आसमान से उखड़ कर गिरा वो
जैसे दीवार से उखड़ा हो पुराना पेंट
पीछे छोड़ आया एक सुराख़ आसमान में
गिर नीचे रेतीली मिटटी में लौंदे सा
पलट कर देखता आसमान में हुए सुराख़ को
जो धीरे धीरे भर चला था
उसके कोनों पे उभर आये थे नुकीले किनारे
जिनसे लटकती एक पिघले हुए लोहे की बूंद
गिर पड़ी थी फिसलकर उसके ऊपर
कई रात वो लेटा हुआ सिसकता रहा
उसके ऊपर गिरी लोहे की बूंद सूख कर कड़ी हो चली थी
दिन के शोर में लोगों के पैरों के नीचे दबता हुआ, कुढ़ता हुआ
वो लौंडा टेढ़ा मेधा हो चला था
उस लोहे की सूखी पपड़ी ने उसे बचाया था
टूट कर मिटटी हो जाने से
लेकिन रात को उसके कानों को रौंदती थी
लुहार के हथोड़े की आवाज़ जो चलती थी आसमान के कोनों पर
सीधा करने को पीछे छूटे तेज़ किनारे
मोड़ कर सूख चले लोहे को नया आकार देने को
और चाँद दिनों में उसने दे दिया था उसे एक नया रूप गुलदस्ते का
जिनसे लटकते थे फूल नीचे को मुरझाकर हर रात जो गिर जाते थे उस लौंदे पर
सुबह को देखकर उसके किनारे पे फूलों का जमावड़ा
एक चौकी लगा दी, एक पंडित रख दिया
उस अंदर अंदर सुबकते लौंदे को अपनी आस्था दे
उन्होंने मंदिर बना दिया
उसके ऊपर चढ़ी लोहे की परत पे होने लगा तिलक
पानी चढ़ने लगा
पानी, जो रिस कर पहुँच जाता था लौंदे तक
जिससे वो पिघल कर मिलने लगता था नीचे की मिट्टी से
मिटटी जिससे उसे मिलना न था, मिटटी जो उसे बनना न था

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वो कहते हैं की मैं बदल गया हूँ
हाँ, मैं हार मानना सीख गया हूँ

रुला के मुझे ख़ुशी मिली तुझे तो अच्छी बात है
कि हंसा के मुझे बहुत लोग रोये हैं।

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एक कबाड़े में से खजाना ढूंढने निकला हूँ
मुझे तो कुछ समझ नहीं आता,
तुम्हें बताओ की मैं किन राहों पे निकला हूँ
बहुत से बुत दीखते हैं मुझे इनपे हिलते हुए
फिर भी ये क्यूँ लगता है की अकेला निकला हूँ
मेरे पहले भी हजारों आये होंगे इनपे
मेरे पीछे भी लोग चल रहे होंगे
मगर हर शख्स कह रहा है की मैं पहला निकला हूँ
किसी के हाथ में है बक्सा स्टील का, कोई है संदूकची दबाये हुए
घबराहट होने लगती है जब देखता हूँ की एक मैं ही हूँ
जो हाथ में लेकर एक खाली थैला निकला हूँ
मंजिल की फिकर नहीं, हाँ रस्ते की कुछ थकन है
रह रह के रुकना पड़ता है, लेके जेबों में कुछ ऐसा बवेला निकला हूँ
झोपड़ियों में किनारे कुछ लोग बैठे हैं मोमबत्तियां जलाकर
मुझे बुलाकर, खाना खिलाकर कहते हैं की मैं एक मकसद-ए-अलबेला निकला हूँ
मेरे हाथों के मिटटी के ढेलों को यूँ देखते हैं जैसे किये हों वो किसी जिन्नात से हासिल
और खोल के अपनी अलमारी दिखाते हैं अपने सीने में की ज़ब्त एक पहेली
दबा के हाथ मेरा हौले से, आँखों की नमी पाकर, कुछ बुदबुदाते हैं
वो जिसको ढूंढा करते हैं खुली आँखों से, राज़ वो मुझको दिखाते हैं
और फिर शाम ढले मुझे देके विदा, बंद हो जाते हैं किवाड़ों के पीछे
और बीच बुतों के मैं खड़ा रह जाता हूँ ये सोचता
कि साथ लिए इन पहेलियों को शायद मैं खुद एक पहेला निकला हूँ
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ऐ तकदीर यूँ मुझसे रंज न कर,
थोड़ा तो बराबर इन्साफ तू कर
लग जा गले तू पल दो पल या फिर कह दे
मैं हूँ ही नहीं तेरी मोहब्बत के काबिल
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नहीं कोई तरावट सीने में
है आँखों से भी नींद उड़ी
तकदीर मेरी आ लग जा गले
या मैं हूँ ही नहीं तेरे काबिल?
मुडेर छोड़ मैं जब भी उड़ा
कोई राह नहीं पूरी सिमटी
हैं टुकड़े टुकड़े ये पंख मेरे
या परिंदा ही हूँ मैं कागज़ का?
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अब बख्श दे मुझको जाने दे, कहीं और बना तू घोंसला
ऐ कौव्वे जैसी मेरी काली किस्मत, जा कहीं और कांव कांव कर
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