Archive for November 23rd, 2012

November 23, 2012

एक और शाम सुर्ख हुई, एक और दिन का बसेरा हुआ
दुनिया की सुबह हो गयी और अपने लिए अँधेरा हुआ
कैसी अजीब बात है, कहने को दोनों की एक ही रात है
तेरी आँखें मूंदे गुज़र गयी, मेरी आँखों में ही रह गयी
वो बाग्चे वो मंज़र वो रास्ते वो इमारतें
गुज़रे तो इधर से ही थे जाने अब किधर गयीं
कुछ शख्स भी हमें मिले और कुछ सामान भी
कुछ खोया खोया सा लगा निग़ाह जिधर भी गयी
शहर में पहुंचे कभी, कभी बयाबां पे सो गए
दिखी जहाँ बगिया और पानी हम वहीँ के हो गए
बदन में हलकी सी सुस्ती आँखों में नमी हो आई थी
हमको पता भी न चला कब नींद में हम रो लिए

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आत्मा बेचैन है और दिल औ दिमाग में कोई उलझन नहीं
अब मैं इसको इधर उधर की बातों में उलझाऊं भी तो कैसे
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किसी को लगता होगा की हमारे पास सब कुछ है
और हमें लगता है की किसी के पास क्या कुछ है
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आज डूबते वखत सूरज जरा देर इंतज़ार में था
मैंने कहा बेकार है मेरा तुझसे कोई वास्ता नहीं
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ठंडी में मोहब्बत में मशगूल अलग से चलते मालूम पड़ जाते हैं
हम कम्बल में सर छुपाते हैं वो खुद की आग में सिकते जाते हैं
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चलने लगता हूँ तो चल देती है ज़िन्दगी
रुक जाता हूँ तो रुक जाती है ज़िन्दगी
आजकल मैं अक्सर बैठा रहता हूँ
इसी लिए शायद बैठी रहती है ज़िन्दगी

चुतियाफा मत करो, फिलोसोफी से सर मत जोड़ो
चूतिया हो तुम इसलिए पत्थर से जाकर सर फोड़ो
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