराश मैं हाथ घुमाता हूँ तो समझता है निशाँ से बनाता हूँ
फिर थक सा पड़ा मैं, तो रोने लगा ज़ार-ज़ार
समझेगा मेरे दोस्त या भटकेगा युहीं बार-बार…
अरे, मत रो मेरे यार, मैं ले चलता हूँ तुझे कहीं और,
नया होगा मंज़र, निराली होगी वहां की हर बात
बस अफ़सोस रहेगा मुझे की ना समझता हूँ मैं तेरी ज़बान
और हर बार की तरह फिर मज़बूर ये दोहराता हूँ
कुछ अज़ीब से हैं मेरे दिल के अंदाज़,
कि ये साफ़ साफ़ मुझसे कुछ कहता ही नहीं है
कुछ इशारे से करता है, कुछ निशाँ से बनाता है
मैं पूछता हूँ क्या है तो कुछ पहेलियाँ सी बुझाता है…
October 4, 2008

थोड़ा सा…

थोड़ा सा मैं तनहा था, थोड़ा था अकेला
कुछ कुछ सबके जैसा था, और थोड़ा अलबेला..

उड़ता था यूँ ही पग-पग, बदला करता था बस हर पल,
ऐसा मुझको लगता था पर, था मैं बैठा बस जड़ होकर

बदला जाता था सब नभ-अंतर, गायब होते दृश्य ज्यों छू-मंतर,
मुझको कुछ अहसास सा था पर, क्या छूठा आभास ना था

पत्थर जान मुझको सबने, धकेल दिया फिर दूर सड़क पर,
लुढका किया कुछ दूर यूहीं मैं, फिर जागा नवचेतन होकर

आखें खोल जब खड़ा हुआ मैं, दृश्य देख कुछ दहल गया मैं,
ये तो मेरा स्वप्न नहीं था, स्वप्न मेरा फिर सत्य नहीं था…

मैं ही मैं था मेरे स्वप्न मैं, यहाँ थे सब पर स्वयं नहीं था
आखें मीची और दौड़ पड़ा मैं, स्वप्न भुला बस ज्यों जिया मैं

इस गति से मैं कब तक चलता, स्वप्न का आदी कब तक जगता,
खुली आँख से सपना देख रहा हूँ, उसको जीना सीख रहा हूँ..