और वो कुत्ता दौड़ पड़ा सड़क पे
भागता किसी ट्रक के पीछे
कभी किसी तेजी से गुजर गयी जीप पे भौंकता
कभी बचता खुली कार से फेंके गए पत्थर से
वो कुत्ता अपनी पूंछ हिलाता
मुंह अपना अपनी पसलियों में रगड़ता
देखता ऊँची छतों की मुंडेरों पे टंगे रोशन चेहरों को
सोचता ये रोशनियाँ कब उसको तर बतर करेंगी
देखता वो छोटे घरों हिलती दीवारों वाली झोपड़ियों को
सोचता ये दीवारें कब मुझको बसर करेंगी
ढूंढता खुले आसमां में कोई रंग खोया हुआ
आसमां की सीढ़ी सपाट नीली चादरों में
ढूंढता सलवटों को, उधरन के निशानों को
और पाता कुछ नहीं, पाता सब कुछ वैसा जैसा है
सीधा सपाट और समतल
है नहीं कोई दरवाज़ा खुला, है चमकता कोई मकान नहीं
जहाँ जाकर सफ़र रुक जाता हो, है वैसा कोई मुकाम नहीं
है कुछ नहीं छुपा बादलों के पीछे
वो तो बस हैं पानी की सुखी बाल्टियाँ
है और कुछ नहीं उनके पीछे
है कुछ नहीं छुपा आसमानों की कतरनों में
वो एक सीधा कपडा है, उसके कोई टुकड़े नहीं
और मैं, वो कुत्ता, खड़ा हो जाता है सर झुका कर
पैरों से रगड़कर जहाँ भी मिली उसे गरम सॉफ्ट मिटटी
वो लेट गया रख के सर अपना पैरों के बीच
कभी पलट कर देखता, कभी यूँ ऊपर को
ढूंढता कुछ उन खो चुकी आँखों से
झांकता पीछे से उन बंद हो चुकी आँखों से
बैठा बैठा सूंघने लगा ज़मीं
जैसे जब आसमां में न मिला तो अब ज़मीं को तलाशेगा
उसको है खोजते रहने की धुन, एक घिस चुकी रिसती आदत
वो खोजेगा, क्यूंकि उसके बिना वो रह न सकेगा
और वो सो गया
सोते में किसी ने फेरा हाथ उसके सर पर
रखा आगे एक दूध का प्याला, एक रोटी का टुकड़ा
खाकर उसे में उठ पड़ा, आँखों में चमक लौट आई थी
और वो जाकर अपनी कार से निकाल लाया एक नाजुक मोटा पट्टा
दाल जिसको मेरे गले में वो मुझे अपना बनाना चाहता था
और तभी मुझको दिखने लगीं उसमें तमाम बुराइयां
कितना मोटा है ये, साल हँसता बहुत है
कपड़े देखो साला चमकता बहुत है
मैंने पलट कर देखा, दुकानें खुल रही थीं
हलवाई की दूकान पे जलेबियाँ ताल रही थीं
मुझे तो उनकी तलाश थी
हर दिन नयी बनती, नया स्वाद लेकर आतीं
बैठ कर कार में कौन खायेगा रोज़ वोही डबल रोटी
एक जैसी कटी हुयी, एक जैसी बनी हुयी
पास आकर उसने मुझे पुचकारा,
पट्टा मेरे गले के पास भी लगाया
मेरे छिटकने पर भी न हुआ नाराज़
अपनी भलमनसाहत से मुझको और छोटा फील कराया
उससे पीछा छुड़ाना मुश्किल था
तभी दूर आसमान में उभरी एक आवाज़
एक बड़ा पंछी, एक खूंखार दरिंदा
वो जिसके सर पर घूमता रहता है घड़ घड़ करता एक विशाल पंखा
हाँ वो उभरा, और मैं भाग पड़ा उसकी तरफ
छोड़ पीछे उस रेशमी पट्टे वाले को
भागता, भौंकता, गली के और कुत्तों के साथ रेस करता हुआ
पर था जनता की मैं उन जैसा नहीं हूँ
वो भागते हैं देखने को की कौन आया उनके इलाके मैं
की क्या है वो ही उनका मसीहा जिसके बारे में लिखा है उनके ग्रंथों में
क्या वो उतरेगा आज नीचे और वापस दिलाएगा उनको वो सब जो उन्हें का है
वो बड़ी ऊँची इमारतें क्या वो ढहा देगा जिसकी छाया में वो सो नहीं पाते
क्या उनकी हो जाएँगी कल से ये मिठाई की दुकानें
क्या लगेगीं उनकी ही तस्वीरें पत्थरों की अब हर चौक पे
जिस पे मूतना ही अब उनका सम्मान होगा
और वो आज भी निकल जाता है हमको पीछे छोड़ के
छोड़ हमको लौटने को वापस उन्हीं मुकाम पे
वोही दुकानें मिलावटी, पुरानी, जरुरत से कभी ज्यादा मीठी,
कभी समोसे में आलू का छिलका न उतरा हुआ
वोही तेजी से दौड़ती गाड़ियां, उनसे निकलता धुआं
हमारे मुंह को कालिख से रगड़ता हुआ धुआं
वोही बुझती हुयी रात के अलाव की ठंडी हो चुकी राख
वोही लेटकर उसपर देखना दूर जाती कार को
देखना उसमें जीभ निकले बैठे उस पालतू कुत्ते को
और याद करना उस कार वाले को और सोचना उसके पट्टे को
और भौंक देना उस पालतू जीभ लेट कुत्ते पे
उसका चले जाना आगे की सीट पे अपने मालिक के पास
जिसने सहलाया उसे, सीधा किया उसका पत्ता और दाल दिया एक बिस्किट उसके आगे
और मैंने सर रख दिया अपना फिर से अपने पैरों के पीछे
शायद चाहता हुआ पट्टा पर ये कहता हुआ
मैं वो नहीं जो बांध जाते हैं पट्टे से
पाते हैं दुलार पर रहते हैं उस बंद डब्बे के अंदर
मुझको तो उस आसमानी चिड़िया की तलाश है
लेकिन इस लिए नहीं की मुझको पानी है अपनी आजादी
न ही मुझको लगवानी है अपनी स्टेचू किसी चौराहे पे
मुझको तो जानना है उस चिड़िया के भीतर कौन है
जानना है की वो क्या है, क्यूँ है, उसे किसकी तलाश है

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