शायद मैं एक खयाली पुलाव भर हूँ
बेवक्त लगने वाली आंव भर हूँ
आम का खट्टा हो चूका अचार हूँ
एक अधूरी कविता का सार हूँ

आधी लिखी कहानी जो बीच में ही पूरी हो गयी
दो नन्हे हाथों में समां भर रह गया विस्तार हूँ
दिमाग में उपजने से जिसके दिमाग बंजर हो चले
जिसे न कहा कहा जाये न जिया जाये, एक ऐसा विचार हूँ
जहाँ से देखने से दुनिया दिखाई देने लगती है बहुत दूर
जिसका छेद है इतना महीन, की कोई धागा न घुस सके
उसकी सिलाई से निकली हुयी साडी की फाल हूँ मैं
स्वीमिंग पूल में ठहरे पानी पर जमती एलगी हूँ
उसके ऊपर मंडराते मच्छरों की भिनभिनाहट हूँ
उनसे मचती चिढ़ हूँ, इरिटेशन हूँ, अपवाद हूँ मैं
थोरी देर रखोगे मुंह में तो जानोगे, कितना बेस्वाद हूँ मैं

——————————————————-

आखिर तुमसे मिलना ही पड़ा
जो कहने लायक नहीं था वो भी कहना ही पड़ा
आखिर तुमसे मिलना ही पड़ा
इसे कौन समझेगा मालूम नहीं
ये किसीके काम का होगा लगता तो नहीं
पर गर्मी की लम्बी खाली दोपहरी में
जाने कैसी है कुवत, कैसी है कुर्बत
जो नहीं है कहने लायक, कहला देती है
जो नहीं किसी के समझ में आता, समझा देती है
कोई होगा जो लेट पलंग पर, मोड़ पैरों को घुटने से
ले किताब हाथों में, अंगूठा चूसता मुंह में
पलटेगा पन्नों को इसके जैसे हवा पानी की सतह को सहलाती है
और थम जायेंगी उसकी निगाहें पाकर ये दो चार पसरी सी पंक्तियाँ
जो न कुछ कहना चाह रहीं, न कुछ पाना चाह रहीं
जिनके पास नहीं है कुछ भी देने को
जिनको लगता है अनमोल हैं वो
हाँ लगा नहीं उनका कोई मोल अभी
जो हर पल हर घट में ठुकराई जाती हैं
जब जब पन्ने पलटे जाते हैं वो
पलटते पन्नों के बीच में ही दबी रह जाती हैं
हैं आज मिली उनको दो आँखें
जाने वो कैसा घूरा करती हैं
वो देख पा रही उनमें जो
वो खुद भी अधूरा कहती हैं
और पढ़ के फिर वो दो चार दफा
कर बंद किताब को बैठेगी
कहते कहते जो नहीं कहा
बात वो उसके दिमाग में घूमेगी
उठ कर बनायेंगी वो चाय खुद के लिए
फिर पलट खोल फिर देखेगी
ये क्या लिख डाला है इनमें
है छुपा क्या वो ये सोचेगी
एक तरंग तरन्नुम में होगी
एक अदृश्य हास फिर नाचेगा
है जिसको सब कुछ मालूम वो
काल समय कथा फिर बांचेगा
बोलेगा कथा वो जो अधूरी है
खाली पन्नों से ही जो पूरी है
वो नहीं कथा किसी एक मानुस की
है वो तो कहानी हर जग की
जिसके आधे पन्ने ही उकेरे जाते हैं
बाकी की कथा खुद ही कहनी सुननी होती है
————————————–

आसमान से उखड़ कर गिरा वो
जैसे दीवार से उखड़ा हो पुराना पेंट
पीछे छोड़ आया एक सुराख़ आसमान में
गिर नीचे रेतीली मिटटी में लौंदे सा
पलट कर देखता आसमान में हुए सुराख़ को
जो धीरे धीरे भर चला था
उसके कोनों पे उभर आये थे नुकीले किनारे
जिनसे लटकती एक पिघले हुए लोहे की बूंद
गिर पड़ी थी फिसलकर उसके ऊपर

——————————————-

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: