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December 28, 2012

हर बड़ी चीज़ की शुरुआत छोटी होती है
हर पहला कदम तनहा होता है
हर आदमी अपनी मंजिल अकेला तय करता है
लेकिन अकेले कुछ नहीं होता
होता है जब लोग मिलते हैं, जुड़ते हैं, हमसफ़र बनते हैं
जब ध्येय मिलता है, लक्ष्य हासिल होता है
जब मुश्किलें आती हैं, जब हार होती है, जब सब थम जाता है
जब सब रुक जाता है, टूट जाता है, जब हौसला आता है
जब आदमी फिर से सर उठता है, जब वो चिल्लाता है
और कहता है खुद से, औरों से और ज़माने से
मैं जीतूँगा, मैं जीतूँगा, जीतूँगा

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कुछ न कुछ करते रहने की आदत
साधारण सत्य से भागने का हठ
उथल पुथल को समेटने की आकांक्षा
किसी नव निर्माण में खुद के निर्मित होने की उम्मीद
मुझको तुझ तक लाती है

क्या मैं जा कर माँ से जिद करूं
चीखुं चिल्लाऊं
उसकी हर पुरानी गलती याद करा के
उसको पुनः पुनः उनके लिए
गिल्टी फील कराऊँ

एक दिन मैं ऐसा विचार बिंदु पा जाऊंगा
जिस पर चढ़कर सब समतल हो जायेगा
सब कुछ होगा जैसे एक सपाट कहानी
थोड़ी बाधा थोड़ी कठिनाई तो है आनी जानी

एक लड़की है, जिससे मैं प्यार नहीं कर पाता हूँ
जिस्म, हाँ वो मैं उससे अक्सर सटा आता हूँ
और सब कुछ हो जाने पर ख़तम,
सब पूरा हो जाने पर
फुर्ती से किसी तेज़ी के साथ
सब धोने चला जाता हूँ
जैसे वो जो अपने पीछे पर अपना ही
बिस्तर पर छोड़ के आता हूँ
उससे मैं भाग जाना चाहता हूँ
छुप जाना चाहता हूँ, नहीं नज़र मिलाना चाहता हूँ
वोह जो झांकता है मेरे अंतर्मन में
और कहता है अक्सर मुझसे
तू क्यूँ यहाँ चला आता है
कहीं और क्यूँ नहीं दिल लगाता है
वो जिसको मैं बेबसी का पाठ पढ़ाता हूँ
वो जिसको मैं समझाता हूँ
की तेरी बातों से दाल नहीं है गला करती
जैसा तू बतलाता है जगत में वैसा कुछ भी नहीं हो पाता है
कुछ भी पाने का रस्ता, सब कुछ खोने के गलियारे से होकर जाता है
वो फिर चुप होकर रह जाता है
जान अपनी बेबसी, मेरी मज़बूरी भी समझ जाता है

एक लड़का है जिसको मैं बचपन से करता हूँ प्यार
वो था मेरा बाल सखा उसकी सौ बातें थी मुझको स्वीकार
अब वो दर दर भटका करता है
और सब जगहों से हो जाने पे चूर
मेरे कंधे ढूंढा करता है
और मैं अपने जर्जर कंधे उसको
ज्यादा देर को नहीं दे पाता हूँ
दे देता हूँ जब उसको
तो कई रात मैं खुद कोई ऊँगली ढूंढा करता हूँ
फिर वो मेरे अन्दर का प्राणी रह जाता है मौन
है उसको मालूम कटु कुटिल सत्य

कुछ और भी हैं जिनके बीच मैं उलझा रहता हूँ
इन जबरन की आफत में खुद से कुछ जुदा रहता हूँ
और जब कभी आवेश में, संयोग से या विवश हो
मैं इन सब से खुद को दूर कर लेता हूँ
तो जो पाता हूँ उसका कोई नाम नहीं
वहां शोर नहीं सन्नाटा है
उसका किसी के साथ ज्यादा देर दिल नहीं लगता
और वो खुद के साथ भी घबरा जाता है
और वो चल पड़ता है
किसी नयी मुसीबत, किसी नयी परेशानी
किसी नयी चिंता की खोज में

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