Archive for August 3rd, 2014

August 3, 2014

मंज़िल कोई नहीं पर जाना तो है

दिशा तय नहीं पर चलना तो है
ठौर कोई नहीं पर ठहरना तो है
पहुंचे शायद कहीं नहीं पर भटकना तो है
 
तुम मिले गुफ्तगू हुई अच्छा लगा
यारी हो ना हो पर मुलाक़ात हुई अच्छा लगा
तुमने भी बैठे बैठे एक नुस्खा दे दिया
कारगर हो ना हो, इलाज़ है जानकर अच्छा लगा
 
दमाग़ ने सोचा है की इसको सोचते देते रहना चाहिये
काम का सोचे ना सोचे सोच लेता है सोच कर अच्छा लगा
कल ही तो हम बैठे थे बनिये की दुक़ाँ पर
सामान मुफ्त नहीं देता पर बैठने देता है अच्छा लगा
 

 

 

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नदिया नदिया पीछे छोड़ी
चुल्लू चुल्लू ढूंढ रहे
आ खुले में मूतें केह के निकले
अब पैज़ामे में मूत रहे

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