October 21, 2014

एक चिड़िया मेरे हाथों से कूद गयी

कुछ केहते हैं वो उड़ना सीख गयी

कुछ केहते हैं उसकी टांग टूट गयी
सब कुछ ना कुछ केहते हैं
बस वो चिड़िया कुछ नहीं कहती
जाने क्या मंज़र देखा उसने कूदकर
की सच केह्ता हूँ वो है फुदकना भूल गयी
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जब वक़्त सो जाता है

मन चिड़िया बन उड़ जाता है
तब अक्सर घर के गलियारों में
मैं खुद से मिलता हूँ
बिछड़े यारों से मिलता हूँ
चुप्पी में बंधे थे जो शब्द वो केह्ता हूँ
और करके कान बाहर को खिड़की से
वक़्त की सिकुड़ी चादर में
सलवटों में लिपट आये
अंधेरों में सिमट आये
तन्हाई में सुलझ आये
उन काग़ज़ के ढेरों को बुनता हूँ
हाँ, मैं खुद से मिलता हूँ
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बहुत शहर देखे, कई गाँव भटके
किसी की धूल बटोरी, किसी के पत्थर समेटे

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October 12, 2014

ek mutthi ret daal baithe
main bhi tum bhi
dafn ho chali wo dastaan jismein the
main bhi tum bhi

kal yahi se to uth kar gaye the
mein bhi tum bhi
chhod peechhe un palon ko jinmein the kaid
main bhi tum bhi
pal, jinmein gunahgaar the donon
pal, jinmein talabgaar the donon
uljhan ke shikaar the donon

un yaadon ki zameen pe
dafn armanon ki khaad se
zamindoz ansuon ki nami se
ek paudha ugega wahan
jiski khushbu mein phir se ji uthenge
alhada alhada
main bhi tum bhi

August 22, 2014

ढूंढ रहे थे कल भी, ढूंढ रहे हैं आज भी
खोये हुये थे कल भी, खोये हुये हैं आज भी
हाथ जहाँ भी रखा निशान छूटते गए
ज़ुर्म जहाँ जो हुआ, गुनहगार पाये गए आप ही

बिखरी हुयी शक्सियत, बिखरे हैं हालात भी
जिस्म में पर छेद हैं, हिलते हुये हैं हाथ भी
आदमी हैं, आदमी थे, आदम ही रहना चाहते थे
हुयी मुलाकाते यूँ आदमों से, ये जज़बात भी खो गए

एक खून हुआ था, सदियां हैं पर बीत गयी
कपडों के किनारों पे मिलते हैं छिटें आज भी
सराय में हम आये थे, छुप के रहेंगे चंद दिन
सराय भी खुद टूट ली, पर चढ़ता किराया आज भी

August 9, 2014

Its a dreamy afternoon
there is a little bit of light
and there are lots of shadows
there is a man with me
but he seems like lot much more

i can see myself being awake
but it seems i am in a dream
what is real and what is dream
i dont know for m such a dreamy girl

if it is a dream i dont want to get up
if I am awake I want to go back to sleep
whatever it is i dont want to get out of
this beautiful dreamy afternoon

 

 

August 3, 2014

मंज़िल कोई नहीं पर जाना तो है

दिशा तय नहीं पर चलना तो है
ठौर कोई नहीं पर ठहरना तो है
पहुंचे शायद कहीं नहीं पर भटकना तो है
 
तुम मिले गुफ्तगू हुई अच्छा लगा
यारी हो ना हो पर मुलाक़ात हुई अच्छा लगा
तुमने भी बैठे बैठे एक नुस्खा दे दिया
कारगर हो ना हो, इलाज़ है जानकर अच्छा लगा
 
दमाग़ ने सोचा है की इसको सोचते देते रहना चाहिये
काम का सोचे ना सोचे सोच लेता है सोच कर अच्छा लगा
कल ही तो हम बैठे थे बनिये की दुक़ाँ पर
सामान मुफ्त नहीं देता पर बैठने देता है अच्छा लगा
 

 

 

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नदिया नदिया पीछे छोड़ी
चुल्लू चुल्लू ढूंढ रहे
आ खुले में मूतें केह के निकले
अब पैज़ामे में मूत रहे

August 2, 2014

क्यूं रोता हूँ

क्यूं आंख भिगोता हूँ

सूखी रहती हैं मेरी हर याद पर
खामोश दुबकती हैं मेरी हर एक बात पर
मुंह बनाती हैं मेरी हर सिसकी पे
आंख दिखती हैं छोटा मेहसूस कराती हैं
चुप नहीं करती बस इंतेज़ार करती है
मेरे थमने का रुक जाने का मेरे चुप हो जाने का
जैसे किसी पत्थर पे पड़ी एक पानी की बूंद
धीरे धीरे सरक के जा पहुचती है नीचे जमीन पे
और हो जाती है ज़मीनदोश
पत्थर पे छोड़ एक अस्थायी निशान
शायद पत्थर ही हैं ये
पर फिर ये क्यूं हैं छलक पड़ती
किसी गैर की कहानी पर
 
 
 
August 1, 2014

Am I writing you

or you are shedding me

Am I killing your memory

or you are evacuating me

Am I living in you

or you are dead in me

Am I burying you

or you are gonna keep me alive

you exist because of me

or I do, of you

is there a land

where twain can meet

oh, do not leave me

because you complete me

July 21, 2014

ऐ मुक़ाम
तू जब भी मिले
ये जानना
की आज तुझे होती है खुद से नफरत
होती है घुटन
होता है सफर के पूरा होने का गुमान
होता है ज़िंदगी के खत्म होने का खाली होने का अहसास
पर कभी तुझे इसकी ही जुस्तजू थी

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ना मंज़िलें हैं ना मुक़ाम हैं
ना हसरतें ना आरज़ू
ना सफर ना सफर का गुमान
मुंह में आवाज़ नहीं
सीने में पुकार नहीं
इसको क्या कहते हैं
इसका कोई नाम नहीं

July 7, 2014

चलता नहीं हूँ मैं
रूका भी नहीं हूँ
बस गुजरता हूँ
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कहाँ को चले थे और कहाँ जा रहे हैं

जानी पेहचानी राहों पे फिर अज़नबी मुक़ाम आ रहे हैं

खिलखिला के आवाज़ दी हमको उन फूलों के बगानों ने

कब्र पे जिनकी सजदा हम हर रोज़ करते आ रहे थे

क्या मर्ज़ी है तेरी मौला, है उम्मीद की तुझको होगा मालूम

काशी मिले, कब्र मिले, मक़बरा मिले, जो मिले ठीक है

हम तो ना उम्मीदी में आँखें मीचे यूं ही चलते जा रहे थे
 

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एक तारा टूटा है
मत पूछो किस शाख से निकला है
मत जानो किस आह से उपजा है
बस ये जानो की वो निकला है
वो पिघला है, पिघल के निकला है

June 16, 2014

मेरी मंज़िल क्या थी मेरी जुस्तज़ू क्या थी

अब ये तलक़ याद नहीं मेरी आरज़ू क्या थी
 
कल आया था जो दरवाज़े पे पसरा था बड़ी देर
चेहरा तो याद है कुछ पर रंगत याद नहीं
 

लिखने लायक शब्द नहीं, अल्फाज़ नहीं, कोई बात नहीं
है बात कोई बड़ी नहीं वही पुरानी घिसी पिटी कहानी
सुनी नहीं होगी तुमने शायद पर जी तो होगी तुमने भी
बात वोही जो कहते कहते खो जाती है, शब्दों की नमी उड जाती है,
दिल की गफलत दिमाग की नसौं में गर्मी बनकर उतर जाती है
तुम गलत नहीं, मैं सही नहीं,