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October 21, 2014

एक चिड़िया मेरे हाथों से कूद गयी

कुछ केहते हैं वो उड़ना सीख गयी

कुछ केहते हैं उसकी टांग टूट गयी
सब कुछ ना कुछ केहते हैं
बस वो चिड़िया कुछ नहीं कहती
जाने क्या मंज़र देखा उसने कूदकर
की सच केह्ता हूँ वो है फुदकना भूल गयी
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जब वक़्त सो जाता है

मन चिड़िया बन उड़ जाता है
तब अक्सर घर के गलियारों में
मैं खुद से मिलता हूँ
बिछड़े यारों से मिलता हूँ
चुप्पी में बंधे थे जो शब्द वो केह्ता हूँ
और करके कान बाहर को खिड़की से
वक़्त की सिकुड़ी चादर में
सलवटों में लिपट आये
अंधेरों में सिमट आये
तन्हाई में सुलझ आये
उन काग़ज़ के ढेरों को बुनता हूँ
हाँ, मैं खुद से मिलता हूँ
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बहुत शहर देखे, कई गाँव भटके
किसी की धूल बटोरी, किसी के पत्थर समेटे

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