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July 21, 2014

ऐ मुक़ाम
तू जब भी मिले
ये जानना
की आज तुझे होती है खुद से नफरत
होती है घुटन
होता है सफर के पूरा होने का गुमान
होता है ज़िंदगी के खत्म होने का खाली होने का अहसास
पर कभी तुझे इसकी ही जुस्तजू थी

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ना मंज़िलें हैं ना मुक़ाम हैं
ना हसरतें ना आरज़ू
ना सफर ना सफर का गुमान
मुंह में आवाज़ नहीं
सीने में पुकार नहीं
इसको क्या कहते हैं
इसका कोई नाम नहीं

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