जब भी गिरता है द्वार पे कोई पत्ता
मैं तुमको याद करता हूँ
सरक जाती है शाम हाथों से छोड़ तन्हाइयां
मैं तुमको याद करता हूँ

उठता हूँ सोकर तो चटकती हैं बिस्तर की दरारें
नहीं सुनाई देती थी ये पहले
रहती थी गूंजती तुम्हारी रात की आवाज़ कानों में
सरकते रहते थे गुज़रे पल बाहों के आगोश से
और मैं उनमें डूबा तैरता रहता था
अब सब सुनाई देता है
गूंज आने वाले खोखले पलों की
दातों के बीच से लुढ़ककर बाहर आती हंसी

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मैं, अपने हर टुकड़े में कितना खूबसूरत हूँ
उन टुकड़ों के संगम में ही बदसूरत हूँ

ऐसे भी हमें ज़िंदगी है तुझसे कोई प्यार नहीं
पर ऐसा भी हाल मत कर की नफरत हो चले

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हो सकता है की तुम जीत जाओ
पर मैं हार जाऊँ ये मुमकिन नहीं

दोस्ती निपट गयी, जब भी दोस्त से सौदा हुआ
कुछ हाथ हासिल ना हुआ, नुकसान चौतरफा हुआ

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इक चिड़िया इक पंछी इक उड़ान

सब बंद हैं किसी डब्बे में

तोड़ना संभव नहीं जिसकी दीवारों को

हैं बनी वो मुलायम मखमली अहसासों की

हैं जंज़ीरें पैर में सख्त बहुत

हैं ज़र्ज़र हो सकती हैं भंगुर एक झटके में

लेकिन रखना है उनको पास, है ढूंढना उनकी चाभी

तोड़ने पर वक़्त और किस्मत का पहरेदार

लाकर बाँध देगा नयी मोटी ज़ंज़ीरें

हिलाना होगा जिनको मुश्किल

होगा तोड़ना नहीं संभव

छोड़ेंगी जो मोटे घाव गहरे निशान पैरों पे

बदन को ही नहीं जकड सकती हैं वो रूह तक को

सो थामे बैठे रहो इन पिघलती लोहे की सलाखों हो

की जब तक आसमां की आग भरती नहीं उंगलियों के पोरों में

और आकर समां जाती नहीं बिजलियाँ हथेली के मध्य में

और निकलती रस्सियां कलाइयों से

तब तक थाम के बैठो उड़ती जाती शाम को

की चटकने ko hain betaab jiski parchhaiyaan

ki hain shaamil ismein sabhi aasmaan au dharti wale is saazish mein

ki ruko thoda sabr k

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