Archive for November 19th, 2012

November 19, 2012

ऐ शाम चली जा, मेरा इंतज़ार ना कर
चुप चाप ठहर जा, कोई बात ना कर
मत छू मेरे हाथों को दूर ही रह
न खुद की सुना ना मेरी ही सुन
बीच मेरे तेरे ये जो, उभरते जो गहरे साये हैं
इन्हें रहने दे, इन्हें छू कर देख
कुछ इनसे भी बातें कर के देख
जाने कितनी शामों से ये
तुझसे मिलने को तरसे हैं
तू तरस मुझसे मिलने को आज
और इनके अहसासों को जी कर देख
मैं भी चलता हूँ कुछ दूर कहीं
मुझे जाने दे मत पीछे आ
ना आवाज़ दे, ना हाथ बढ़ा के बुला
खोजूंगा मैं भी कोई माकूल जगह
बैठूँगा मैं जिसके चौबारों पे
ढूढूंगा मैं कोई गलियारा
जिसके खामोश बिसरे सन्नाटों में
मैं मिलूँगा खुद के सन्नाटों से

—————————————–
ज़िन्दगी मज़े में है क्यूंकि कोई काम नहीं है
मुसीबत ये है की खाली बैठे आराम नहीं है।
—————————————–
खाना, सोना, रोना, और मुझे अब काम है क्या
अंजाम भुलाने वालों का, इससे बेहतर अंजाम है क्या

हाथों से मेरे वो रोज़ ज़रा, ज़रा सा सरकती जाती है
बाकि अब केवल हाथ रहे, लकीरें नहीं इनपे बाकी हैं
—————————————–
एक और शाम फलक से टूट के गिर गयी
मैंने हाथ फैलाये थे वो ज़मीं से मिल गयी
मेरे हाथों में फिर से आज चाहतें ही रह गयीं
उन्हें चेहरे पे फिराया, तो लगा नमाज़ अदा हो गयी
——————————————-
कुछ भी नहीं है पास हमारे बस तन्हाई की बातें हैं
कट जाते हैं दिन तो हमारे, कटती नहीं पर रातें हैं
——————————————-

Advertisements