Archive for October 7th, 2012

October 7, 2012

मैं,
और जमीन पर ठहरे
मेरे दो प्रतिबिम्ब
एक हल्का, एक गहरा
एक लम्बा, एक छोटा
और उनपर रखा
चप्पलों का जोड़ा

जैसे अगल बगल रखे हुए
एक दुसरे से जुड़े हुए
जिंदगी के हिस्से
और उनपर पड़े
ज़िन्दगी के पत्थर

चप्पलें उठ चुकी हैं
अब पत्थरों की बारी है

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ज्यादा देर कुछ भी नहीं रहता
न मिसरी की तरह पिघलता
जीत का अहसास
न मुंह में किरकिरी करता
हार का स्वाद
ज़िन्दगी जो पहले हरदम बोलती रहती थी
अब अक्सर कुछ नहीं कहती

बैठी रहती है ओढ़ कर इक सूती साड़ी
हवाओं से इसका घूँघट उड़ता हुआ
घुटना, हाथों के जामे में कसा हुआ
कुछ नहीं कहती, बैठी रहती है
क्या है इसकी आँखों में
पता नहीं चलता
चिट्ठियां आती हैं
पड़ी रहती हैं
बारिशों में भीग जाती
ठण्ड में ठिठुर लेती है
पड़े थे ओले जब पिछले साल
बदन जम गया था, आँखें सख्त हो गयी थीं
इक करवट ले ज़मीन पर गिर पड़ी थी
नाक के पास हाथ रखने पर
मालूम पड़ती थी सांसों की हवा
पेट को ध्यान से देखने पर
मालूम होता था की कुछ सरकता है
कोई जुगनू है अंदर, शायद कोई केंचुआ रहता है
जो धीरे धीरे चुपचाप अंदर चलता है

लेकिन आजकल हालात कुछ बदले मालूम होते हैं
उसकी आँखों में कुछ रौशनी सी मालूम होती है
बैठ जाओ गर बगल में और न कुछ बोलो न बोलने को कहो
तो झूठ नहीं कहता, उसकी नब्ज़ भी सुनाई देती है
ऐसा लगता है अभी उठ पड़ेगी, और नाचने लगेगी
रात भर से बैठा रहा उसके मानिद
कल रात तो नाची नहीं, कल रात घूँघट डाले रखी
अभी कई और रातें बाकी हैं,
अभी कई और दिन मैं जागूँगा
हाँ, जब भी उसका चेहरा रोशन होगा
हाँ, मैं उसे तब तक ताकुंगा

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अब हमारे मिलने की कोई सूरत नहीं, ए दोस्त
क्यूंकि पास हमारे जो था, बचा उसका कुछ भी नहीं
वो वक़्त का लम्बा पैजामा, वो उम्मीद का बहता नाड़ा
जब हम में हमारा कुछ भी न था
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