ख़ुशी की राह में जो ग़म आये
वो बदनुमा दाग़ ही शायर बनाये
खोजा क्या था मिला क्या इसकी छोड़ो
बुझ गयी आग पर धुंआ जिंदगी से ना जाये
ढूंढ पाना मुश्किल, खो जाना भी न मुमकिन
किस तरफ जाये यही सोच शायरी बन जाये

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खो गयी है आग
ठंडी हो चली जो राख़
जेब में रखता हूँ

मध्य में रात्रि के
जैकेट की जेब स्पर्श कर
राख का उभार महसूस कर
खोयी आग टटोलता हूँ

परदे के पार होगी
सागर के पार होगी
किसी के पास होगी

शामों में उसको देखा
धुँधलों में उसको ढूंढा
हवाओं से उसको पूछा

पानी के भीतर उतरा
राख मुट्ठी की छोड़ दी
जहाँ आग हो नहीं सकती
वहां वो खोएगी भी अब कैसे

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चलो आज दिल्लगी करता हूँ
खुद से ही कुछ अनकही कहता हूँ
पत्थर जो किसी ने फ़ेंक कर मारे
उनकी याद में समेट लिया करता हूँ
हो आता है जब भी उन पर रंज
चौसर सजा पत्थरों से जीत लिया करता हूँ
पत्थर हैं खुद कभी चोट नहीं करते
ज्यादा याद आती है तो उछाल दिया करता हूँ

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रात नहीं है दिन भी नहीं है
बंधू कहो ये वक़्त कौन सा है?
दरवाज़े के बाहर आसमान है
क्षितिज वही है, दृश्य नया है
बंधू कहो ये शहर कौन सा है?
मिट्टी है, बंजर रेती है

 

 

 

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