Archive for December 17th, 2012

December 17, 2012

और है यहाँ अब कुछ भी नहीं
न निशान बाकी हैं
न हैं ढहती दीवारें
न रेतीली जमीं है
न भुरभुराता आसमां
है तो बस एक मंज़र
आँखों के सामने खुलता हुआ, बदलता हुआ
फिसलता हुआ, सरकता हुआ
उसपे लुढ़कते हुए लोग, उनकी आती हुयी आवाजें
जैसे कोई चीख कर गया है वहां से
जहाँ मैं अभी खड़ा हूँ
पर कोई दिखाई नहीं देता
कुछ सुनाई नहीं देता
कुछ रेंगता है कानों के पीछे
कुछ है जो उभरता है आँखों के बीच
कुछ है जो यूँ उठता है किसी सुगबुगाहट की तरह
और फिर गिर के कहीं गम हो जाता है
जैसे कोई था ही नहीं, कोई है ही नहीं
जैसे किसी ने कुछ कहा ही नहीं,
जैसे ये वक़्त हुआ हुआ ही नहीं
जैसे कोई हादसा जिसका किसी को पता ही नहीं
जैसे कोई इंसान जो मिलता नहीं
पर जिससे भी पूछो कहता है, ऐसा तो कोई लापता नहीं
और वो जो उसकी खोज में निकला है
लेकर हथेली के बीच उसका अक्स
बंद कर के मुट्ठी चल पड़ता है
उन दूर घुमड़ते रेत के बादलों की तरफ
और उसे देखने वाला जोड़ देता है एक और अंक
उनकी सूची में जिनका कभी पता कोई चला नहीं
क्यूंकि उन रेट के बादलों के बीच क्या है
ये कोई जानता नहीं
कुछ लोग पहले भी जा चुके हैं उधर
पर अभी तक कोई उधर से लौटा है नहीं
कुछ दूर, कुछ देर रहे उनके कुछ निशान
कहीं कहीं जमीन की रेत रही नाम उनके जाने के बाद
कभी उड़ के हवाओं से हाथों में आ गए उनके छोरे हुए सामान
और उनसे पता लगी उनकी थोड़ी सी सिमटती हुयी दास्ताँ
कहते हैं एक बार एक बाशिंदा आया था
वो गम था एक रात उन्हीं बादलों के बीच
और सुबह मिला था लेता हुआ रेत के बिस्तर के नीचे
उससे पूछा किया काफी देर की उस रात क्या देखा
उसने देखा उनकी और उनकी आखों में जैसे देखता हो कोई भूत
और भाग पड़ा वो वापस उन्हीं बादलों की और जैसे उन्हें जनता ही नहीं
जनता ही नहीं, पहचानता नहीं
वो उनके जैसा नहीं, उनसे उसका कोई नाता नहीं
वो फिर हो गया गम उन्हीं बादलों के पार
छोड़ कर हाथों में सिर्फ एक सूची जाने वालों की
जिनके नाम नहीं थे पहचान नहीं थी
वोही सूचि हवा में फड़फड़ाती थी
बंद कर उसे बक्से में, बहार से जड़ के ताल
बैठ गया मकान के बहार वो सूचि रखने वाला
पहले भी कई बार ये सूचि यूँ ही फड़फड़ायी थी
और उसको लगा था उस पार से है कोई आने वाला
वो जागता बैठा था कई रात उसके इंतज़ार में
बंद कर डब्बे में खाना करके उसको गरम
वो आएगा तो साथ खाऊंगा
वो आएगा तो चलेंगे झील पे नहाने
वो आएगा तो दिन भर होंगी डूब कर बातें
वो आएगा तो रात फिर से जवां होंगी
वो आएगा तो संग लायेगा खबर उनकी जो नहीं आये
वो आएगा तो बतलायेगा रखा क्या है बादल पार
वो आएगा तो बतलायेगा बातें नयी पुराणी
वो आएगा तो कहेगा होती क्या है चीज़ जवानी
वो आएगा तो रंग एक नया लायेगा
वो आएगा तो वो घर कोई फिर से चूना लगवाएगा
वो आएगा तो आँगन में लगा दूंगा एक नया पौधा
वो आएगा तो मंदिर की कर के सफाई
वही कुएँ की पास की मिटटी से बनाकर मूर्ति
लगा देंगे उस उजर चुके मंदिर में
उसके आने की सोच में आ गए उसकी आँखों में हल्का पानी
पोंछ कर उनको वो उठ बैठा और खोल दिए किवाड़
और दूर से आती उन सन्नाटे की आवाजों में सुनता कदमों की आहट
उसकी पलकों ने कर लिए बंद उसके मन के दरवाज़े
और ऐंठती पीठ करती खुद को सीधा
पसर गयी बिस्तर पे करके पैर सीधे
और फिर सुबह हुयी वहां कोई नहीं था
उठ के उसने एक और दिन जोड़ दिए उन दिनों की सूचि में
जिसमें लिखा था की आज फिर कोई नहीं लौटा
जिसमें था हिसाब की कब से है सब काम रुका हुआ
जिनको था पता की कब से है हाथ थमे हुए
जिनमें था बंद एक ठहरा हुआ सा इंतज़ार
जिनको था सब मालूम और ये भी पता था
की जिस दिन कोई लौटेगा सबसे पहले
ये शक्स उसको ये सूचियाँ दिखायेगा
और वो कहेगा फाड़ दो इनको पहले
अब मैं हूँ लौट आया अब इनको जाने दो
और इसके हाथ कापेंगे और कर न पाएंगे
हो चुकी है इतनी इंतज़ार की आदत
और दोनों बैठ के गुजारेंगे कुछ एक रातें
और फिर से हो जायेंगे यूँ जुदा
की आने वाला लेकर बैठेगा हाथों में सूची
और वो जिसने कब से इनको थाम रखा था
खुद जायेगा देखने की बादल पार क्या है
और बन जायेगा खुद एक और संख्या सूचि में
और जाकर उस पार वो जानेगा
की क्यूँ कोई वापस नहीं आता
क्यूँ वापस आने वाला कभी कुछ नहीं कहता
क्यूँ वो आँखों में देख कर औरों की घबरा उठता है
क्यूँ वो औरों से दूर रहता है
क्यूँ वो कहता है जला दो ये सूचियाँ
क्यूँ वो अक्सर बैठा रहता है जैसे की पत्थर हो
क्यूँ वो हिलता नहीं, किसी से मिलता नहीं
क्यूँ उसका चेहरा कहता है वो मिल के भी किसी से मिलता नहीं
क्यूंकि जाने वाला उस पार है इतनी दूर निकल जाता
की वापस आकर है वो सिर्फ तन्हाई ही पाता
कैसे वो किसी को समझाएगा
वो कैसे किसी को क्या क्या बतलायेगा
सब कुछ बताकर क्या वो बस एक कहानी नहीं बन जायेगा?
तन्हाई को भी वो दे देगा अलफ़ाज़ तो उसके पास क्या रह जायेगा?
उसकी आँखों में फिर से छलक आये हलके से आंसूं
और होठों पे तैर गयी एक मुस्कान
सूचि फिर फड़फड़ायी, हवाओं ने फिर से कुछ कहा
इस बार जो था सूचि के साथ वो सब समझ गया
खोल दिए उसने भी किवाड़, लेट गया वो भी सीढ़ी करके पीठ
सुबह ही उसको कहीं और निकल था जाना
उसे करना था कहीं और उसका इंतज़ार जो गया था बादल पार

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