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November 11, 2012

किसी पेड़ की टहनी से
गुपचुप से आसमानों में
लटकता छतों से मकानों की
एक गुमशुदा सा तारा
गिर के डूब जाता है
शायद इसे किसी की तलाश है।

दो पलकों के दरमियाँ
बंद पानी के चंद कतरे
सिमट आये बन कर आँसूं
औ पलकों से झूलते हैं
जैसे गिरने से पहले इनको
किसी के आने की आस है।

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ये क़त्ल मेरे ही हाथों होना था
इस हादसे में मुझको ही मरना था

लग के जिस खंजर गला हलाक होना था
उस पे मेरी उँगलियों के निशान होना था

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