Archive for July 7th, 2014

July 7, 2014

चलता नहीं हूँ मैं
रूका भी नहीं हूँ
बस गुजरता हूँ
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कहाँ को चले थे और कहाँ जा रहे हैं

जानी पेहचानी राहों पे फिर अज़नबी मुक़ाम आ रहे हैं

खिलखिला के आवाज़ दी हमको उन फूलों के बगानों ने

कब्र पे जिनकी सजदा हम हर रोज़ करते आ रहे थे

क्या मर्ज़ी है तेरी मौला, है उम्मीद की तुझको होगा मालूम

काशी मिले, कब्र मिले, मक़बरा मिले, जो मिले ठीक है

हम तो ना उम्मीदी में आँखें मीचे यूं ही चलते जा रहे थे
 

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एक तारा टूटा है
मत पूछो किस शाख से निकला है
मत जानो किस आह से उपजा है
बस ये जानो की वो निकला है
वो पिघला है, पिघल के निकला है

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