Archive for October 14th, 2012

October 14, 2012

हम आज़ाद पंछी हैं
हमें सस्ते कबूतरों की तलाश रहती है
इस दुनिया की फर्श के नीचे
एक मद्धिम सी परछाई चलती है
———————————————

वो जो मैं हूँ, वो जो मैं था, वो जो मैं हो सकता था
वो जिसके होने से बहुत कुछ सिमट सकता था
बहुत कुछ जो अब बन चूका है गहरा निशाँ, मिट सकता था
वो जिसको मैंने बहुत बार है गढ़ा पर साकार कर न सका
वो जिसको मैंने रखा सीने से लगाके पर साथ रख न सका
वो जिसकी चीखें गहराने लगी थीं इतनी कि मैं और सुन न सका
वो जो देखता रहा मुझको आँखों से ऐसी कि दहशत पैदा कर दे
कि पास आकार उनको ढकना पड़ा और कहना पड़ा अब बस भी करो
वो जिसके हाथ हरदम बाहर झांकते रहे
वो जिसको पकड़ा मैंने बाजु से कि कहीं वो मेरा हाथ थाम न ले
वो जिसके साथ अब आगे चलना दूभर था
वो जिसका भार इतना था कि उसका खुद से हिलना मुश्किल था
वो जो चपक गया थे मेरे जिस्म और मेरी रूह से
वो जिसको खरोंचना पड़ा रगड़ रगड़ के
वो जिसको मुझे कहना पड़ा अलविदा
वो जिसको कर बंद बोरे में मुझे रखना पड़ा किसी कोठरी में
वो जिसकी लाश से आती बदबू को मुझे हर रात सहना पड़ा
वो जो जग जाता था अक्सर पूनम कि रातों को
वो जो गा पड़ता था कोई गीत रेशम सा
वो जिसके केशु से महक उठती थी घर कि फिजा
वो जो निकला तो कुछ और ही में तब्दील हुआ
जिसकी आँखों में जैसे दूरी थी, जिसके हाथ थमे थे
जिसने उठाते ही गिरा दिए उसके जो औज़ार थे
जिसकी नर्म आँखों में देख कर मेरी सख्त आँखें झुक गयीं
जिसके पास अब भी न कोई करने को शिकायत थी
कैसे कहूँ वो कौन थी शायद मेरी मासूमियत थी
—————————————————–

मेरे हर गीत में
गुनगुनाहट तेरी होगी
मेरी हंसी में मिली हलकी सी
रोने की आवाज़ तेरी होगी
मेरे हताश हो बैठ जाने पे
गिरेगी पीठ पर जो उठ के
जो होगी खुद अपने बोझ से बोझिल
जो कहेगी मुझको उठने को
और बैठ जाएगी मेरे उठ जाने पे
जिसकी साँसों में मिली होगी
एक ऊबी हुयी सी आवाज़
इक डूबी हुयी सी चीख
इक अनसुनी फरयाद
इक अनकही शिकायत
इक अनसुना शिकवा
इक कड़वी सी कहानी
इक टूटा सा किस्सा
इक बिखरी सी हकीक़त
जो बैठ जाएगी मेरे चले जाने पे
और देखेगी शुन्य में
जो रातों को मेरे सो जाने पे
देखती है अक्सर बंद दरवाज़े को
कभी झांकती है उसे खोलकर बाहर
दूसरे घरों की जली लाइटों में छुपी
घुरघुराते हुए ऐसी और कूलर में दबी
बंद बत्तियों वाले कमरों में अँधेरे से ढकी
जैसे कुछ देर को वो मिल जाती है अपने जैसे औरों से
नींद की झपकियों में अकड़े पड़े बंद झरोखों के
नीचे से फिसल आते हैं वो टुकड़े टुकड़े में
और देख कर इक दूसरे को देते हैं हिचकिचाती हुयी हंसी
हिला के हाथ कह देते हैं वो जानते हैं उन्हें
फिर सब व्यस्त से हो जाते हैं खुद में
कोई जेब में अपनी हाथ डालकर
कोई इक बुझी हुयी सिगरेट मुंह में लगाकर
और देखते हैं अगल बगल की शायद कोई
उनको देखता हो जरा अकपकाकर
फिर जैसे अच्च्नाका हर इक के लिए
बाकी सब बुझ जाते हैं, हो जाते हैं विलुप्त
और वो पते हैं फिर से खुद को खड़ा अकेला
बीच में शोर के घुरघुराते कूलरों के
और दूर हिलाते हुए पेड़ों के बीच से झांकता है कोई
वो चले जाते हैं अपने अपने दरवाजों के अंदर
जहाँ सोया पड़ा है कोई जो उनको जानता था
और लेट जाते हैं बगल में आँख खोले
कभी बंद करते उसको कभी मिचमिचाते
की बगल से हाथ कोई आकर उनपे पड़ता है नींद में
कुछ देर वो भी करवट ले उसको हैं गले लगाते
और जैसे कुछ पल को वो फिर हैं जान जाते
की कुछ है जो अब पहले जैसा नहीं रहेगा
इक टूटा घड़ा जो अब कभी नहीं भरेगा
लेके उसे कुम्हार फिर कुछ बना देगा
बनाकर कोई चीज़ मनोरंजन की किसी आले पे सजा देगा
देख कर उसको जब कोई हंसेगा
कैसे वो उसको उस पल कहेगा
की ऐ हंसने वाले, मुझे इतना आकर्षक पाने वाले
मत पकड़ मुझको ऐसे की मैं रो पडूंगा
की पेट मेरा अब भी है पानी से भरा, कि मैं फट पडूंगा
और जब हाथ तेरा जो जायेगा गन्दा
और मेरे भी चेहरे की पोलिश उतर जाएगी
बाकी है तेरे चेहरे कि ये जो मुस्कान
ये भी किसी बासी हो चुकी सुहाली कि तरह चली जाएगी
और मैं लगने लगूंगा तुझे पिछली दिवाली का पकवान
समय हो गया है जिसको अब त्यागने का
और फिर लगूंगा हाथ मैं किसी कबाड़ी के
जिसके पलड़े पे मेरी कुछ कीमत तै हो जाएगी

—————————————————

Advertisements