Archive for January 18th, 2013

January 18, 2013

माँ

मैंने कभी तुम्हारे पाँव नहीं दबाये, सर नहीं सहलाया
जब भी बोला तो ऊँची आवाज़ में आवाज़ दी
जब भी जगाया गहरी नींद से उठाया
हाँ कई बार तुम्हें गले से जरूर लगाया
पर ज्यादा देर लगाये रखा नहीं
और लगाने के फ़ौरन बाद चाय की फरियाद की
ज्यादा देर पास रुका नहीं, कोई किस्सा पूरा सुना नहीं
पैसे पहुंचा दिए पर सर्दी में गर्म कोट ला सका नहीं
तुम कहती रही तुम मेरी हो,
पर बातों पर विश्वास मुझे कभी हुआ नहीं
तुम ज़माने की फब्तियों से मुझे बचाती रही
मोटी खुर्द हो चली उँगलियों से बाल सहलाती रही
अभी तो बहुत बचे हैं, बाल, ये झूठ सच की तरह बताती रही
और मैं भागता रहा, अपनी किस्मत संवारता रहा
लोगों से मिलता रहा, सड़कों पे फिरता रहा
तुम्हारी गैस पर उबली चाय छोड़
चाइनीज़ स्टाल पर नूडल्स खाता रहा
पर इन सब भटकने के बीच
बाकी मेरा तुझसे बस ये एक नाता रहा
जब हँसता था तो तमाम लोगों की शक्लें ध्यान आती थीं
पर रो पड़ता था जब भी तेरा ज़िक्र, तेरा खयाल आता था

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ये ठहरी ठहरी सी मज़िलें, ये बेनकाब हो चले इरादे
दिल ये कहता है की इनके पार वो जाये तो क्यूँ

इस पार कोई हलचल नहीं, उस पार नहीं कोई मंज़र हंसी
खड़े रहना में है मौज़ कैसी, और कदम कोई बढ़ाये क्यूँ

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January 18, 2013

चलो इस रात में कोई सफ़र करते हैं
कहीं दूर जाते हैं कोई मंज़र तलाशते हैं
इक तालाब इक सड़क इक दरिया तूफानी
जिसके थमे पानी में झांकते हैं गहरे तक
और कूद लेते हैं इसमें पकड़ने को
उफनते चाँद की परछाइयाँ

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बड़ा सीधा सा मुआमला है
इसमें मोहब्बत जैसा कोई भी बेरंग बवाल नहीं

January 18, 2013

एक गुमनाम रस्ता है
इक सरफिरा राही
उस सड़क पर खुलती हैं कई राहें
सबमें झांकता हुआ
किसी किसी से होता हुआ
खोता हुआ, मिलता हुआ
गले लगता हुआ, ज़ुदा होता हुआ
पोंछता किसी के आंसू
खड़ा होकर किसी जलती बुझती बत्ती के नीचे
रोता हुआ, रस्ता देखता हुआ, लिफ्ट मांगता हुआ
कुछ पानी को बह जाने देते हुए
कुछ से अपनी चावल की पोटली को सींचता हुआ
वो गुमनाम नागरिक भटकता है उस सरफिरी सड़क पर

एक झोपडी जिसके भीतर से आती है रौशनी और साथ हौले से रोने की आवाज़
आवाज़ को सुनता हुआ, धीरे धीरे उसकी ओर कदम बढ़ाता हुआ
लाकर देता पानी का गिलास उस सुबकती हुयी औरत को
जो लेटी है चारपाई पर, थोड़ी बीमार सी लगती हुयी, सिसकती हुयी, सिमटती हुयी
पाकर पानी का गिलास और देख दो संजीदा आँखें
गटकते हुए पानी अपनी आँखों में चमक पाती हुयी
जैसे उसने ही रचा था ये सारा स्वांग, पकड़ने को उस सिरफिरे राही को
उसे सुननी थीं उससे कहानियां, जानने थे सरे राज़ उस सिरफिरी सड़क के
जिसपे वो चलता था, जिनपर वो अक्सर रहता था
जानना था क्या है उन तंग गलियों में, जिनसे वो गुजरता था
गलियां जिनमें वो जा नहीं पाती थी
जिनके मुहरे पे खड़े होकर कई बार उसने देखा था
जिसके अंदर से आती चीखों को किसी नाटक का शोर समझ कर उसको हुआ था कौतुहल
जिसके अंदर से कभी कभी बहार झांकती कटी फटी लाशों को देख कर वो जाती थी सहम
और वापस लौट जाती थी अपनी झोपडी में
लेट जाती थी वो बिस्तर पर जल कर एक दिया
जैसे उसे तलाश थी, उन्हीं कटी फटी लाशों की
जो भटक गयीं थी, जो छिटक गयीं थी
जो पाकर उसके दालान का पेड़
दोनों बाहें फैलाकर उनसे लिपट गयीं थीं
जिनको वो देखा करती थी अपनी खिड़की से
और एक कातिल कामिनी सी मुस्कराहट के साथ
बंद कर लेती थी अपना किवाड़
उसी दालान से होकर, उसी दरवाज़े से गुजरकर
अन्दर पहुंचा था उस घर में वो सिरफिरा राही
उसने देखे भी न थे दालान से लिपटे हुए प्रेत
जब तक खुद दिखाए नहीं थे उस औरत ने खोल कर वो किवाड़
और फिर बहार जाकर दोनों ने देखा था उन लटके हुए मेहमानों को
जो सूख चुके थे, और चिपक कर पेड़ से उसके ही हो रहे थे
खुरच कर पेड़ से उनको निकलना चाह
पर अब ये मुमकिन नहीं था, इससे कुछ हासिल नहीं था
तभी पीछे के एक पेड़ से गिरी एक सूख चुकी लाश
जिसकी साँसों में बाकी थी कुछ सांस, जिसके हाथ अब भी हिलते थे
और जिसको सम्हाला अपनी गोदी में उस अजीबोगरीब राही ने
जिसकी बाहों में उसने दम तोड़ दिया लेके चंद साँसे
देखता हुआ उसके पीछे कड़ी उस लड़की को,
ताकता आसमान को, पकड़ता अपनी उखड़ती साँसों को
और छोड़ कर उसको एक तालाब के किनारे,
जहाँ से ले जाने वाले थे मगरमच्छ उसको खाने के लिए
आकर लौट गए दोनों फिर से चारपाई पे
वो शख्स सीधा हाथ माथे पे रखे देखता हुआ झोपड़ी की छत
और उसके दरमियान वो सितारों भरा आसमान
और वो औरत लिपट गयी उससे जैसे बदन से कम्बल
दोनों तमाम रात लेटे रहे, कहानी कहते रहे
वो बताता रहा उसको दास्ताँ अपने हर मोड़ की, गली और सड़क की
जब तक वो लुढ़क न गयी होकर बिधाल उसकी बाहों में
और वो भी सो न गया बंद करके अपनी पलकों को चंद लम्हात के लिए
की जिनके वो उठा और हलके से रखकर बगल उसके हाथ
उठ कर चल दिया फिर से उसी सड़क की तरफ जिससे वो आया था
उसने उठकर उसको पीछे से जकड लिया, दूर जाने न दिया
पर खोल के उसका बाहुपाश वो फिर से चल दिया
छोड़ कर पीछे कोई परछाई, कोई विषाद, किसी किताब का पन्ना
पन्ना जिसे नाव बनकर बह निकलना था किसी पानी के धारे में
और मिलना था उस राही से बहुत दूर किसी किनारे पे
जब उसको लगी हो प्यास और सड़क गुज़रती हो किसी मरुस्थल से
और झुक कर देखने पर उसको पाना था ज़मीन के नीचे
वोही धीमे से सरकती नाव, लेकर अपने ओक में पानी
पानी जो थी ओस जो रस्ते से बटुर आई थी
पानी जो थे अनायास रिस आये बदन के आंसू
नाव जो होकर आ गयी थी नीचे से उन्हीं तंग गलियों के
जिनको उसे जीना था, देखना था, करना था महसूस
और उस दिन जाना था दोनों ने वो क्यूँ मिले थे
क्यूँ दोनों ही थे राही एक ही सड़क के
एक को अन्दर से जाना था, संकुचित रहना था
एक को उनके बीच से गुजरना था, बर्बाद होना था
दोनों को संग चलना था पर साथ न होना था
वो नाव थी कागज़ की और वो राही था समंदर का
एक को बहते जाना था और एक को तैर के आना था