Archive for ‘5. हिंदी कविता’

July 7, 2014

चलता नहीं हूँ मैं
रूका भी नहीं हूँ
बस गुजरता हूँ
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कहाँ को चले थे और कहाँ जा रहे हैं

जानी पेहचानी राहों पे फिर अज़नबी मुक़ाम आ रहे हैं

खिलखिला के आवाज़ दी हमको उन फूलों के बगानों ने

कब्र पे जिनकी सजदा हम हर रोज़ करते आ रहे थे

क्या मर्ज़ी है तेरी मौला, है उम्मीद की तुझको होगा मालूम

काशी मिले, कब्र मिले, मक़बरा मिले, जो मिले ठीक है

हम तो ना उम्मीदी में आँखें मीचे यूं ही चलते जा रहे थे
 

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एक तारा टूटा है
मत पूछो किस शाख से निकला है
मत जानो किस आह से उपजा है
बस ये जानो की वो निकला है
वो पिघला है, पिघल के निकला है

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June 16, 2014

मेरी मंज़िल क्या थी मेरी जुस्तज़ू क्या थी

अब ये तलक़ याद नहीं मेरी आरज़ू क्या थी
 
कल आया था जो दरवाज़े पे पसरा था बड़ी देर
चेहरा तो याद है कुछ पर रंगत याद नहीं
 

लिखने लायक शब्द नहीं, अल्फाज़ नहीं, कोई बात नहीं
है बात कोई बड़ी नहीं वही पुरानी घिसी पिटी कहानी
सुनी नहीं होगी तुमने शायद पर जी तो होगी तुमने भी
बात वोही जो कहते कहते खो जाती है, शब्दों की नमी उड जाती है,
दिल की गफलत दिमाग की नसौं में गर्मी बनकर उतर जाती है
तुम गलत नहीं, मैं सही नहीं,

April 30, 2014

जब भी गिरता है द्वार पे कोई पत्ता
मैं तुमको याद करता हूँ
सरक जाती है शाम हाथों से छोड़ तन्हाइयां
मैं तुमको याद करता हूँ

उठता हूँ सोकर तो चटकती हैं बिस्तर की दरारें
नहीं सुनाई देती थी ये पहले
रहती थी गूंजती तुम्हारी रात की आवाज़ कानों में
सरकते रहते थे गुज़रे पल बाहों के आगोश से
और मैं उनमें डूबा तैरता रहता था
अब सब सुनाई देता है
गूंज आने वाले खोखले पलों की
दातों के बीच से लुढ़ककर बाहर आती हंसी

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मैं, अपने हर टुकड़े में कितना खूबसूरत हूँ
उन टुकड़ों के संगम में ही बदसूरत हूँ

ऐसे भी हमें ज़िंदगी है तुझसे कोई प्यार नहीं
पर ऐसा भी हाल मत कर की नफरत हो चले

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हो सकता है की तुम जीत जाओ
पर मैं हार जाऊँ ये मुमकिन नहीं

दोस्ती निपट गयी, जब भी दोस्त से सौदा हुआ
कुछ हाथ हासिल ना हुआ, नुकसान चौतरफा हुआ

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इक चिड़िया इक पंछी इक उड़ान

सब बंद हैं किसी डब्बे में

तोड़ना संभव नहीं जिसकी दीवारों को

हैं बनी वो मुलायम मखमली अहसासों की

हैं जंज़ीरें पैर में सख्त बहुत

हैं ज़र्ज़र हो सकती हैं भंगुर एक झटके में

लेकिन रखना है उनको पास, है ढूंढना उनकी चाभी

तोड़ने पर वक़्त और किस्मत का पहरेदार

लाकर बाँध देगा नयी मोटी ज़ंज़ीरें

हिलाना होगा जिनको मुश्किल

होगा तोड़ना नहीं संभव

छोड़ेंगी जो मोटे घाव गहरे निशान पैरों पे

बदन को ही नहीं जकड सकती हैं वो रूह तक को

सो थामे बैठे रहो इन पिघलती लोहे की सलाखों हो

की जब तक आसमां की आग भरती नहीं उंगलियों के पोरों में

और आकर समां जाती नहीं बिजलियाँ हथेली के मध्य में

और निकलती रस्सियां कलाइयों से

तब तक थाम के बैठो उड़ती जाती शाम को

की चटकने ko hain betaab jiski parchhaiyaan

ki hain shaamil ismein sabhi aasmaan au dharti wale is saazish mein

ki ruko thoda sabr k

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April 6, 2014

कोई अच्छी खबर नहीं
कुछ खास नहीं कुछ काम नहीं
किसी भी कुयें में
तुम्हारा अक्स तुम्हारा अयाम नहीं
हर वृक्ष से लटकते हैं मुर्दे लिपटे चादरो में
बदबू है शीतल छाया नहीं
स्थिर है शाम खड़ी लटकाये भुजायें
लटका हुया गले से मध्य से फटे एक चादर का लिबास
उंगलियों के बीच बुनता एक जाला जैसे हो डायन का
खड़ी घात में शाम बुझने को सूरज का आखिरी चिराग
जब लपकेगी ये मुझको लिपटा लेने अपनी उँगलयों के मध्य के जाले में
और लटका देगी मुर्दों के जंगल में
तुम आओगी जब, ढूंढोगी मुझको
सब चादर के बीच पहचानोगी मुझको
टूट पडूंगा मैं खुद ही जैसे पेड़ से टूटा फल
फाड़के चादर फिर मुझको निकालोगी तुम
लेना मुझको बाहों में मत देना आंसू मुझको छुने तुम
रख देना अपने अधर मेरे अधरों पे गर चाहना छूना मुझको तुम
जी उठूँगा मैं फिर से हो जाऊँगा खड़ा
कैसे निकलेंगे जंगल से सोच ना घबराना तुम
पकड़ तुम्हारा हाथ पेड़ की डाल बनेगी अपनी कटार
काट उसी से जाले सब निकलेंगे उस पर हम
जहां खड़ा होगा झरना और उसके पीछे सूरज
दौड़ेंगे चीते हम पर और झपटेंगी चीलें भी
पर हम जूझेगे सबसे और निकलेंगे जीवित भी

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एक खिड़की खोल खडा हूँ
जीवित बाहर अंदर मृत पड़ा हूँ
एक बेल सरकती है
उपर को उठती है
कर स्पर्श मेरे हाथों का
छाती से लिपटती है
कर अधरों पे सिहरन
दे कुछ कम्पन
सर पे आन टपकती है
एक बेल लटकती है

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जाने किस बात पर itna हंस रहा था वो क़ातिल
कत्ल कर रहा था या खुद कत्ल हो रहा था वो क़ातिल

खुद को लुटा दोगे तो जीने का मज़ा आयेगा
राहों में खो जाओगे तो जहां हो वहां होने का मज़ा आयेगा

ख्वाहिशों के समंदर में तैरता चाहतों का मोती है
जिसने देखा था सपना रात में, दिन में वही आंख रोती है

मेहनत से जी चुराओ, आराम में मन लगाओ
गर्मी का मौसम है, आओ बैठो कच्चे आम खाओ

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Hey road. Don’t end just yet.
I wanna keep bicycling a little while more.
Don’t make me take a turn.
A few more calories left for the day to burn.
Hey Road. Don’t go close on me.
Am gonna keep banging on your door till you acquiesce.
Hey road, don’t be a quitter.
Hey road, do you hear me.
Don’t be so huffy puffy.
Hey road, I have been here many times before. …
but never before have I wanted to go cross you.
Hey road, just open up.
Hey road, just hold on still.
Hey road, just fall upside down.
Hey road, I wanna fall down you.
Hey road, I will catch you somewhere in the fall.
Hey road, take a fall, you shall be safe falling along me.
Hey road, if we meet the ground,
with the jaws crushed and tar broken,
we will keep holding hand.
And when the new road is built,
it shall bear our name.
Hey road, lets fall, lets fall, lets fall

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ये ही हो के रेह गयी है ज़िंदगी अपनी यारों
थोडी ट्रेन में बाकी प्लेटफार्म पे कट रही यारों

February 2, 2014

मायूस इक आसमां से गुजरता सितारा हूँ
रखो पानी का थाल नीचे उसमें ठहर जाऊंगा

जब भी हंसता हूँ शुबहे उभर आते हूँ
रो लेने के बाद ही दिल को सुकून होता है

प्यार खुद से रंजिशें भी खुद से हीं
खुदा भी मैं बंदा भी मैं कायनात मुझ से ही

होती हसरतें पूरी तो बेहसरत सा हो जाता हूँ
ज़िंदगी गुदगुदाती है तो रुआंसा सा हो उठता हूँ

लिये सौ सूरज निगाह में दौड़ता हूँ ले जलते पैर रेत पे
शाम होने पे ढूंढता हूँ गर कोई तारा टिमटिमाता है

तपिश दिन की है पर जलन बाद शाम के होती है
और सोचता हूँ गर सलवटें रात की चुनीं होती

तेरे होने पे क्या होता ये मुझको नहीं मालूम
तेरे ना होने पे हाँ मैं लेकिन रोज़ रोता हूँ

उदासी है सबब इसका है नहीं ठीक से मालूम
मालूम होता तो भी क्या मैं हंस रहा होता

सब कुछ जान जौऊंगा तो करूंगा क्या मैं ए दोस्त
नासमझ ही रहने दो है समझदारी में क्या रखा

आंसू हैं खुद अपना रास्ता खोज ही लेंगे हम तक
हम उनको बुलाते हैं जो खुद कही रुख इधर का नहीं करते

अब मत हँसाओ की हंसने में बड़ी तक़लीफ़ होती है
तज़ुर्बा ये नया है और अब तज़ुर्बे अच्छे नहीं लगते

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मेरे बदले लिबासों पे मत जा ए दोस्त
दिल के हालात अब भी फटीचर से है

हाँ ये टी शर्ट का बटन है अभी हाल में टूटा
ये बेसुध लापरवाही है है सीना नहीं धड़का

देखना है तो उंगलियाँ फिरा मेरे कपड़ों के नीचे
सीने के पास रफू किया इक पैबंद मिलेगा

मत चूम इसको मत उधेड़ अभी ताज़ा है ये ज़ख्म
उंगलियों फिरा के मर्ज़ जानने का हुनर है तो और बात है

सह लूंगा तेरी खातिर दर्द ये और यही मेरा प्यार होगा
दूंगा दर्द जो फिर तुझको उसको समेटना तेरा हिसाब होगा

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आज सितारा टूटा है
सारंगी का तार कोई
वृक्ष के तन से जा लिपटा है
आज सितारा टूटा है

आँखों में अंकित विस्तृत आकाश
आगोश में आज आ सिमटा है
आज अंधेरा चमका है

टूटी टूटी ठहरी ठहरी
पानी की जलधार कोई
में आज इक भाटा उट्ठा है
हाँ कोई सवेरा बैठा है
आज सितारा टूटा है

रेतों की बोरी के नीचे
पैर सिकोड़े सिर को पकड़े
कोई सवेरा लुका बैठा है
हाँ आज अंधेरा चमका है

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खड़ा हूँ
उपर है सुराख आसमानों में
दिखायी कुछ नहीं देता उसमें से
हाथों में सूखता पत्ता
चूर हो जाता उंगलियों की जुम्बिश से
गहराती शाम ठहरी खडी है
टुकड़ों से पनपती एक तस्वीर
मैं लेटा देखता उसको
और शाम ढलती बंद आँखों से
इंतेज़ार में मेरे पहले कदम के

December 5, 2013

रात फिर अनज़ान मंज़िलों ने आकर पूछा
हमारा पता मिल गया?
नहीं? तो फिर खाली कैसे बैठा है?
चल उठ, कुछ काम कर

मैं ना हिला
दबाकर रिमोट उँगलियों के बीच चैनल दबाता रहा
छोटी छोटी उलझनों को दोहरा के उनको बड़ा बनाता रहा
कल कैसे सुलझाऊंगा उनको, उसकी बिना बात स्कीमें बनाता रहा
खैर मैं तो निकम्मा हो ही चला था
खुद से इससे अधिक क्या उम्मीद रखना
पर ये अनजान मंज़िलें,
इनके पास बड़ा काम है
बड़ी हरामी चीज़ हैं ये
जब भी कोई राही
इनके पथ से पथ भटककर कोई और मंज़िल पा ले
कोई सराय, कोई आराम का घर, कोई पानी का तालाब पा ले
कोई नुक्कड़ कि रंगीली चौपड़ में उसका मन लग जाये
या किसी सुनहरी ज़ुल्फ़ वाली के नितम्बों में उसका मन अटक जाये
तब, ऐसे हर एक सुकून से भरे क्षड़ में ये बरबख्त करमजली आ टपकती है
बड़ी मस्ती भरे रुआब से अपनी आमद फरमाती है
कभी दूर से सीटी बजाते हुए,
तो कभी गले में घंटा टांग कर आती है
कभी कभी तो चुप चाप हौले से बिना आहट के, बिना बताये, बिना दरवाज़ा खटखटाये
अंदर आ जाती है और आकर पलंग के पास खड़ी हो जाती है
देख कर अपने दीवाने कि सुकून वाली नींद, मंद मंद मुस्काती है
खुद से कहती है, आदमी बनता सा लगता है, अब साले को कुत्ता बनाती हूँ
मुझसे दोस्ती करना कितनी टेढ़ी खीर है, अब ससुर को समझती हूँ
तुम मुझसे दूर हो भी जाओ, मैं एक बार चपक गयी तो दिन हो या रात
घर हो या बहार, वक़्त बेवकत, मूड बेमूड, चौबीसों घंटा एक ही सवाल पुछवाती हूँ
मिल गया मेरा पता? कहाँ हूँ मैं? खोजो मुझे
धीरे से मेरे बाल सहलाते हुए उसने फ़रमाया
मेरे लाल चल उठ जा, मेरी खोज नहीं करनी
मैंने तकिये को हाथों के बीच जकड कर कहा
सोने दे डार्लिंग तम तो यहीं हो, कहाँ जाऊँ तुझे खोजने
उसने कहा साले, बिना पेंदी के पियाले, उसळदानी में पड़े बिना पिसे मसाले
अब मैं तुझे बताती हूँ, देख कैसा सताती हूँ
तू खोज खोज थक जायेगा, हाथ नहीं आउंगी
खूब उछलेगा कूदेगा, सेंटी मरेगा
गुमसुम हो जायेगा
जैसे गले के भीतर दबा के रखी हो एक आंसू की थैली
ये सब करके मुझे गिल्टी फील कराएगा
पर मैं हाथ न आउंगी
दूर खड़ी रहूंगी, तमाशा देखूंगी
साबुन लगे हाथों के बीच गिरते पानी कि तरह
मैं तुझे छू छू के फिसल जाउंगी

 

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khud se hi baatein karo wohi achchha hai
auron se karoge to wo gair bante jayenge

abhi jaan-pehchaan hai dua salaam ho jaati hai
kabhi fursat ke palon mein baat ho jaati hai
haal mil jaata hai waqt guzar jaata hai
koi baaton ka guchchha zindagi mein thahar jata hai
roz miloge, khayal karoge, sochoge bulaunga to aayenge
pichhli mulaqat ki gudgudi yaad karke ke sochoge, aaj kitna hansayenge
wo aa bhi jayenge bulane par, lekar ek bandhi si hansi
saath chalenge, kuchh kahne ko na hoga, anokhi baat kahoge
kuchh zamane pe hansoge, kuchh khud ko sharminda karoge
wo baaton ka khilkhilata guchchha, gale se lipat jayega
khushboo to na hogi, fande sa ban jayega
sochoge ye kya hua, kahan gayi wo gair-masrufiyat
tab samajh aayega ki baat jo khud mein hai wo kisi mein nahin
wo khoye rahne mein, simte rahne mein,
apni hi kheenchi linon mein uljhe rahne mein
wo beeti baaton ka pari-drishya, wo aane wali tasveerein
wo aaj ke chitra-patal par ukeri aadi tirchhi lakeerein
wo hi to hain, bas wohi to hai, haath laga ke rakhne ko
wo to hai is khamosh zamane mein dil tika ke rakhne ko
unse hi raho qarib, na dur bhatak jaya karo
na jaya karo yun auron se ubharte sheeshai pratibimbon ki aur
aa jao apne ghar ye ghar uljha hua hi sahi
pakad ke rakho iski parchhatti,
eetein iski sarakti huyi hi sahi
ki ban raha hai ye aur saath iske ban rahe hain hum
girega to iske malbe mein na dab ke rahenge ham
niklenge bahar aur chal denge ghumne duniya
laut ke aayenge to baithenge unhin eeton ke dher pe
ho sakta hai le gaye hon log utha kar unko bhi
to khali huyee zameen pe bichha chadar letenge
aur takeinge sitare ko jo ugta hoga thik upar chhat par
wo bhi chala ajayega, peechhe subah ki peeli chadar ke

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हम कुछ भी नहीं करते हैं खुद से
सब कुछ वो करवाता है हमसे
हाथों में दे आंसू का प्याला
फिसलती सी हंसी निकलवाता है हमसे

rone ka hunar bhul aaye hain kahin
‘Nasir’ ko padha to phir khayal aaya

ham mein bhi pale ‘Nasir’ si thandi aag kaise
aanshuon ko panaah deni hogi ye jawaab aaya

kuchh der huyi koi taqleef nahin,
hai thandak kyun nahin phir seene mein
seene ko pakde phira karte the
khol ke maal lutaya to araam aaya

Nasir ko padha to ye ahtaram aaya
Sab kuchh karke bhi kyun nahin araam aaya

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की अक्सा अक्सा रक़ाब उठ रहा है
की अक्सा अक्सा बेनक़ाब हो रहे हैं हम

जाकर बड़े शहर में कौन खुद को खो दे
हम तो छोटे शह्‌र में ही खुश हैं ग़ालिब

ये काला हिस्सा मेरा ही है
हाथों के उपर से सरकता हुआ
कुछ देर थम कर हथेली के पीछे
मूझे अपने होने का अहसास करता हुआ
ये काला हिस्सा मेरा ही है

काली है
ए रात तू बिल्कुल काली है
चमकते थे पहले जुगनू तुझमें
पर अब तू बिल्कुल काली है

October 5, 2013

बरसों किया तेरा इंतज़ार
तुम नहीं आये
अब रुक गया है वक़्त
थक गयी है मंजिल
रूठ गयी है महफ़िल
बैठा हूँ एक मील के पत्थर पे
रख हाथ घुटनों पे
जो हैं घायल उखड़े हुए
ढके कपड़ों से जो दीखते हैं उजड़े हुए
हाँ उनमें हैं वो संगमरमर के पैबंद जड़े हुए
हाँ उनमें उन चुनिन्दा कांच के टुकड़ों की नक्काशी भी है
जिनमें से अक्सर झाँक लेती हैं
मेरी घायल सी आँखें मुझको
जिनमें अक्सर दिख जाती है तेरी ही सूरत मुझको
की जिसके देखे बाद कुछ और दिखाई नहीं देता
तेरी ही हंसी, तेरी ही चुप्पी, तेरी ही गूंज रहती है ज़ेहन में
तुम चली जाती हो पर तेरा एहसास नहीं जाता
आवाज़ थम जाती है लेकिन सन्नाटा नहीं जाता
और भर जाता है माहौल फिर शोर के टुकड़ों से
जो कानों में मेरे भर जाते हैं पर जैसे कुछ भी अन्दर नहीं जाता
जाने क्या हो जाता है मुझको, जाने मैं कौन बन जाता हूँ
आँखें खुली रह जाती हैं पर मैं अन्दर ही अन्दर सो जाता हूँ
सुनने वाला कोई नहीं रहता मैं बोलता चला जाता हूँ
जाने किसको सुनाता हूँ, जाने क्या कह जाता हूँ
पर हाँ, सब के जाने के बाद भी मैं अकेला नहीं रहता
तेरा शोर, तेरा सन्नाटा, तेरी आवाज़, तेरी तड़प, तेरी गूंज
तेरी महफ़िल, तेरी तन्हाई, तेरी हर एक तमाम अदा
टुकड़े तेरे वादों के, तेरे झूठों के पुलिंदे
तेरी मक्कारी, मेरी रुसवाई, तेरा दामन में दिया घाव
वो फटा हुआ अंग वस्त्र मेरा, ये सब, हाँ ये सब
सब रहता है साथ मेरे, कितना कुछ छोड़ जाती हो तुम अपने पीछे
और फिर इस मलबे में जैसे दब के बैठ जाता हूँ मैं
धीरे धीरे लेता श्वास, जो है जीवन का आधार
जो है नश्वर, जो है सीमित हैं जिनमें हम असीमित
उनको पकड़ता हुआ, उर्जा लेता हुआ, तुमसे लड़ता हुआ ख्यालों में
खड़ा हो उठता हूँ यकायक किसी झटके से
पीछे छोड़ता हुआ मलबा, तुम्हें और तुम्हारे बदगुमानी ख्यालों को
धकेलता पीछे तुम्हारे अनछुए, अन्होने, अनुपलब्ध अस्तित्व को
ढूंढता यथार्थ की ज़मीं, पकड़ता पाँव से एक तत्वसार धरातल
होने देता इसकी ठंडी चुभन को अपने अन्दर प्रवाहित
और नकारता तुमको, तुमसे उठती नकारात्मकता को
धकेलता पीछे तुमसे जुड़े हर एक अहसास बिंदु को
जैसे जीने की ललक को बचाता किसी चक्रवात से
आखिर मेरे जीने में ही तो तुम्हारी सम्भावना है
तुमसे मिलने के लिए मुझे तुमको ही खोना होगा
तुमको पाने के लिए मुझे तुमसे विहीन होना होगा
हाँ, तेरे काबिल बनने को मुझे फिर फिर रोना होगा
तुम खड़ी हो शीशे के उस द्वार के पार
जिससे जुड़ी लौह यथार्थ की जाली को हूँ मैं पकड़े खड़ा
जिसके पीछे से तुम मुस्कुराती मुझे बुलाती हो
है ये निशा और तुम इसमें भी मुझे दिवास्वप्न दिखाती हो
ये क्या करती हो, जो पहले से पागल है उसको और पागल बनती हो
मिले हैं जिसके तत्वों में सौ अवगुण, उसमें अपनी दीवानगी का रस भी मिलाती हो
उफ़ ये तो बता दो ऐ सोनपरी आखिर तुम मुझमें ऐसा क्या पाती हो
क्यों मेरी ख़ामोशी में अपना स्पंदन मिलाती हो
क्यूँ हर एक शोर में तुमसे दूर हो जाने का ख्याल ला कर मुझे डराती हो
क्यूँ तुम मिल नहीं जाती, क्यूँ तुम हो नहीं जाती
क्यूँ तुम यूँ बिखरी बिखरी निखरी निखरी
हर पल में कुछ अलग नज़र आती हो
देखो ये तुमने अब है क्या कर डाला
यूँ केश बिखराकर, पैर फैलाकर, आँखें सुजाकर क्यूँ हो बैठी
मेरे यूँ छीटाकशी पर हो क्या छुब्ध प्रिये
क्या है कुछ बतलाओ तो, कह दो क्या ला दूँ बस मान जाओ प्रिये
करो केश श्रृंगार कुछ मादक करो मुस्कराहट से उनपर सजावट
बजने दो ढोल अपनी हंसी के, फैला दो मादकता इस उपवन में
तुम हो मृग मारीच मगर मैं तो हूँ माया राम नहीं
आऊंगा फिर भी तेरे पीछे, मुझे मिलना है तुमसे नहीं ये आखेट प्रिये

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bada thakau kaam hai tumhain likhna
bada jhilau kaam hai tumhein likhna
man bojhil karna padta hai
man se sab kuchh hi kehna padta hai
sahi galat ke paimanon ko
sachche jhuthe armaanon ko
aadhe adhure farmanon ko
bin soche samjhe adaab baja laana padta hai
sach kehta hun tumko kehkar kuch der ko mar jana padta hai

sab so jate hain to tum jag jati ho
sab kaam nipat jate hain to tum bach jati ho
pakar mujhko akela mujhse yun lipat jati ho
jaise ho tum rakt pipasi bel koi
tum ho tum ho koi aatankit nari
tum ho badan ughada sa
mujhse keh raha, lao pehna do mujhko meri sadi
sadi jismein lipat ke main ek aurat ban jaungi
sari jiske alingan se main khud swayam ke qabil ho jaungi
sari jiske konon se main apne mod dikhaungi

kehta humko jaise vish ugla karta hun
gala mera chhil jaata hai, dimag nahin rehta theek kone
sab hil jaata hai, sab pil jaata hai
dharti ambar ka har manzar mujhmein aakar
simte jal sa kisi surahi mein, mil jata hai
fir tum so jate ho, main jagta reh jaata hun
tum pure ho jate ho, main fir akela, adhura ho jata hun
tum chal dete ho, main baitha reh jaata hun
karta tumhara intezaar, paane ko fir se tumhara karchhata pyaar
adhar pipase ho uthte hain, kaaya jalne lagti hai
mjhko to fir jalti agni si, pipal ki chhaya lagne lagti hai
kya kahun nahin keh sakta mat jaya karo
niyati hai tumhari puri ho jaana
hai niyati tumhari mujhko chhod chale jaana
tumko bhi kahan jaana achchha lagta hai
you tukdon tukdon, chhadon mein rehna kahan suhata hai
tum bhi ho mazboor main bhi vivash bandha hua hun
is rachna ki paddhiti ke niyamon, bandhnon mein fansa hua hun
par kar sako agar to kar do itna,
sun sako agar to bas sun lo itna
jaya karo jab bhi jaana hai
par wapas aane mein waqt itna mat lagaya karo
apne is pyaase mitti manav ko itna mat tarsya karo
nahin barish tumse maangta hun, nahin umeed badi koi jodta hun
jaaya karo jab bhi jaana hai, aane ka waqt nahin bataya karo
par jate jate mere sukhe ghade mein
gala geela rakhne ko kuchh bunde chhod ke jaya karo
mat mujhko itna sataya karo

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कहाँ मिलेगी मुझको आग
छोड़ी हाथों से क्यूँ आग
लगी जलाने थी वो हाथ
जलती खाल तो सह भी लेता
थी लगी जलाने चमड़ी वो आग

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August 31, 2013

बाबा जी कहाँ छुपे हो, बाहर आओ पुलिस खड़ी है
छोडो तुम, ये माला कमंडल, बाहर आओ पुलिस खड़ी है
एक हाथ में उनके है इक वारंट, दूजे हाथ में मोटी छड़ी है
बाबा जी अब आ भी जाओ, बेसब्र कबसे पुलिस पड़ी है

मज़ा किया है तुमने बहुत सा, आओ अब परीक्षा की घड़ी है
हाथ जोड़ो, सत्संग कर के दिखाओ, नाचो कूदो पुलिस खड़ी है
बोलो भैया, छोड़ दो मुझको, समझो तुम्हारी बहेन बड़ी हूँ
राखी बांधो, शीश नवाओ, जो बोला था कर के दिखाओ

बाबा जी अब आ भी जाओ, देखो नीचे पुलिस खड़ी है
पब्लिक भी अब आती ही होगी, जूते चप्पल लाती ही होगी
खाया है बहुत प्रसाद तुमने, थोडा अब जुतियाये भी जाओ
जेल का मैदान बड़ा है, वहीँ बैठ अब प्रवचन गाओ

बाबा जी क्या करते हो, हमको इतना मत तरसाओ
बहुत किया है हल्ला तुमने, जो बोला था कर के दिखलाओ
हम तो हैं सब तुम्हरे चेले चपाटे , हमको सच्ची राह दिखाओ
फूलों पर तुम बहुत चले हो, कांटो से इतना मत शरमाओ

बाबा जी, हो तुम गज़ब हरामी, बच जाओगे हमको भी पता है
पैसा ऐंठा न्यूज़ चैनल से भी तुमने, इनकी टीआरपी इतनी मत बढाओ
बोर हो गए देख शक्ल तुम्हारी, अब हमको नयी कोई न्यूज़ दिखाओ
बाबाजी मान भी जाओ, बाहर आओ शकल दिखाओ

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कभी मेरे सर पर बाल थे, आजकल गंजा हूँ मैं
पहले सरपट दौड़ती सड़क था, अब खडंजा हूँ मैं
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क्यूँ मैं तुमको ये बतलाऊं की कौन हूँ मैं
क्यूँ मैं तुमको ये जतलाऊं की देखो देखो कौन हूँ मैं
मज़बूरी में सीधा साधा हूँ, बन सका न ठीक से हरामी
नाम मेरा क्या करोगे जानकर पर हूँ मैं नामी गिरामी
पल भर में बोतल गटकाऊं और पैग में कर दूँ उलटी
बैठूं जहाँ भी उकडू होक वहीँ निकल जाये टट्टी
काम नहीं, कोई नाम नहीं, नहीं वाहियात रद्दी
मंझा गया सब कटी पतंग संग, बची पीछे बस सद्दी
गया खेलने क्रिकेट मैच मैं संग एक टीम फिसड्डी
सेंचुरी मारने ही वाला था की अंपायर को दे दी गाली भद्दी
वाट लगा दी अंपायर ने निकाला मार के पीछे लात
मैं भी साला चुप्प रह गया, डर था पहुंचूं न बेटा हवालात
सुना है मैंने ‘गिरीश दद्दा’ जी से उधर हैं तूड़ते बहुत
दद्दा जी तो अब तक टेढ़े हैं, हैं दो तीन हड्डियों रहित
वापस आया, चुप चाप बैठा, पैग लगाया सो गया
सुबह उठा, सूअरों को लंच कराया, अपना पाप पुण्य हो गया
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लिख दिया मेरा मुक़द्दर उसने प्याज के पानी से
कागज़ में आग लगाता हूँ तब स्याही उभर के आती है।

June 10, 2013

दर्द भी न रहा प्यार भी न रहा
चैन भी न रहा करार भी न रहा
दौड़ती थी दिलो में धड़कन मंद हो गयी
गूंजती थी ज़हन में आवाज़ वो सो गयी
हम हैं नहीं है कौन जाने ध्यान कुछ न रहा
कल ही कहा था जाने क्या याद कुछ न रहा

खोल दौड़ जायें जिसे वो द्वार भी न रहा
बैठें जहाँ मंज़र लगे वो अहसास भी न रहा
आगे नहीं कुछ न सही पीछे पलट के भी क्या करें
छोड़ा था जिसको जिस मोड़ पे वो उस मोड़ पे ही न रहा
पलटे तो पाया कुछ नहीं, कुछ था ही नहीं जो छूटता
छोड़ा था खुद को जिस मोड़ पे वो मोड़ भी न रहा
आगे सड़क है, बिछोना है बिस्तर है रात है बात है
चलने में बस रफ़्तार है अंदाज़ अब न रहा
जितने कदम आगे चलें लगता है पीछे आ गए
जो भी मिले सब आम है ख़ास कुछ न रहा
बुत मिले काफिर मिले थी सबकी शक्लें एक सी
बातें बहुत देर की पर फिर भी लगा मिला नहीं
खोये थे हम जागे जब आवाज़ संतरी ने लगाईं
जाग के भी करते क्या देर तो हो गयी
एक अफसाना है मंजिल है है गीत कई गुनगुनाने को
कहती थी चलो कुछ कहते हैं वो ललक ही खो गयी
जाने किसकी मौत हुयी हम तो अभी जिंदा है
सोच कर भी जाना नहीं आखिर बात फिर क्या हुयी
खेत है पौधे हैं पानी भी है भरा हुआ
फसल ही नहीं हुयी बरसात तो खूब हुयी

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अपने अन्दर का लौंडा जगा कर रखो
एक कोना दिल का संजीदगी से बचा कर रखो
दुनिया वालों के पास नहीं है इलाज़ कोई
दर्द-ए-दिल को हकीमों से छुपा कर रखो
आज मिला है वक़्त आज ही काम निपटा लो
अपने इरादों को वक़्त की आंधी से बचा कर रखो
जब भी चलेंगे ये खुद को ही करेंगे घायल
अपने हथयारों में जंग लगा कर रखो
जल्दी क्या है, आज नहीं तो कल मिट जायेगा नाम-ओ-निशाँ
बुझने की जल्दी में भभकते दिए को ये बात बता कर रखो
न पूछ कर आता है वक़्त न बता कर जाता है
आये तो खड़े हो सको, हौसला इतना बचा कर रखो

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सिर्फ जहाज ही नहीं खो जाते
कुछ समुंदर भी गुमशुदा होते हैं
हर रोज़ लेटे हुए उबती उंघती आँखों से
उबकाइयों , उबासियों, झपकियों के बीच से
देखते हैं गुज़रते, रोज़ रंगत बदलते चाँद को

जिन्हें रहती है तलाश
होती है जरुरत, होता है इंतज़ार
किसी भटके हुए जहाज का
किसी खोजी दस्ते का
किसी मचलते हुए कारवाँ का
किसी खोये हुए मुकाम का
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ऐ दुनिया,
तेरे हाथों की मिटटी हूँ
तेरे पैरों के निशाँ हूँ
तेरी हथेली की धूल हूँ
तेरे पतलून की जुराब हूँ
खड़े होते हैं लोग अक्सर जिस मस्जिद पे
उसकी उखड्ती हुयी मेहराब हूँ
जो थी कभी खड़ी सीधी
देता था बांग जिस पर से मौलवी सुबह को
और रातों को उगलती थी ये काला गहरा धुआं
अब है सिर्फ कालिख बची आग तो बुझ गयी
सीढियां ढेर हुयीं, सामान खो गया
इकट्ठे होते थे जहाँ लोग वो दालान
अब तो बस मिटटी और गारे का एक मलबा हो गया
जागता ही रहता था जो जुगनू भी अब तो सो गया
पीठ पर पड़ते थे जो हाथ अब गोया तमाचा हो गया
आया था सादिक घूमने और था बड़ा अचंभित सा
चंद रात ही बहार रहा और इतना तमाशा हो गया?

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एक लकीर बना के मिटा सकूँ तो कोई बात बने
एक तस्वीर बना के लटका सकूँ तो कोई बात बने
घर के अंदर से तो देखा है बहुत देर तलक सूरज को
एक ज़रा हाथ लगा सकूँ तो कोई बात बने

एक ज़ख़्मी सी चादर हूँ ओढ़ के लेटा हुआ
छेदों से झांकता हुआ दबी सी सांस लेता हुआ
एक ज़रा करवट दिला सकूँ तो कोई बात कहूँ
मुर्दे में अहसास ज़गा सकूँ तो कोई बात कहूँ

हैं शीशे कई कमरे में रखा है करके बंद जिसमें
है आदमकद कोई, बौना, है दिवार पर जड़ा हुआ
देखूं शक्ल जिसमें है कोई नहीं, है हर एक ही चिटका हुआ
किसी को तोड़ के आइना बना सकूँ तो कोई बात कहूँ
मुर्दे में अहसास ज़गा सकूँ तो कोई बात कहूँ

मत कहो मुझसे कुछ कहने को की मैं कुछ कह ही बैठूँगा
फिर कहोगे ये क्या कहते हो कुछ और कहो ये नहीं कहना था
ये ही कहना था तो बेहतर से तुम्हें चुप ही रहना था
खामोशियों को मैं आवाज़ बना सकूँ तो कोई बात बने
बाँध घुंघरू उन्हें सरे बाज़ार नचा सकूँ तो कोई बात बने

June 3, 2013

wahan dur gagan mein jo tu dekhta hai
uski kali parchhaiyon mein jo tu dhundhta hai
wo tara wahan par hai hi nahin
ae pagle tu kyun nahin ye sach dekhta hai

neeche ke gagan mein jhaank jara
dharti ki tah mein dekh jara
dekh wahan kya rahta hai
wo jo tujhko hi dhundhta hai

us ajgar se tu lipat jara
munh khol uske daant gin to le
kab se jabron mein hain fansi ek baat
nikal use tu ro to le

hai raat bahut lambi maana
hai timir ghira sab jag suna
suraj se hi ye sab jayega
par suraj kab tere liye hi aayega

aayega jab wo aana hai
uski niyati nahin tere sang hai
chanda bhi nikalega apni gati se
tu chaddar to ek taan jara

aa neeche jara baith shwaas to le
dharti ki tu thori thaah to le
un pushpon se mil jo jane kab se
apni khusbu wali baahein khole hain khade

tu dekh jara neeche ko dekh
jungle hai, mad hai, andhapan hai
tu latka hai kabse pakde jhula aasmani
ye bhi to bas tera pagalpan hai

tu aankhon wala andha hai
chal sakta hai par tu langda hai
hai chaal teri matwali maana
par tu bas ghas charta ek arbi ghoda hai

chal been utha koi saanp pakad
kuchh tikdam kar, uspar yun akad
kuchh jhuti muthi baatein hi kar
chhor paijama naada ab pakad

aaja aaja ab khelnge
mitti ke kulhad mein chai bhi pi lenge
pyala mad ka ham bhar lenge
usse geeli apni bushat bhi kar lenge

tar hoja hai baarish aane wali
soch ke rakh kuchh matwali gaali
jhumenge ham us free ke shower mein
sab mail badan ke dho lenge

kar de man ghar ko tu ab khali
man par nahin koi bojh tu rakh
ho tapakta sawera ya ho sukhi raat
tu chaal apni bas matwali rakh