इस राह क्यूँ चले
क्यूँ मंजिलों से भटके
क्यूँ कारवों से अलग हुए
क्यूँ खुद से हम मिले

राही थे भटके हुए
राहों से अलग हुए
अब न राह है न हम हैं
कुछ ऐसे हैं सिलसिले

उधार के थे कुछ दिए
वो भी अब गुम हुए
चुप थे सब जवाब कब से
अब हम भी चुप हुए

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कुछ दोस्तों की दोस्ती
एक माँ का प्यार
कभी कभी आज़ाद
बाकी बहुत लाचार

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