Archive for December 9th, 2012

December 9, 2012

हुए ख्वाब न मुकम्मल, कोई मंजिल न सही हासिल
कुछ और हुआ न हुआ, लेकिन खलिश ने तो आराम पाया

लगता था कैसे सम्हालेंगे, ये बोझ मलीदों का
कैसा खैर-ख्वाह था, संग अपने अपनी दवा लाया

सोचा था चंद रोज़, पर वक़्त लम्बा साथ बिताया
कतराते थे जिससे मिलने से, अक्स उसमें ही अपना पाया

काफी दिनों से उसको दागी बताते घूमते थे
आइना साफ़ किया तो चेहरे पे वोही निशान पाया

कोई हकीम नहीं था, कोई रकीब न मिला
खुद में छुपा था मर्ज़, खुद में ही इसका इलाज़ पाया

दर्द बढ़ा, पिसते गए और फिर हंसी छूटने लगी
हंसी ढूंढने निकले थे और रोकर ये हुनर आया

आया है जब से ये, मिला है जबसे हमको
लगता है पुराने यार ने, है बिन कहे ही गले लगाया

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मुद्दतो बाद कोई साथी हम जैसा मिला
हम सबसे अलग हैं, वो हमसे थोड़ा अलग मिला

उसकी शक्ल में हमको आइना मिला
दाग जो हममें है वोही उसमें भी मिला

अक्सर सोचते थे लोग हमसे क्यूँ कर कतरा जाते हैं
उसके चेहरे पे हाथ फिराया तो अहसास खुरदुरा मिला

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