Archive for ‘5. हिंदी कविता’

March 9, 2017

मैं आया हूँ.
देखो चौराहे पे धुप उगती है.
गीदड़ भी आज भौंकते हैं
साज़िशें बोलती हैं
तरकीबों की दुकान खुली है
सड़कों पे फैला है लाल लहू
सिद्ध कैसे करोगे आदमी का है
आदमी है फोटू में कैद
कुत्तों का आदमकद पुतला खड़ा है
घास खेतों की जल चुकी है
रावण का पुतला घर को चल पड़ा है
की पट मंदिरों के आप खुल पड़े हैं
रावण बैठा है मध्य में
शिव है बाहर करता चौकीदारी
और वो मंदिर का घंटा बजता ही जा रहा है
की आज चमारों की बस्तियों में उफान आया है
उठो की देखो आज फिर दरिया में तूफान आया है
हैं मछलियां व्याकुल, सड़क पे दौड़ती हैं
पानी जल पड़ा है, मरघट चल पड़ा है
कटे नरमुंडों को ठोकर मारते
शोर मचाते, हाथ लहराते
ये किसके धड़ हैं सडकों पे
हैं किसके पैर जिनका कोई ठिकाना नहीं है
पीपल के पेड़ के नीचे जो छोड़ आये थे
वो मटका देखना किसके दरवाज़े सजा है
छाती छू के देखना इसपे पैबंद किसका है


 

May 4, 2016

श्याम वर्ण आसमां
स्याह रंग रास्ते
काठ के पैर
पतले तल्ले के जूते
जमीन दागी करते हुये
चलते हुए जैसे साइकल का पहिया
गोल गोल, गोल गोल, गोल गोल

उँगलियों के नट बोल्ट खोल
टेबल पर रखे
अंदर थीं मांस की लचीली हो चली डंडियाँ
सफ़ेद हो चलीं, सुन्न हो चुकी
चटकाना अभी मुमकिन न था

बाहर, बल्ब की धूप में
घूम रहे थे बेचैन साये
पैर जाना चाह रहे अलग अलग
पर संग बंधे सायकल की चेन से
पतीले की चाय उबाल ले चुकी थी
और दिन भर में मर चुकी परत
आहिस्ता आहिस्ता उतर रही थी

क्यूंकि आदमी किसी एक दिन नहीं मरता
आदमी हर एक दिन मरता है


 

वक़्त
गोल, चौकोर या अण्डाकार
या एक सपाट जमीन
जिस पर चलने का अहसास है
होने का नहीं

खिड़की से झरती रौशनी
रूम की दीवारों को करती सुसज्जित
स्पष्ट नज़र आती उनपर टंगी तस्वीरें
पर वो फिर भी ढका रह गया
जो लेटा है उसी झरोखे के नीचे
दीवार से लग के, दीवार में घुस के


 

जो आज वैलुएबल लगता है
कल माटी हो जायेगा
जीवन का चिल्लर है समय
सूद समेत खो जायेगा
नोट जनम का कोई खोज न पाया
ग्यानी ध्यानी या पागल पीछे माया
जाली की कोई पहचान नहीं
जो चल जाये वही असली है

बिन बारिश सब गीला है
लगे कसा पर ढीला है
दौड़ो देखो बैठ न जाना
रहो खड़े कहीं लेट न जाना
सर पर हाथ लगा के रखना
पैरों में उबटन मलते रहना
वक़्त तुम्हारा आएगा
जाली भी चल जायेगा
थूकोगे, अमृत कहलाएगा
समझो बैंक बन गए हो
मार्किट में तुम भी चल गए हो
कर्रेंसी अपनी बचा के रखना
सबको इन्फ्लैटेड वैल्यू बताते रहना
थोड़ा गोल्ड बनाते रहना
बैंक एक दिन रुक जायेगा
बन कपूर वक़्त उड़ जायेगा
असली भी नकली कहलायेगा
कुछ चिल्लर बचा के रखना
नोट यहाँ वहां दबा के रखना
खेल जुआं मन बहलाते रहना
आशिकों की बरात में बैंड बजाना
पत्थर की फिर पतंग उड़ाना
पानी की नाव चलाते रहना
जिन अर्थों का कोई अर्थ नहीं है
उनका अर्थ बनाते रहना
जाने कब क्या चल जायेगा
कब क्या वैल्युएबल हो जायेगा
वक़्त का क्या है, है बड़ा जुआरी
बन चौसर फिर बिछ जायेगा

 

March 21, 2016

 

ख़ुशी की राह में जो ग़म आये
वो बदनुमा दाग़ ही शायर बनाये
खोजा क्या था मिला क्या इसकी छोड़ो
बुझ गयी आग पर धुंआ जिंदगी से ना जाये
ढूंढ पाना मुश्किल, खो जाना भी न मुमकिन
किस तरफ जाये यही सोच शायरी बन जाये

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खो गयी है आग
ठंडी हो चली जो राख़
जेब में रखता हूँ

मध्य में रात्रि के
जैकेट की जेब स्पर्श कर
राख का उभार महसूस कर
खोयी आग टटोलता हूँ

परदे के पार होगी
सागर के पार होगी
किसी के पास होगी

शामों में उसको देखा
धुँधलों में उसको ढूंढा
हवाओं से उसको पूछा

पानी के भीतर उतरा
राख मुट्ठी की छोड़ दी
जहाँ आग हो नहीं सकती
वहां वो खोएगी भी अब कैसे

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चलो आज दिल्लगी करता हूँ
खुद से ही कुछ अनकही कहता हूँ
पत्थर जो किसी ने फ़ेंक कर मारे
उनकी याद में समेट लिया करता हूँ
हो आता है जब भी उन पर रंज
चौसर सजा पत्थरों से जीत लिया करता हूँ
पत्थर हैं खुद कभी चोट नहीं करते
ज्यादा याद आती है तो उछाल दिया करता हूँ

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रात नहीं है दिन भी नहीं है
बंधू कहो ये वक़्त कौन सा है?
दरवाज़े के बाहर आसमान है
क्षितिज वही है, दृश्य नया है
बंधू कहो ये शहर कौन सा है?
मिट्टी है, बंजर रेती है

 

 

 

March 10, 2015

Gaanv mein main reh nahin paaya
shehar mein ghar bana nahin paya
ye mein kahan aa gaya hun
har raasta wapis isi chaurahe pe khulta paya

ye shahar hai to jungle kaisa hoga
ye hai majlis to tanhai kaisi hogi
jute kharidne ko ghar se nikla tha
kuchh der ret mein nange par chala to sukoon paya

jameen pe pair kabhi tikte nahin
aasmaan wale par bhi milte nahin
khwahish thi ho ghar mein samundar
chand bulbule hi haath apne kar paaya

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खो गया कहीं सब वो रब-ओ-रुआब
खुद का चेहरा भी मिलता नहीं अब आईने में

चांदी के जो वरक़ थे सारे उतर गये
कागज़ी पुलिंदे हैं, जी चाहे खेल लो

तन्हाई थी, तन्हा थे और खूबसूरती थी
इत्र कैद हुआ शीशी में, मुर्झाये फूल हैं, जो चाहे मोल लो

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Opinions have deserted me

thoughts have been lost
whatever has remained behind
I have never known as me

I do not feel weakened
nor do I feel liberated
but I no more know
this sense inside me

February 25, 2015

कारवाँ कहाँ, मंज़िल कहाँ, सुकून कहाँ
कोई चीख रहा है ले के नाम, पर दीखता नहीं

पीछे गुबार है, आगे भी गर्द है
ये जो है मचल रहा, है धड़कन या दर्द है

दिया था पता वक़्त चलते, मुसाफिरखाने का किसी ने
याद हो किसी को तो बता दो की खुद कुछ सूझता नहीं

ये तो ठीक मालूम है की हम कौन हैं,
हाँ ये पता नहीं की हम हैं भी की नहीं।

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On the fateful night
the writer found the pen
hurled it on the paper
and dug lines over it
as his own fate crumbled
around its cracking folds

October 12, 2014

ek mutthi ret daal baithe
main bhi tum bhi
dafn ho chali wo dastaan jismein the
main bhi tum bhi

kal yahi se to uth kar gaye the
mein bhi tum bhi
chhod peechhe un palon ko jinmein the kaid
main bhi tum bhi
pal, jinmein gunahgaar the donon
pal, jinmein talabgaar the donon
uljhan ke shikaar the donon

un yaadon ki zameen pe
dafn armanon ki khaad se
zamindoz ansuon ki nami se
ek paudha ugega wahan
jiski khushbu mein phir se ji uthenge
alhada alhada
main bhi tum bhi

August 22, 2014

ढूंढ रहे थे कल भी, ढूंढ रहे हैं आज भी
खोये हुये थे कल भी, खोये हुये हैं आज भी
हाथ जहाँ भी रखा निशान छूटते गए
ज़ुर्म जहाँ जो हुआ, गुनहगार पाये गए आप ही

बिखरी हुयी शक्सियत, बिखरे हैं हालात भी
जिस्म में पर छेद हैं, हिलते हुये हैं हाथ भी
आदमी हैं, आदमी थे, आदम ही रहना चाहते थे
हुयी मुलाकाते यूँ आदमों से, ये जज़बात भी खो गए

एक खून हुआ था, सदियां हैं पर बीत गयी
कपडों के किनारों पे मिलते हैं छिटें आज भी
सराय में हम आये थे, छुप के रहेंगे चंद दिन
सराय भी खुद टूट ली, पर चढ़ता किराया आज भी

August 3, 2014

मंज़िल कोई नहीं पर जाना तो है

दिशा तय नहीं पर चलना तो है
ठौर कोई नहीं पर ठहरना तो है
पहुंचे शायद कहीं नहीं पर भटकना तो है
 
तुम मिले गुफ्तगू हुई अच्छा लगा
यारी हो ना हो पर मुलाक़ात हुई अच्छा लगा
तुमने भी बैठे बैठे एक नुस्खा दे दिया
कारगर हो ना हो, इलाज़ है जानकर अच्छा लगा
 
दमाग़ ने सोचा है की इसको सोचते देते रहना चाहिये
काम का सोचे ना सोचे सोच लेता है सोच कर अच्छा लगा
कल ही तो हम बैठे थे बनिये की दुक़ाँ पर
सामान मुफ्त नहीं देता पर बैठने देता है अच्छा लगा
 

 

 

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नदिया नदिया पीछे छोड़ी
चुल्लू चुल्लू ढूंढ रहे
आ खुले में मूतें केह के निकले
अब पैज़ामे में मूत रहे

August 2, 2014

क्यूं रोता हूँ

क्यूं आंख भिगोता हूँ

सूखी रहती हैं मेरी हर याद पर
खामोश दुबकती हैं मेरी हर एक बात पर
मुंह बनाती हैं मेरी हर सिसकी पे
आंख दिखती हैं छोटा मेहसूस कराती हैं
चुप नहीं करती बस इंतेज़ार करती है
मेरे थमने का रुक जाने का मेरे चुप हो जाने का
जैसे किसी पत्थर पे पड़ी एक पानी की बूंद
धीरे धीरे सरक के जा पहुचती है नीचे जमीन पे
और हो जाती है ज़मीनदोश
पत्थर पे छोड़ एक अस्थायी निशान
शायद पत्थर ही हैं ये
पर फिर ये क्यूं हैं छलक पड़ती
किसी गैर की कहानी पर
 
 
 
July 21, 2014

ऐ मुक़ाम
तू जब भी मिले
ये जानना
की आज तुझे होती है खुद से नफरत
होती है घुटन
होता है सफर के पूरा होने का गुमान
होता है ज़िंदगी के खत्म होने का खाली होने का अहसास
पर कभी तुझे इसकी ही जुस्तजू थी

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ना मंज़िलें हैं ना मुक़ाम हैं
ना हसरतें ना आरज़ू
ना सफर ना सफर का गुमान
मुंह में आवाज़ नहीं
सीने में पुकार नहीं
इसको क्या कहते हैं
इसका कोई नाम नहीं